Aniruddha Bapu


– Kusum Darekar, Nashik   Once a person has Mothi Aai’s blessings and that of her son, our Sadguru Bapu, one becomes fearless to face any untoward incident. Many of us received the opportunity to obtain such blessings during the Shree Varada Chandika Prasannotsav. Shraddhavans were bestowed with a protective shield during this festival. Here is an experience that would stand testimony to this fact. Jyache Hrudayee Shreegurusmaran, Tayasee Kaiche Bhaay

अग्नि और जल

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३० जून २००५ के पितृवचनम् में ‘अग्नि और जल’ इस बारे में बताया। जल, यह जो हमारा शरीर है, यह शरीर दिखता है तो, क्या पानी दिखता है शरीर में कहीं? बाहर से नहीं दिखता। हर कोई जो सायन्स का स्टुडण्ड है, जानता है कि शरीर का कितना हिस्सा पानी है? ७०% वॉटर है इस शरीर में। पृथ्वी पर कितना पानी है और कितनी जमीन है?

In sorrow, you are the sole source of support!

–SurekhaveeraDevagaonkar, Pune Despite having lost her father unexpectedly, this lady stayed true to the principles taught by Bapu. As a result, she kept experiencing Bapu’s presence around her even as she performed the last rites of her father. Since she had internalized the importance of Udi, she used it while immersing her father’s remains. A sense of peace prevailed in her mind. It was this action that forever reminded her

Jovari hya dehi shwaas, nija karyaas sadhuni ghyaa !

– Sushamveera Sarnaik, Marol   While he delivers his discourses, Parampujya Sadguru Aniruddha Bapu asks us to follow certain things.  Each of his endeavours for his devotees is for the present and for forming a secure cover for the future. He, who understands this, follows his teachings and tends to be happy. Then an ailment, even if it has erupted all of a sudden, tends to wane away in no time without anyone’s knowledge.      I bow

क्षीरसागर का मन्थन- भाग २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘क्षीरसागर का मन्थन’ इस बारे में बताया। अगर जो भी इन्सान अपनी जिंदगी में अमृतमंथन करना चाहता है, तो उसे पहली बात आवश्यक यह है कि पहले जान ले, तो पहली चीज़ है – ‘ज्ञानं’। ज्ञान, कौन सा ज्ञान, कौन सा ज्ञान? बड़ा ज्ञान नहीं, ब्रह्म-माया वाला ज्ञान नहीं, तो यही ज्ञान, यही जानना कि मेरे पास, मेरे खुद के

सम्मान और स्तुति को पचाना कठिन है    

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने 3 फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘सम्मान और स्तुति को पचाना कठिन है’ इस के बारे में बताया।  अपमान है ना भाई, अपमान सहन करना, पचाना बहोत आसान बात है। लेकिन मान-रिस्पेक्ट, स्तुति उसे पचाना, उसे सहन करना बहोत कठीन है। अपमान मेरा हो गया, मुझे दुख होता है, लेकिन इससे मेरा कुछ नुकसान नहीं होता। लेकिन जब मुझे मान मिलने लगता है, रिस्पेक्ट मिलने लगता