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सद्‍गुरुतत्त्व की भक्ति से स्वयं को पहचानो (Know Yourself by SadguruTattva's Bhakti) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 8 May 2014

सद्‍गुरुतत्त्व की भक्ति से स्वयं को पहचानो ( Know Yourself by SadguruTattva’s Bhakti) स्वयं को न पहचानना यह मानव की सबसे बडी गलती है l जीवन में किन बातों के कारण मुझे शान्ति मिलती है और किन बातों के कारण अशान्ति सताती है यह जानकर आचरण करना चाहिए l सद्‍गुरुतत्त्व की भक्ति से मानव स्वयं को पहचान सकता है l इसलिए साईनाथ से यह मन्नत मानना जरूरी है कि हे

आद्यपिपांचे सद्‌गुरु साईनाथ ( Adyapipa's Sadguru Sainath )

बापू (अनिरुद्धसिंह), सूचितदादा व मी, काकांच्या समाधीस्थानमला नमस्कार करताना आज श्रीकृष्ण जयंती; श्रावणातील कालाष्टमी म्हणजेच गोकुळ अष्टमी. आज सर्व बापू (अनिरुद्धसिंह) कुटुंबीयांकरिता हा एक विशेष दिवस. आजच्याच दिवशी आद्यपिपांचे म्हणजे “काकांचे” निर्वाण झाले; मी, दादा त्यांना “काका” म्हणूनच हाक मारत असू.काकांची एक गोष्ट मी लहान असताना नेहमीच आश्चर्यकारक वाटायची. रोज झोपताना ते साईनाथांच्या फोटोकडे बघत झोपायचे आणि दिवा बंद करायला सांगायचे. हे दिवा बंद करायचं काम ब-याचदा माझ्याकडे असायचं. मी

ll  अवधूतचिंतन श्रीगुरुदेवदत्त ll ll ॐ नमश्चण्डिकायै ll Sadguru Mahima अन्य सभी देवी-देवता तो भ्रमित करने वाले हैं; केवल गुरु ही ईश्‍वर हैं l एक बार अगर तुम उन पर अपना विश्‍वास स्थिर कर लोगे तो वे पूर्व निर्धारित विपदाओं का भी सामना करने में सहायता करेंगे l – अध्याय १० ओवी ४ सद्‍गुरु  की महती बयान करनेवाली अनेक ओवीयाँ श्रीसाईसच्चरित में आती रहती है। लेकिन मेरे मन में मात्र

नवरात्रिपूजन करण्याची शुद्ध, सात्त्विक, सोपी व तरीही श्रेष्ठतम पवित्र पद्धती - भाग २

१. ह्या आश्विन नवरात्रोत्सवापासून परमपूज्य सद्‍गुरुंनी दिलेल्या नवरात्रीपूजनाच्या विशेष पद्धतीमध्ये परातीतील मृत्तीकेत (मातीत) गहू (गोधूम) पेरण्याचा विधी समाविष्ट आहे. ह्या विधीनुसार पेरण्यात येणारे गहू अंबज्ञ इष्टिकेच्या मुखासमोर न पेरता, ते इतर सर्व बाजूंनी पेरावेत, जेणेकरून नवरात्रीच्या काळात गव्हाच्या दाण्यांना फुटलेल्या तृणांनी मोठ्या आईचे मुख झाकले जाणार नाही. संदर्भासाठी सोबतचा फोटो पहावा. २. परमपूज्य सद्‌गुरुंनी विशेष पद्धतीने सांगितल्याप्रमाणे व त्यानुसार मी ब्लॉगवर दिल्याप्रमाणे नवरात्रि पूजन करण्याची शुद्ध, सात्त्विक, सोपी व तरीही

कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०६ अक्तूबर २००५ के हिंदी पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम:’ इस बारे में बताया। वो स्वयं भक्तिरूपिणी हैं, ये राधा भक्तिरूपिणी हैं और हम लोग जानते हैं कि श्रीमद्‍भागवत में एक श्लोक है, नारद को भगवान स्वयं श्रीकृष्ण, स्वयं श्रीकृष्ण भगवान कह रहे हैं, ‘मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’ ‘हे नारद, जहाँ मेरे भक्त भजन-पूजन करते

ॐ कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम: – १ ’ इस बारे में बताया। हरि: ॐ, ॐ कृष्णायै नम:। भगवान श्रीकृष्ण को अगर कह दें हम ॐ श्रीकृष्णाय नम:, ये कृष्णायै नम:। यानी भगवती राधा का नाम यहाँ कृष्णा है, कृष्ण नहीं कृष्णा। अब ‘कृष्ण’ नाम के कितने अर्थ होते हैं, हम जानते हैं, बहुत अर्थ होते हैं। एक अर्थ सीधा-सादा है, कृष्ण यानी

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: - २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के प्रवचन में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: – २’ इस बारे में बताया। जब वो, देखिये भाई, जब तक एकरूप थी, है अद्‍वैतता, दो नहीं थे, एक ही था। तो कौन किसकी भक्ति करेगा, कौन किससे प्यार करेगा? प्यार करने के लिए तो द्वैत तो होना चाहिए। दो लोग चाहिए एक-दूसरे से प्यार करते हैं। तो विभक्त होके ही, तो उसने प्यार करना शुरू

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के प्रवचन में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:’ इस बारे में बताया। जिसका भी सच्चा उपभोग लेना चाहते हो, जो मेरे हित के लिए हो, तो उसका उपभोग करने के पहले त्याग करना सिखो और ये सिखाने वाली, ये राधा हैं। क्योकिं वो त्याग करके ही उसने जनन किया है सारी सृष्टी का। इसी लिए अगर मैं उसे जननी मानता हूँ, मानता हूँ नहीं मानना

ॐ जनन्यै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के पितृवचनम् में ‘ॐ जनन्यै नम:(Om Jananyai Namah)’ इस बारे में बताया। ॐ जनन्यै नम:। जननी, यानी जन्म देने वाली, यानी माँ, माता। जो सबकी माता हैं, जो सबका जनन करती हैं ऐसी राधाजी को मेरा प्रणाम रहे। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ ऋषिवर कहते हैं कि जननी और जन्मभूमि, यानी मुझे जन्म देने वाली मेरी माता और मेरी जन्मभूमि जो है, मेरा देश

समय, times, साथ चलो, काल, भगवान, जीवन, क्षमा, Sadguru Shree Aniruddha

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३१ मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘समय के साथ चलो’ इस बारे में बताया। कईं लोगों को देखता हूँ, तो बस पढ़ते ही रहते हैं, कभी भी देखो खेलते रहते हैं मोबाईल पर, नहीं तो पढ़ते रहते हैं। इससे कुछ नहीं मिलता, ध्यान में रखिए। ये हमारे जो समय भगवान ने दिया हुआ है वो सिर्फ गिना-चुना है। कोई नहीं आज अगर सोचता है, कोई भी