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परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘राधाजी शुद्ध भाव हैं (Radhaji is shuddha bhaav)’ इस बारे में बताया।

राधाजी शुद्ध भाव हैं (Radhaji is shuddha bhaav) – Aniruddha Bapu‬ परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘राधाजी शुद्ध भाव हैं’ इस बारे में बताया। हम उपासना करते हैं, साधना करते रहते हैं, आराधना करते रहते हैं, पूजन करते हैं, अर्चन करते हैं। अपने अपने धर्म, पंथ, प्रदेश, रीतिरिवाज के अनुसार अलग अलग तरीके से कर सकते हैं। कोई प्रॉब्लेम नहीं। लेकिन

Aniruddha Bapu

भक्तमाता श्रीलक्ष्मी स्वयं ऐश्वर्य स्वरूपा हैं, वहीं भक्तमाता राधाजी ऐश्वर्य की जननी हैं । सागर और सागर का जल, सूर्य और सूर्यप्रकाश ये जिस तरह अलग नहीं हैं, उसी तरह राधाजी और श्रीलक्ष्मीजी अलग नहीं हैं । राधाजी और श्रीलक्ष्मी ये भक्तमाता आह्लादिनी के ही दो स्वरूप हैं, इस बारे में परम पूज्य सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने २५ मार्च २००४ के प्रवचन में बताया, जो आप इस व्हिडियो में

राधाजीही दैवी संपत्ती है। (Radha - The Divine treasure) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 25 March 2004

जो भी भगवानमें विश्वास करते है, वो मानते है की, भगवान के पास हमे सब कुछ देने की शक्ति है। भगवान के देने की शक्तिही राधाजी है। राधाजी भक्तोंको आराधना करने के लिए प्रेरित करती है। राधाजी हमे आनंद कैसे पाना है ये भी सिखाती है। इस बारेमें परम पुज्य बापूने अपने गुरुवार दिनांक २५ मार्च २००४ के हिन्दी प्रवचन मे मार्गदर्शन किया, वह आप इस व्हिडीओमें देख सकते है।

भक्तमाता राधाजी भक्त का जीवन मंगलमय बनाती हैं (Bhaktamata Radhaji makes devotees life auspicious) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 05 May 2005

Bhaktamata Radhaji makes devotees life auspicious – जीवन मंगलमय बनाना हो तो भगवान के साथ कभी भी अहंकार से पेश नहीं आना चाहिए । राधाजी स्वयं हंकाररूपा हैं, अहंकार कभी राधाजी में होता ही नहीं है । भक्तमाता राधाजी जिसके जीवन में सक्रिय रहती हैं, उसके जीवन में अहंकार का अपने आप ही लोप हो जाता है । राधाजी की कृपा से श्रद्धावान का जीवन मंगल कैसे होता है, यह

Radhaji

One of the names of Radhaji is ‘Krishnakala’. While explaining (in Hindi discourse dated 06 October 2005) the metaphysical meaning behind this name, initially, Sadguru Aniruddha dispels the fear of ‘Amavasya’ (new moon day) from our minds. Later, Bapu explains how this name, ‘Krishnakala’, is related to the ego in ‘me’ and how Radhaji destroys this undesired vice. राधाजी का एक नाम ‘कृष्णकला’ भी है। इस नाम के पीछे के

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: - २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के प्रवचन में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: – २’ इस बारे में बताया। जब वो, देखिये भाई, जब तक एकरूप थी, है अद्‍वैतता, दो नहीं थे, एक ही था। तो कौन किसकी भक्ति करेगा, कौन किससे प्यार करेगा? प्यार करने के लिए तो द्वैत तो होना चाहिए। दो लोग चाहिए एक-दूसरे से प्यार करते हैं। तो विभक्त होके ही, तो उसने प्यार करना शुरू

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के प्रवचन में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:’ इस बारे में बताया। जिसका भी सच्चा उपभोग लेना चाहते हो, जो मेरे हित के लिए हो, तो उसका उपभोग करने के पहले त्याग करना सिखो और ये सिखाने वाली, ये राधा हैं। क्योकिं वो त्याग करके ही उसने जनन किया है सारी सृष्टी का। इसी लिए अगर मैं उसे जननी मानता हूँ, मानता हूँ नहीं मानना

ॐ जनन्यै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के पितृवचनम् में ‘ॐ जनन्यै नम:(Om Jananyai Namah)’ इस बारे में बताया। ॐ जनन्यै नम:। जननी, यानी जन्म देने वाली, यानी माँ, माता। जो सबकी माता हैं, जो सबका जनन करती हैं ऐसी राधाजी को मेरा प्रणाम रहे। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ ऋषिवर कहते हैं कि जननी और जन्मभूमि, यानी मुझे जन्म देने वाली मेरी माता और मेरी जन्मभूमि जो है, मेरा देश

समयोग

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३० जून २००५ के पितृवचनम् में ‘समयोग’ इस बारे में बताया। योग जो है, भगवान, उस भगवती शक्ति और भक्त तीनों का एक समवान हिस्से में आना, एक ही ट्रान्ससेक्शन में, एक ही समय, एक ही पल, तीनों आनंद जो होते हैं, उसे योग कहते हैं। भगवान तो हमेशा आनंदस्वरूप हैं। भगवती जो हैं, वो तो आल्हादिनी स्वरूप हैं, आनन्दप्रदायक, उत्पन्न करनेवाली हैं। खुद आनन्दस्वरूप भगवान,

जिज्ञासा यह भक्ति का पहला स्वरूप

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अप्रैल २००५ के पितृवचनम् में ‘जिज्ञासा यह भक्ति का पहला स्वरूप है’ इस बारे में बताया। यह जिज्ञासा जो है, यही भक्ति का पहला स्वरूप है। भक्ति का पहला स्वरूप यानी राधाजी का पहला स्वरूप हर मानव के पास जिज्ञासा के रूप में रहता है। जिज्ञासा, भगवान के प्रति जिज्ञासा नहीं, इस विश्व के प्रति जिज्ञासा। यह सूरज कैसा है? यह पृथ्वी इतनी बड़ी है,