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सुंदरकांड पठण उत्सव - १७ मई से २१ मई २०१६

संतश्रेष्ठ श्री तुलसीदास जी विरचित ‘श्रीरामचरितमानस’ यह ग्रंथ भारत भर के श्रद्धावान-जगत् में बड़ी श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है। इस ग्रन्थ के ‘सुंदरकांड’ का श्रद्धावानों के जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। सद्गुरु श्री अनिरुद्ध जी को भी ‘सुंदरकांड’ अत्यधिक प्रिय है।  सीतामैया की खोज करने हनुमान जी के साथ निकला वानरसमूह सागरतट तक पहुँच जाता है, यहाँ से सुन्दरकांड का प्रारंभ होता है। उसके बाद हनुमान जी

सुंदरकांड पठण उत्सव - १७ मे ते २१ मे २०१६

संतश्रेष्ठ श्रीतुलसीदासजी विरचित ‘श्रीरामचरितमानस’ हा ग्रंथ सर्व भारतभर श्रद्धावानजगतात अत्यंत जिव्हाळ्याचा आहे आणि त्यातील ‘सुंदरकांड’ ह्या भागाला श्रद्धावानांच्या जीवनात आगळंवेगळं स्थान आहे. सद्गुरु बापूंसाठीही ‘सुंदरकांड’ ही अतिशय प्रिय गोष्ट आहे. सीतामाईच्या शोधाकरिता हनुमंताबरोबर निघालेल्या वानरांचा समूह समुद्रकाठी पोहोचतो इथपासून सुंदरकांडाची सुरुवात होते. त्यानंतर हनुमंत समुद्रावरून उड्डाण करून लंकेत प्रवेश करून सीतेचा शोध घेतो?व लंका जाळून पुन्हा श्रीरामांच्या चरणांशी येऊन त्यांना वृत्तांत निवेदन करतो. मग बिभीषणही श्रीरामांकडे येतो व श्रीराम वानरसैनिकांसह

सप्तचक्र उपासना - अधिक सुलभतेने कशी करावी?

गुरुवार, दि. १५ ऑक्टोबर २०१५ रोजी परमपूज्य सद्‌गुरु बापूंनी “श्रीशब्दध्यानयोग” ही, श्रद्धावानांचा अभ्युदय (सर्वांगीण विकास) घडवून आणणारी सप्तचक्रांची उपासना श्रीहरिगुरुग्राम येथे सुरु केली. त्यानंतर संस्थेतर्फे ह्या उपासनेची माहिती देणारी पुस्तिकाही श्रद्धावानांकरिता उपलब्ध करण्यात आली. पुस्तिकेत दिलेल्या माहितीनुसार, श्रद्धावान पुस्तिकेतील चक्रांच्या प्रतिमेकडे पाहता पाहता त्या संबंधित चक्राचा गायत्री मंत्र आणि स्वस्तिवाक्य म्हणत घरी उपासना करू शकतात. गुरुवार, दि. २१ जानेवारी २०१६ रोजी आपल्या पितृवचनामध्ये सद्‌गुरु बापूंनी अकारण कारुण्याची पुन्हा एकदा प्रचिती

सप्तचक्र उपासना - अधिक सुलभतासे कैसे करे?

गुरुवार, दि. १५ अक्तूबर २०१५ को परमपूज्य सद्‌गुरु बापू ने “श्रीशब्दध्यानयोग” यह, श्रद्धावानों का अभ्युदय (सर्वांगीण विकास) करानेवाली सप्तचक्रों की उपासना श्रीहरिगुरुग्राम में शुरू की। उसके बाद, इस उपासना की जानकारी देनेवाली पुस्तिका भी संस्था की ओर से श्रद्धावानों के लिए उपलब्ध करायी गयी। पुस्तिका में दी गयी जानकारी के अनुसार, श्रद्धावान पुस्तिका में दी गयीं चक्रों की प्रतिमाओं की ओर देखते हुए उस संबंधित चक्र का गायत्री मंत्र और

"नित्य उपासना" और "हरिगुरु गुणसंकीर्तन" का अनन्यसाधारण महत्व - (The importance of "Daily Prayers" & "Hariguru Gunasankirtan") - Aniruddha Bapu Pitruvachanam 31st Dec 2015

नये साल का स्वागत करते समय, ३१ दिसंबर २०१५, गुरुवार के दिन सद्‌गुरु बापू ने अपने पितृवचन में, अगले साल याने २०१६ साल में “नित्य उपासना” (daily prayers) और “हरिगुरु गुणसंकीर्तन” के अनन्यसाधारण महत्व को विशद किया था। इस पितृवचन का महत्वपूर्ण भाग संक्षिप्त रूप में मेरे श्रद्धावान मित्रों के लिए इस पोस्ट के द्वारा मैं दे रहा हूँ। “अभी २०१६ साल चंद घण्टों में शुरु होनेवाला है । हर

