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कृष्णसंयुता राधा (Krishna-sanyuta Radha) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 19 February 2004

  Krishna-sanyuta Radha – कृष्णसंयुता यह राधाजी का महज नाम नहीं है, बल्कि यह तो राधाजी की स्थिति है, यह राधाजी की आकृति है, यह राधाजी का भाव है । दर असल कृष्णसंयुता ही राधाजी का मूल स्वरूप है  । भरोसा यह कृष्णसंयुत ही होता है और इसीलिए भरोसा यह तत्त्व राधाजी से जुडा है । राधाजी के कृष्णसंयुता इस नाम के बारे में सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध ने अपने १९ फ़रवरी

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ॐ   रामवरदायिनी श्रीमहिषासुरमर्दिन्यै नम:। इस महिषासुरमर्दिनी ने ही, इस चण्डिका ने ही, इस दुर्गा ने ही सब कुछ उत्पन्न किया। प्रथम उत्पन्न होनेवाली या सर्वप्रथम अभिव्यक्त होनेवाली वह एक ही है। फिर वह उन तीन पुत्रों को जन्म देती है और फिर सबकुछ शुरू होता है । हमने बहुत बार देखा, हमें यह भी समझ में आया की यह एकमात्र ऐसी है, जिसका प्राथमिक नाम, पहला नाम ही उसका

English Translation of Param Poojya Sadguru Shri Aniruddha Bapu's Speech on '13 Points Programme'

We are gathered here today with a special enthusiasm; I know. Basically, I am a person who loves the world of music, who feels at peace in the company of nature. All types of music interest me; all, ranging from folk music to classical music, and so there was this song that I used to like. Yes, I used to. “तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती एक ख़्वाब सा देखा है

हरि ॐ मित्रांनो! ३ ऑक्टोबर २००२ रोजी बापूंनी प्रथम १३ कलमी कार्यक्रम जगासमोर आणला. आज बापूंच्या त्या ऐतिहासिक भाषणाला १० वर्ष पूर्ण झाली. आपल्यातले जे ह्या ऐतिहासिक क्षणी उपस्थित होते, त्यांच्या मनात बापूंनी ह्या त्यांच्या भाषणाला आगळी-वेगळी, अगदी विलक्षण अशा पद्धतीने केलेल्या सुरुवातीची अजूनही एक खास आठवण असेलच. ह्या भारत देशभर भ्रमण करताना प्रत्येक गरीब माणसाच्या दीन व हतबल चेहऱ्यावरच्या भावाने बापूंना दु:ख झालं आणि तो भाव त्यांना “तसवीर बनाता

ll  अवधूतचिंतन श्रीगुरुदेवदत्त ll ll ॐ नमश्चण्डिकायै ll Sadguru Mahima अन्य सभी देवी-देवता तो भ्रमित करने वाले हैं; केवल गुरु ही ईश्‍वर हैं l एक बार अगर तुम उन पर अपना विश्‍वास स्थिर कर लोगे तो वे पूर्व निर्धारित विपदाओं का भी सामना करने में सहायता करेंगे l – अध्याय १० ओवी ४ सद्‍गुरु  की महती बयान करनेवाली अनेक ओवीयाँ श्रीसाईसच्चरित में आती रहती है। लेकिन मेरे मन में मात्र