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तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के प्रवचन में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:’ इस बारे में बताया। जिसका भी सच्चा उपभोग लेना चाहते हो, जो मेरे हित के लिए हो, तो उसका उपभोग करने के पहले त्याग करना सिखो और ये सिखाने वाली, ये राधा हैं। क्योकिं वो त्याग करके ही उसने जनन किया है सारी सृष्टी का। इसी लिए अगर मैं उसे जननी मानता हूँ, मानता हूँ नहीं मानना

Seva Ghadli

– Madhavi Tilve The efforts I put in were as insignificant as standing up from rest Sleep is one such thing which, if one gives in, can make them lose track of time. Therefore, one needs someone who can rouse one from it and who else can do it, but one’s Sadguru? Our Sadguru lovingly accepts the responsibility of getting his children to do the right thing at the appropriate time. However, one

माझा विठू सावळा

सद्गुरु श्री श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १३ नोव्हेंबर २००३ च्या मराठी प्रवचनात ‘देव माझा विठू सावळा’ याबाबत सांगितले. ही चंद्रभागा म्हणजे संतांची ‘माऊली’. प्रत्येक भक्त काय म्हणतो की मला वाळू व्हायचयं, मला वाळवंट व्हायचंय. मला देवा तुझ्या पायीची वहाण व्हायचंय किंवा नामदेवांसारखा श्रेष्ठ भक्त म्हणतो की, परमेश्वरा, पांडुरंगा तुझा पाय माझ्या डोक्यावर नाही पडला तरी चालेल, पण तुझ्याकडे येणारा प्रत्येक भक्त आणि तुझ्याकडून परत जाणारा प्रत्येक भक्त हा माझ्यापेक्षा खूप श्रेष्ठ आहे

Tujhiya Charani

– Rupaliveera Daware, Bangalore   In our journey of life, we tend to gather experiences of the principle that is the Sadguru (Sadgurutatva). We tend to get closer to our Sadguru while savouring these experiences. Also, we tend to understand the ever-pervasive power of our Sadguru. We tend to realize that nothing is oblivious to him, not even a seemingly trivial thought. While we might be physically thousands of miles away from our Sadguru, we begin to

Saviuor

– Harshal Valunj, Kalyan     When a delicate body part such as an eye gets hurt, a person tends to experience restlessness or rather a sense of helplessness. If the eye, through which we see the world, dysfunctions, the plight of such a person can only be imagined. However, if one is protected by their Sadguru, the person may never lose their vision.    I was returning from school on my bicycle as per my daily routine

विठू सावळा

सद्गुरु श्री श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १३ नोव्हेंबर २००३ च्या मराठी प्रवचनात ‘देव माझा विठू सावळा’ याबाबत सांगितले. ‘देव माझा विठू सावळा। माळ त्याची माझिया गळा॥’ हा अभंग आम्ही लाख वेळा ऐकला असेल, पण आमच्या डोक्यात कधी हा प्रकाश पडला नाही. ‘देव माझा विठू सावळा। माळ त्याची माझिया गळा॥’ विठ्ठलाची माळ कधीच विठ्ठलाच्या गळ्यात राहिली नाही राजांनो. ती भक्तांच्या गळ्यासाठीच आसुसलेली असते. परंतु आम्ही कधीतरी, ही माळ तेवढ्या मनाने, प्रेमाने विठ्ठलाच्या गळ्यात

समय, times, साथ चलो, काल, भगवान, जीवन, क्षमा, Sadguru Shree Aniruddha

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३१ मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘समय के साथ चलो’ इस बारे में बताया। कईं लोगों को देखता हूँ, तो बस पढ़ते ही रहते हैं, कभी भी देखो खेलते रहते हैं मोबाईल पर, नहीं तो पढ़ते रहते हैं। इससे कुछ नहीं मिलता, ध्यान में रखिए। ये हमारे जो समय भगवान ने दिया हुआ है वो सिर्फ गिना-चुना है। कोई नहीं आज अगर सोचता है, कोई भी

कनेक्टिव्हिटी की दुनिया

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३१ मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘यह कनेक्टिव्हिटी की दुनिया है’ इस बारे में बताया। ये जमाना है मोबाईल्स का, नेट का, ट्वीटर, फेसबुक, वॉट्सऍप और ब्लॉग। ट्विटर, फेसबुक, वॉट्सऍप और ब्लॉग ये चार स्तंभ हैं। चंद नाम अलग हो जायेंगे आगे चलके, उनमें बहोत सारे सुधराव आ जायेंगे, बहुत चेन्जेस हो जायेंगे, but they have come to stay. ये जो चार प्रमुख स्तंभ हैं, ये

Upasana

– Kusum Darekar, Nashik   Once a person has Mothi Aai’s blessings and that of her son, our Sadguru Bapu, one becomes fearless to face any untoward incident. Many of us received the opportunity to obtain such blessings during the Shree Varada Chandika Prasannotsav. Shraddhavans were bestowed with a protective shield during this festival. Here is an experience that would stand testimony to this fact. Jyache Hrudayee Shreegurusmaran, Tayasee Kaiche Bhaay

समयोग

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३० जून २००५ के पितृवचनम् में ‘समयोग’ इस बारे में बताया। योग जो है, भगवान, उस भगवती शक्ति और भक्त तीनों का एक समवान हिस्से में आना, एक ही ट्रान्ससेक्शन में, एक ही समय, एक ही पल, तीनों आनंद जो होते हैं, उसे योग कहते हैं। भगवान तो हमेशा आनंदस्वरूप हैं। भगवती जो हैं, वो तो आल्हादिनी स्वरूप हैं, आनन्दप्रदायक, उत्पन्न करनेवाली हैं। खुद आनन्दस्वरूप भगवान,