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The Spiritual Transformation of the Mind through God's Stories

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धने २० फरवरी २०१४ के पितृवचनम् में ‘भगवान की कथाओं के द्वारा मन में आध्यात्मिक परिवर्तन’ इस बारे में बताया। तो वैसे ही जब भगवान की कथा पढते हैं, तब वही कथा अपनी जिंदगी में भी, उसका कनेक्शन अपने-आप जोडते रहते हैं। श्रीकृष्ण की कथा आती है, बाललीला की, हम लोग भी कितना मजा करते थे, हम अगर किशन जी के साथ उस समय होते तो कितना मजा

Aniruddha Bapu told in his Pitruvachanam dated 28 Apr 2016 that God never breaks His promises

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २८ एप्रिल २०१६ के पितृवचनम् में ‘भगवान कभी भी अपना वादा तोडते नहीं हैं’, इस बारे में बताया। जब हम संघर्ष को युद्ध मानते हैं, और हमारा संघर्ष सबसे ज्यादा किसके साथ रहता है, भगवान के साथ। संघर्ष है तब तक अच्छा है, भगवान के साथ जब युद्ध करने लगते हैं, तब महिषासुर के सैनिक बन गये। हम बहुत बार सोचते हैं, बापू हम

Aniruddha Bapu told in his Pitruvachanam dated 28 Apr 2016 that Ganapati removes the bad thoughts)

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २८ एप्रिल २०१६ के पितृवचनम् में ‘गणपतिजी बुरे विचारों को निकाल देते हैं’, इस बारे में बताया। ब्रह्मर्षि भारद्वाज कहते हैं, अपने शिष्य से, एक गणपति का रहस्य बताते हुए, कि हाथ में गणपतिजी ने दांत किसलिए रखकर वे मूलाधार में बैठे हुए हैं, इसलिए कि मूल में ही गलत विचार, जब निकलने लगते हैं, तब जो गणपति का सही भक्त है, तो गणपति

परमात्मा अपने हर एक भक्त पर फोकस्ड रहता है। (Paramatma is focussed on His every Bhakta) - Aniruddha Bapu‬ Hindi‬ Discourse 08 Jan 2015

परमपूज्य सद्‍गुरू श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ०८ जनवरी २०१५ के हिंदी प्रवचन में ‘परमात्मा अपने हर एक भक्त पर फोकस्ड रहता है’ (Paramatma is focussed on His every Bhakta) इस बारे में बताया। परमात्मा अपने हर भक्त पर फोकस्‍ड रहता है। परमात्मा इस सृष्टी के सभी जीवों का, भक्तों का भला चाहते हैं। भगवान, सद्‍गुरुतत्त्व अपने भक्तों की मदत करने के लिये जिस रुप की जरुरत है, वह रुप

भगवान सर्वसमर्थ है (God is omnipotent) - Aniruddha Bapu‬

परम पूज्य सद्‍गुरू श्री अनिरुद्ध बापूने उनके ०८ जनवरी २०१५ के हिंदी प्रवचन में डॉ. टेस्ला का उदाहरण देकर ‘भगवान सर्वसमर्थ है (God is omnipotent) ’ इस बारे में समझाया। एक विश्वास असावा पुरता, कर्ता हर्ता साई ऐसा। यह साईनाथ सब कुछ कर सकता है। हमारे मन में आता है- ये कैसे हो सकता है? ये नही हो सकता है। लेकीन हो सकता है। वह जरूर कर सकता है। प्रार्थना

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हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ! पहले हमें अब श्रीसूक्त सुनना है। श्रीसूक्त… वेदों का यह एक अनोखा वरदान है जो इस… हमने उपनिषद् और मातृवात्सल्यविंदानम् में पढ़ा है कि लोपामुद्रा के कारण हमें प्राप्त हुआ है…महालक्ष्मी और उसकी कन्या लक्ष्मी… इस माँ-बेटी का एकसाथ रहनेवाला पूजन, अर्चन, स्तोत्र, स्तवन… सब कुछ… यानी यह ‘श्रीसूक्तम्’। तो आज पहले… स़िर्फ आज से हमें शुरुआत करनी है। ‘श्रीसूक्तम्’ का पाठ हमारे महाधर्मवर्मन् करनेवाले हैं।

