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mothi-aai-navratri

हरि ॐ, दैनिक “प्रत्यक्ष”च्या तुलसीपत्र अग्रलेख मालिकेतील दि. २० ऑगस्ट २०१७ रोजीच्या अग्रलेखामध्ये परमपूज्य सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्धांनी नवरात्रीतील चतुर्थीच्या रात्र जागराणाचे महत्त्व सांगताना लिहिले होते की… “नवरात्रीच्या चतुर्थीच्या दिवस-रात्रीची ही ‘कूष्माण्डा नवदुर्गा’ नायिका आहे व ह्यामुळेच नवीन शुभकार्यास मानवाने नवरात्री-चतुर्थीस सुरुवात केल्यास, त्याचे कार्य सुलभ बनते. जीवनात काहीतरी श्रेष्ठ व उत्कृष्ट करून दाखविण्याची ज्या श्रद्धावानाची इच्छा असते, त्याने नवरात्रीतील चतुर्थीच्या रात्री अवश्य जागरण करून आदिमातेच्या ग्रंथांचे वाचन करावे व दिवसा तिचे

नवरात्रिपूजन करने की शुद्ध, सात्त्विक, सरल परन्तु तब भी श्रेष्ठतम पवित्र पद्धति – भाग २

१. इस आश्विन नवरात्रि उत्सव से परमपूज्य सद्‍गुरु अनिरुद्ध बापू के द्वारा दी गयी नवरात्रि-पूजन की विशेष पद्धति में, परात की मृत्तिका (मिट्टी) में गेहूँ (गोधूम) बोने की विधि का समावेश है। इस विधि के अनुसार बोये जाने वाले गेहूँ अंबज्ञ इष्टिका के मुख के सामने न बोते हुए, उन्हें अन्य सभी तरफ से बोयें, जिससे कि नवरात्रि की अवधि में गेहूँ के तृणांकूरोंसे से आदिमाता का मुख ढँक न जाये। संदर्भ के

Ashwin-Navaratri

हरि ॐ, सध्याच्या आश्विन नवरात्रोत्सवातील, परमपूज्य सद्‍गुरुंनी दिलेल्या विशेष पूजन पद्धतीमध्ये पहिल्या दिवशी सकाळी करावयाच्या प्रतिष्ठापना पूजनातील क्र.१९च्या उपचारानुसार झेंडूच्या फुलांची माळ परातीभोवती (अंबज्ञ इष्टिकेच्या मांडणीभोवती) अर्पण करावयाची आहे. दुसर्‍या दिवसापासून सायंकाळच्या नित्य पूजनामध्ये नवीन माळ अर्पण करतेवेळी, आदल्या दिवशीची माळ / माळा पूजन मांडणीत तशाच ठेवाव्यात किंवा न ठेवाव्यात हे श्रद्धावान स्वत:च्या आवडीनुसार व सोईनुसार ठरवू शकतात. प्रतिष्ठापना पूजन व नित्य पूजनाच्या उपचारांनुसार, मोठ्या आईला दररोज अनुक्रमे सकाळी व

नवरात्रिपूजन करने की शुद्ध, सात्त्विक, सरल परन्तु तब भी श्रेष्ठतम पवित्र पद्धति

आज दिनांक १४ सितंबर २०१७ के ’दैनिक प्रत्यक्ष’ में प्रकाशित अग्रलेख में बतायेनुसार ’नवरात्रिपूजन’ का विधिविधान निम्नलिखित है। यह विधिविधान हिन्दी तथा मराठी इन दोनों भाषाओं में दिया गया है। हर श्रद्धावान अपने घर में इस प्रकार पूजन कर सकता है।   प्रतिष्ठापनाः १)    आश्‍विन नवरात्रि के पहले दिन एक इष्टिका को गीले टॉवेल से, हलके हाथों से साफ कर लीजिए।              (रामनामबही के कागज़ से बनी इष्टिका यदि

