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कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०६ अक्तूबर २००५ के हिंदी पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम:’ इस बारे में बताया। वो स्वयं भक्तिरूपिणी हैं, ये राधा भक्तिरूपिणी हैं और हम लोग जानते हैं कि श्रीमद्‍भागवत में एक श्लोक है, नारद को भगवान स्वयं श्रीकृष्ण, स्वयं श्रीकृष्ण भगवान कह रहे हैं, ‘मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’ ‘हे नारद, जहाँ मेरे भक्त भजन-पूजन करते

देव माझा विठू सावळा - भाग ४

सद्गुरु श्री श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १३ नोव्हेंबर २००३ च्या मराठी प्रवचनात ‘देव माझा विठू सावळा – भाग ४’ याबाबत सांगितले. …आणि हा जो खेळ मांडलाय, तो कोणी मांडलाय? त्या विठोबाने मांडलाय की त्या चंद्रभागेने मांडलाय की त्या वैष्णवांनी मांडलाय? आम्हाला प्रश्न पडतो. एक तर बाबा खेळ मांडलाय, तर तो त्या विठ्ठलाने मांडलेला असला पाहिजे कि हे जे वैष्णव नाचती-गाती म्हणताहेत, त्या वैष्णवांनी मांडलेला असला पाहिजे किंवा त्या चंद्रभागेने मांडलेला असला पाहिजे.

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: - २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के प्रवचन में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: – २’ इस बारे में बताया। जब वो, देखिये भाई, जब तक एकरूप थी, है अद्‍वैतता, दो नहीं थे, एक ही था। तो कौन किसकी भक्ति करेगा, कौन किससे प्यार करेगा? प्यार करने के लिए तो द्वैत तो होना चाहिए। दो लोग चाहिए एक-दूसरे से प्यार करते हैं। तो विभक्त होके ही, तो उसने प्यार करना शुरू

माझा विठू सावळा

सद्गुरु श्री श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १३ नोव्हेंबर २००३ च्या मराठी प्रवचनात ‘देव माझा विठू सावळा’ याबाबत सांगितले. ही चंद्रभागा म्हणजे संतांची ‘माऊली’. प्रत्येक भक्त काय म्हणतो की मला वाळू व्हायचयं, मला वाळवंट व्हायचंय. मला देवा तुझ्या पायीची वहाण व्हायचंय किंवा नामदेवांसारखा श्रेष्ठ भक्त म्हणतो की, परमेश्वरा, पांडुरंगा तुझा पाय माझ्या डोक्यावर नाही पडला तरी चालेल, पण तुझ्याकडे येणारा प्रत्येक भक्त आणि तुझ्याकडून परत जाणारा प्रत्येक भक्त हा माझ्यापेक्षा खूप श्रेष्ठ आहे

भगवान पर आपका भरोसा जितना बढ़ता है, उतना आपका आत्मविश्वास बढ़ता है    

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अप्रैल २००५ के पितृवचनम् में ‘भगवान पर आपका भरोसा जितना बढ़ता है, उतना आपका आत्मविश्वास बढ़ता है’ इस बारे में बताया। राधाजी के पास जितना आत्मविश्वास है, उतना किसी के भी पास नहीं होता। उनके पास सबसे ज्यादा आत्मविश्वास होता है। क्योंकि आत्मविश्वास ये उतना ही होता है, किसीके भी पास, जितनी उसके पास भक्ति होती है। अगर मेरे पास आत्मविश्वास कम है, इसका मतलब

गुरु-आज्ञा

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ इस बारे में बताया। गुरु-आज्ञा-परिपालनं, सर्वश्रेयस्करं। गुरु-आज्ञा का पालन करना ही सबसे श्रेय, श्रेयस्कर चीज़ है। सर्वश्रेय यानी सर्व बेस्ट जो है, वो हमें किससे प्राप्त होता है? गुरु-आज्ञा से प्राप्त होता है, राईट। इसी लिए ‘गुरुचरण पायस’ कहा गया है। ‘The Discipline’ बाकी की only they are a Dicipline. ये बाकी के डिसील्पीन्स से

Aniruddha-Aadesh-Pathak

Hari Om, We are pleased to announce the launch of our website of ‘Shree Aniruddha Aadesh Pathak’. This website will provide information about the various Devotional Services that our organization undertakes, under the divine guidance & directions of Sadguru Shree Aniruddha. This website also has an online donation page which will allow Shraddhavans to make donations towards these Devotional Services. The donation is applicable for tax exemption under Section 80G.

सद्गुरु बापूजी के घर के गणेशोत्सव संबंधी सूचना

हरि ॐ, हर वर्ष सद्गुरु बापूजी के घर पर ढाई दिन का गणेशोत्सव बडे हर्षोल्लास से भक्तिमय वातावरण में मनाया जाता है तथा कई श्रद्धावान बापूजी के घर पर गणेशजी के दर्शन के लिए मनोभाव से, बडी संख्या में आते हैं। परंतु इस वर्ष कोविड-१९ की भीषण परिस्थिति के कारण, इच्छा होते हुए भी, किसी भी व्यक्ति के लिए गणेशजी के दर्शन खुले नहीं होंगे, कृपया सभी इस बात पर

Ghorkashtodharan-Pathan

हरि ॐ, हर साल संस्था द्वारा पूरे श्रावण महीने में घोरकष्टोद्धरण स्तोत्र पठन का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस साल कोरोना वायरस, “कोविद – १९” महामारी के गंभीर हालातों के कारण यह कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जा सकता। श्रद्धावानों की इस मुश्किल को मद्देनज़र रखते हुए, संस्था द्वारा (पिछले कुछ सालों के रेकॉर्डिंग का इस्तेमाल करके) इस पठन का लाभ उठाने का प्रबन्ध किया गया है। श्रद्धावान श्रावण महीने

'अभिसंवाहन’, Thursday Pravachan

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने १५ अप्रैल २०१० के पितृवचनम् में ‘अभिसंवाहन’ शब्द का अर्थ’ इस बारे में बताया। अभी चरणसंवाहन करना है, अभी क्या कहते हैं, मस्तक, ‘करावे मस्तके अभिवंदन। तैसेचि हस्तांही चरणसंवाहन।’ ‘तैसेचि – तैसेचि’ यानी ‘वैसे ही’।, तैसेचि का मतलब है वैसे ही। यानी जैसे अभिवंदन किया, तो यहाँ संवाहन कैसा होना चाहिए? अभिसंवाहन होना चाहिए। चरणों का संवाहन तो मस्तक का, एक उपचार तो हम जान गए,