Thursday Pravachan

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सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३१ मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘समय के साथ चलो’ इस बारे में बताया। कईं लोगों को देखता हूँ, तो बस पढ़ते ही रहते हैं, कभी भी देखो खेलते रहते हैं मोबाईल पर, नहीं तो पढ़ते रहते हैं। इससे कुछ नहीं मिलता, ध्यान में रखिए। ये हमारे जो समय भगवान ने दिया हुआ है वो सिर्फ गिना-चुना है। कोई नहीं आज अगर सोचता है, कोई भी

कनेक्टिव्हिटी की दुनिया

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३१ मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘यह कनेक्टिव्हिटी की दुनिया है’ इस बारे में बताया। ये जमाना है मोबाईल्स का, नेट का, ट्वीटर, फेसबुक, वॉट्सऍप और ब्लॉग। ट्विटर, फेसबुक, वॉट्सऍप और ब्लॉग ये चार स्तंभ हैं। चंद नाम अलग हो जायेंगे आगे चलके, उनमें बहोत सारे सुधराव आ जायेंगे, बहुत चेन्जेस हो जायेंगे, but they have come to stay. ये जो चार प्रमुख स्तंभ हैं, ये

श्रीशब्दध्यानयोग-०२

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने १५ अक्टूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘श्रीशब्दध्यानयोग- ०२’ इस बारे में बताया। सो, बड़े प्यार से हमें, गुरुवार से पहला demonstration होगा, हम सीख जाएँगे, demonstration होगा यानी क्या, हमें सीखने के लिए होगा, राईट, हम सीखेंगे। Most probably हम लोगों को पुस्तिका भी मिल जाएगी। तो चक्र यहाँ होगा, उसकी प्रतिमा होगी, वो प्रतिमा हम लोग स्क्रिन पर भी display कर सकते हैं, राईट, ओ.के.।

श्रीशब्दध्यानयोग - ०१

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने १५ अक्टूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘श्रीशब्दध्यानयोग- ०१’ इस बारे में बताया। तो हमारा मूल निवास कहाँ था, हम लोग नहीं जान सकते, ओ.के., ये एक बात है। दूसरी बात क्या होती है, बहुत बार हम लोगों का कुलदैवत कौनसा है, यह भी हमें मालूम नहीं होता। हमारा ग्रामदैवत कौन सा है, हमें मालूम नहीं रहता। ये वास्तुदेवता भी होती है डेफिनेटली। ये सब क्या है?

माँ दुर्गा , Mother Durga

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३१ मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘माँ दुर्गा हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देती हैं’ इस बारे में बताया। मुझे अच्छा लगता है हमें, कोई भी सीधा ऐसा बैठा है, तो मुझे अ़च्छा नहीं लगता, वो काम करता रहे बस, बस, बस। I am myself workaholic and I want everyone be is workaholic absolutely. काम करते रहिए यार, शान से जियेंगे। So improve your english. ये अध्यात्मिक

दुर्गा इस शब्द का अर्थ

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २० अक्तूबर २००५ के पितृवचनम् में ‘दुर्गा इस शब्द के अर्थ’ इस बारे में बताया। मैं आस्तिक हूँ और मैं आस्तिक रहूँगा। मेरी श्रद्धा है की ये माँ दुर्गा सब कुछ करती हैं, सब कुछ चलाती हैं और उसका पुत्र त्रिविक्रम जो है, वह सबका केअर टेकर है। ये मेरी अपनी श्रद्धा है, कोई माने या ना माने मुझे क्या फरक पड़ता है? are you getting,

भगवान हमें वही देते हैं जो हमारे लिए सर्वोत्तम होता है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २० अक्तूबर २००५ के पितृवचनम् में ‘भगवान हमें वही देते हैं जो हमारे लिए सर्वोत्तम होता है’ इस बारे में बताया। जब हम, आप कोई काम करने निकलते हैं, हम क्या करते हैं? आज कोई इन्सान को जाकर मिलना है, भगवान काम कर दे अच्छा होगा। भगवान की याद की, भगवान को प्रणाम किया। काम करके आए, भगवान से, दिल से प्रार्थना की, भगवान, आपने बात

समयोग

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३० जून २००५ के पितृवचनम् में ‘समयोग’ इस बारे में बताया। योग जो है, भगवान, उस भगवती शक्ति और भक्त तीनों का एक समवान हिस्से में आना, एक ही ट्रान्ससेक्शन में, एक ही समय, एक ही पल, तीनों आनंद जो होते हैं, उसे योग कहते हैं। भगवान तो हमेशा आनंदस्वरूप हैं। भगवती जो हैं, वो तो आल्हादिनी स्वरूप हैं, आनन्दप्रदायक, उत्पन्न करनेवाली हैं। खुद आनन्दस्वरूप भगवान,

जिज्ञासा यह भक्ति का पहला स्वरूप

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अप्रैल २००५ के पितृवचनम् में ‘जिज्ञासा यह भक्ति का पहला स्वरूप है’ इस बारे में बताया। यह जिज्ञासा जो है, यही भक्ति का पहला स्वरूप है। भक्ति का पहला स्वरूप यानी राधाजी का पहला स्वरूप हर मानव के पास जिज्ञासा के रूप में रहता है। जिज्ञासा, भगवान के प्रति जिज्ञासा नहीं, इस विश्व के प्रति जिज्ञासा। यह सूरज कैसा है? यह पृथ्वी इतनी बड़ी है,

जराहरता

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘जराहरता (Jaraharata)’ इस बारे में बताया। हम लोग सभी यह स्टोरी जानते हैं महाभारत की, जरासंध की, कि जरासंध जब पैदा हुआ तब ऋषिओं ने आकर कहा कि, ‘ये सारे मानवजाति के लिए बहुत खराब बात है।’ तो उसे, टुकड़े करके दो फेंक दिए थे। ‘जरा’ नाम की राक्षसी आकर उन्हें सांधती थी। तभी इसी लिए सांधने के बाद, बार