गुरुवार पितृवचनम् - १० डिसेंबर २०१५

गुरुवार, दि. १० दिसम्बर २०१५ को श्रीहरिगुरुग्राम में परमपूज्य बापू ने एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण विषय पर पितृवचन दिया। श्रद्धावानों के लिए बहुत ही श्रद्धा का स्थान रहनेवाला त्रिविक्रम “श्रीश्वासम” में निश्चित रूप में कैसे कार्य करता है और मानव का अभ्युदय करानेवालीं ‘कार्यक्षमता’, ‘कार्यशक्ति’ और ‘कार्यबल’ इन तीन मूलभूत ज़रूरतों की आपूर्ति कैसे करता है, इस बारे में बापू ने किया हुआ पितृवचन संक्षिप्त रूप में मेरे श्रद्धावान मित्रों

Aniruddha Bapu pitruvacahanam

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में श्रीशब्दध्यानयोग- आज्ञाचक्र और सहस्रार चक्र उपासना के बारे में जानकारी दी।   आज्ञाचक्र के स्वामी स्वयं महाप्राण हनुमानजी है, अत एव आज्ञाचक्र प्रतिमा का पूजन महाप्राण सूक्तों से होगा। यह महाप्राण सूक्त बहुत ही सुंदर है। छांदोग्य उपनिषद्‌ में बहुत सुंदर महाप्राण सूक्त है, मुख्य प्राण को इतनी आसानी से कहीं समझाया नहीं गया है, जितना कि छांदोग्य

सहस्रार चक्र

सप्तचक्रांचे अ) गायत्रीमंत्र व ब) स्वस्तिवाक्ये :- 1. मूलाधार चक्र         गायत्रीमंत्र – ॐ भू: भुव: स्व:। ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ति: प्रचोदयात्॥     2. स्वस्तिवाक्य – मूलाधारगणेशाच्या कृपेमुळे मी संपूर्णपणे सुरक्षित आहे. मूलाधारगणेश की कृपा से मैं संपूर्ण रूप से सुरक्षित हूँ। By the grace of the MuladharGanesh, I am completely safe and secure मूलाधारगणेशस्य कृपया अहं संपूर्णत: सुरक्षित:।  2. स्वाधिष्ठान चक्र    

गुरुकुल, जुईनगर येथील ‘श्रीअश्वत्थ मारुती पूजन’ (Shree Ashwattha Maruti Poojan)

परमपूज्य सद्‍गुरु बापू नेहमीच आपल्या बोलण्यातून श्रीहनुमंताचा (Shree Hanumant) उल्लेख “माझा रक्षकगुरु” असा करतात व बापूंनी तसे स्पष्टपणे आपल्या श्रीमद्‍पुरुषार्थ ग्रंथराजात लिहीलेही आहे. त्यांच्याच बोलण्यानुसार प्रत्येक भक्ताची भक्तीमार्गाची सुरुवात हनुमंतापासूनच होते. श्रीहरिगुरुग्राम येथे दर गुरुवारी होणा-या सांघिक उपासनेमध्येसुद्धा “ॐ श्रीरामदूताय हनुमंताय महाप्राणाय महाबलाय नमो नम:” ह्या जपाचा समावेश आहे आणि स्टेजवरील मांडणीमध्ये बापूंच्या बैठकीच्या मागे आपण रक्षकगुरु श्रीहनुमंताची मोठी तसबीरही बघतो. एवढेच नव्हे तर श्रीअनिरुध्द गुरुक्षेत्रम्‌मधील श्रीमद्‌पुरुषार्थ पुरुषोत्तम यंत्र (क्षमायंत्र)

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परमपूज्य सद्‍गुरू श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने २० नवंबर २०१४ के हिंदी प्रवचन के दौरान ‘भगवान से प्यार के साथ ठेंठ बातें करें’ ‘Speak Directly To God With Love’ इस बारे में बताया। भगवान को हासिल करने के लिए किसी दलाल की आवश्यकता नही होती है। ऋगवेद, यजुर्वेद और सामवेद में ठेंठ भगवान से करनेवाली प्रार्थनाएं दी गयी हैं। अथर्ववेद में मन्त्र-तन्त्र आदि का गलत इस्तेमाल करनेवाले जातुधानों का नाश