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खेळ मांडियेला

While explaining Sant Tukaram’s abhang ‘Khel Mandiyela Valvanti Ghai’, Sadguru Aniruddha (Bapu) described the beautiful relation that Lord Vitthal shares with each of his devotees. This relation is such that it cannot be stated in words and also cannot be compared with anything else. ही भक्तीची भूमी म्हणजेच वाळवंट. ही वाळवंट असून मात्र ही उगवते, ह्या लोकांच्या डोळ्यांना दिसत नाही. वाळवंटामध्ये जर तुम्ही एकादशीच्या दिवशी ह्या भक्तांना नाचताना बघितलं तर

सद्‍गुरु श्रीअनिरुध्द का संवाद

२३ जुलाई २०२१ अर्थात गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर सद्‍गुरु श्रीअनिरुध्द ने सभी श्रद्धावान मित्रों के साथ संवाद किया था। उस संवाद का व्हिडिओ यहां देख सकते है।  || हरि: ॐ || ||श्रीराम || || अंबज्ञ || ॥ नाथसंविध् ॥

सच्चिदानन्द सद्‌गुरुतत्त्व - भाग ४

सद्‍गुरुश्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व(Satchidanand Sadgurutattva)’ इस बारे में बताया। सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्तूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्गुरुतत्त्व’ इस बारे में बताया। गुरु के चरण क्या हैं? एक चरण जब शुभंकर होता है, दूसरा अशुभनाशन होता है। यानी balanced perfect. देखिए, एक जगह आप अच्छी चीज़ों को collect करते रहिए और साथ-साथ बुरी चीज़ों को निकालना रोक दीजिए, क्या होगा?

सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व - भाग २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व(Satchidanand Sadgurutattva)’ इस बारे में बताया। जो-जो अस्तित्व है जिंदगी में, उससे सिर्फ हमें आनंद ही मिले, ये किसके हाथ में हो सकता है? किसकी ताक़त हो सकती है? ‘सच्चिदानंद’ की ही यानी सद्‌गुरु की ही और ये आनंद तभी उत्पन्न हो सकता है, जब संयम है, राईट। एकार्थी – extremes बन जाओ तो आनंद कभी नहीं मिलेगा। संयम

सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व - भाग १

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व(Satchidanand Sadgurutattva)’ इस बारे में बताया। तो ये बात ऐसी है कि ये जो गुरुतत्त्व होता है, सद्‍गुरु जो होता है, उसके चरण ये क्या चीज़ है, ये पहले जानना चाहिये हमें। गुरु के चरण यानी क्या? गुरु के चरण, दो चरण जो होते हैं। एक कदम से वो शुभंकर कार्य करते हैं, दूसरे कदम से अशुभनाशन का कार्य

सद्‍गुरु महिमा - भाग ३

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धने १५ अप्रैल २०१० के पितृवचनम् में ‘सद्‍गुरु महिमा’ इस बारे में बताया।   जब भी चान्स मिले उसकी फोटो है, वो प्रत्यक्ष रूप में है या मूर्ती रूप में है, तब उसके चरणों पर जब हम मस्तक रखते हैं, उसकी चरणधूलि में जो हम हमारा मस्तक रखते हैं। हेमाडपंतजी की पहली भेंट कैसी है? हेमाडपंत उनके (साईनाथजी) चरणों को स्पर्श नहीं कर सके, साईबाबा रास्ते से जा

सद्‍गुरु महिमा - भाग २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धने १५ अप्रैल २०१० के पितृवचनम् में ‘सद्‍गुरु महिमा’ इस बारे में बताया।   ‘करावे मस्तके अभिवंदन’, इसका मतलब हेमापंतजी बता रहे हैं हमें कि एक बार गुरु के चरणों पर मस्तक रख दिया तो पूरी जिंदगी भर हमें इस भावना से रहना चाहिये कि मेरा मस्तक ये जो मेरे शरीर पर है, मेरे गर्दन पर है, ये ऍकच्युअली कहां है? दिखने में तो ऐसा स्ट्रेट है। मैं