नवरात्रिपूजन करण्याची शुद्ध, सात्त्विक, सोपी व तरीही श्रेष्ठतम पवित्र पद्धती

आज दिनांक १४ सप्टेंबर २०१७ च्या ’दैनिक प्रत्यक्ष’ मधील अग्रलेखात दिल्याप्रमाणे ’नवरात्रीपूजनाचे’ विधीविधान खालीलप्रमाणे आहे. हिंदी व मराठी या दोन्ही भाषांमध्ये हे विधीविधान देण्यात आले आहे. प्रत्येक श्रद्धावान आपल्या घरी अशा प्रकारे नवरात्रीपूजन करु शकतो.  प्रतिष्ठापनाः १)    अश्विन नवरात्रीच्या प्रथम दिवशी एक इष्टिका ओल्या पंचाने, हलक्या हाताने स्वच्छ करून घ्यावी.       (रामनामवहीच्या कागदापासून बनविलेली इष्टिका मिळाल्यास वरील कृती करण्याची आवश्यकता नाही.) २)    नंतर त्या इष्टिकेस सर्व बाजूंनी कुठल्याही

Aniruddha Bapu told in his Pitruvachanam dated 16 Mar 2017 about, Panchamukha-Hanumat-kavacham Explanation - 11 (Kahehu taat as mor pranaama)

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १६ मार्च २०१७ के पितृवचनम् में पंचमुखहनुमत्कवचम् के विवेचन में ‘सुन्दरकाण्ड में हनुमानजी को ‘तात’ कहकर श्रीराम और जानकी ने संबोधित किया है’ इस बारे में बताया।    हम लोग जब सुंदरकांड पढते हैं, अभी तो बहुत लोगों ने छोड़ भी दिया है, मैंने कभी से बोला है ना, २००३ से कि सुंदरकांड पढ़िए, पढ़िए, पढ़िए, पढ़िए। पहले तो दो तीन साल बहुत जोर

Shivapanchakshari Stotra

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने ०२ मार्च २०१७ के पितृवचनम् में ‘शिवपंचाक्षरी स्तोत्र’ के बारे में बताया। तो हम लोग ये जानते हैं, पंचाक्षरी मंत्र, ॐ नमः शिवाय, इसमें बहुत सारी ताकद है, भारत में सबसे ज्यादा मंदिर किसके हैं, तो शिवजी के हैं और हनुमानजी के हैं। हनुमानजी तो बहुत जगह, शिवजी के ही साक्षात अवतार माने जाते हैं, उनकी पूँछ जो है वो उमाजी का रूप मानी

श्रीचण्डिका एक्झाल्टेशन आर्मी के प्रशिक्षण की नई बॅच

हरि ॐ. गुरुवार, दि. १७ मार्च २०१७ को सद्‍गुरु अनिरुद्ध बापू ने पितृवचन के बाद एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सूचना की। इस सूचना में, ‘रामराज्य’ संकल्पना का एक अंग रहनेवाली ‘श्रीचण्डिका एक्झाल्टेशन आर्मी’ के प्रशिक्षण वर्ग की दूसरी बॅच जल्द ही शुरू की जायेगी, ऐसा बापू ने घोषित किया। अगले गुरुवार, यानी दि. २३ मार्च २०१७ को, इस प्रशिक्षण वर्ग के प्रवेश के लिए आवश्यक फॉर्म्स, श्रीहरिगुरुग्राम में एक काउंटर पर

साईनिवास

साईभक्तों के दिल में श्री साईसत्‌चरित इस ग्रंथ के प्रति बहुत ही आत्मीयता होती है। कई श्रद्धावान इस अपौरुषेय ग्रंथ का नियमित रूप से पारायण करते हैं। इस ग्रंथ का लेखन जिस वास्तु में किया गया, वह वास्तु अर्थात् श्री साईसत्‌चरितकार श्री. गोविंद रघुनाथ दाभोलकरजी (हेमाडपंत) का बांद्रा स्थित निवासस्थान – साईनिवास । श्रीसाईसत्‌चरित के ४०वें अध्याय में हम, सन १९१७ में श्री साईनाथजी की तसवीर के साईनिवास में हुए