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  हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ. पहिल्यांदा आपल्याला आता श्रीसूक्त ऐकायचं आहे. श्रीसूक्त…वेदांमधील एक अशी अनोखी देणगी आहे की जी ह्या…आपण उपनिषदामध्ये आणि मातृवात्सल्यविंदानम् मध्ये बघितलंय की लोपामुद्रेमुळे आपल्याला मिळाली…महालक्ष्मी आणि तिची कन्या लक्ष्मी…ह्या मायलेकींचं एकत्र असणारं पूजन, अर्चन, स्तोत्र, स्तवन…सगळं काही…म्हणजे हे ‘श्रीसूक्तम्’. तर आज पहिल्यांदा…फक्त आजपासून सुरु करायचं आहे आपल्याला ‘श्रीसूक्तम्’. आपले महाधर्मवर्मन म्हणणार आहेत.   हरि ॐ. अर्थ आज आपल्याला कळला नसेल…काही हरकत नाही. पण ह्या आईचं…माझ्या आदिमातेचं

नव्या फोरमची सुरुवात : साई द गाइडिंग स्पिरिट (Sai the Guiding Spirit) – हेमाडपंत - २ (Hemadpant)

हेमाडपंतांविषयी (Hemadpant) आपल्याला काही महत्त्वाच्या गोष्टी लक्षात घ्याव्या लागतात. (१) हेमाडपंत(Hemadpant) ‘रेसिडेंट मॅजिस्ट्रेट’ म्हणून काम करत होते; म्हणजेच ते ‘उच्चपदस्थ’ होते. (२) हेमाडपंत साईनाथांकडे जाण्याचे श्रेय काकासाहेब दीक्षित(Kakasaheb Dixit) व नानासाहेब चांदोरकर (Nanasaheb Chandorkar) यांना देतात. (संदर्भ अ.२/ओ.1०१) (३) हेमाडपंतांच्या मनाची स्थिती साईनाथाकडे(Sai) येण्याच्या वेळेस कशी होती? तर अतिशय उद्विग्न. इथून हेमाडपंतांची गोष्ट चालू होते. काकासाहेब दिक्षित हेमाडपंतांना भेटतात, साईबाबांचा(Saibaba) महिमा सांगतात व त्यांना साईनाथांकडे येण्याचा आग्रह करतात आणि हेमाडपंत

कहे साई वही हुआ धन्य धन्य| हुआ जो मेरे चरणों में अनन्य || (Sai the Guiding Spirit Saisatcharit)

पिछले ड़ेढ दो साल से सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी ‘श्रीसाईसच्चरित’ (Shree Saisatcharit) पर हिन्दी में प्रवचन कर रहे हैं। इससे पहले बापु ने श्रीसाईसच्चरित पर आधारित ‘पंचशील परीक्षा’ (Panchshil Exam) की शुरुआत की और उन परीक्षाओं के प्रॅक्टिकल्स के लेक्चर्स भी लिये। उस समय हम सब को श्रीसाईसच्चरित नये से समझ में आया। 11 फरवरी 1999 में बापु ने पंचशील परीक्षा क्यों देनी चाहिए, यह हमें समझाया। बापु कहते हैं, ‘‘हम सबको

साई म्हणे तोचि तोचि झाला धन्य | झाला जो अनन्य माझ्या पायीं ||

आज मागची दीड दोन वर्ष बापूंची “श्रीसाईसतचरित्रावर” हिंदीतून प्रवचनं चालू आहेत. त्याआधी बापूंनी श्रीसाईसच्चरित्रावरील “पंचशील परीक्षा” सुरू केल्या (फेब्रुवारी १९९८) व त्या परिक्षांच्या प्रॅक्टिकल्सची लेक्चर्सही घेतली. त्यावेळेस आम्हा सर्वांना श्रीसाईसच्चरित्राची नव्याने ओळख झाली. ११ फेब्रुवारी १९९९ मध्ये बापूंनी पंचशील परीक्षांना का बसायचं हे समजावून सांगितलं. बापू म्हणतात, “आपल्याला प्रत्येकाला ओढ असते की मला माझं आयुष्य चांगलं करायचं आहे, जे काही कमी आहे ते भरून काढायचय, पण हे कसं करायचं हे