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भगवान पर आपका भरोसा जितना बढ़ता है, उतना आपका आत्मविश्वास बढ़ता है    

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अप्रैल २००५ के पितृवचनम् में ‘भगवान पर आपका भरोसा जितना बढ़ता है, उतना आपका आत्मविश्वास बढ़ता है’ इस बारे में बताया। राधाजी के पास जितना आत्मविश्वास है, उतना किसी के भी पास नहीं होता। उनके पास सबसे ज्यादा आत्मविश्वास होता है। क्योंकि आत्मविश्वास ये उतना ही होता है, किसीके भी पास, जितनी उसके पास भक्ति होती है। अगर मेरे पास आत्मविश्वास कम है, इसका मतलब

मन:शान्ति कैसे प्राप्त करें 

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने 3 फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘मन:शान्ति कैसे प्राप्त करें’ इस के बारे में बताया।   मनगुप्त कनकमार्ग, मनगुप्त कनकमार्ग, अब इसके दो अर्थ हो सकते हैं। मनगुप्त कनक की, मन में गुप्त रूप से रहनेवाला कनक, बहुत आसान अर्थ है और दूसरा अर्थ जो है, मतलब जो बहोत सुंदर है। मन जहाँ गुप्त हो जाता है, मन को जो गुप्त करता है ऐसा सोना। मन जहाँ

हर एक इन्सान के पास एक क्षीरसागर होता है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘हर एक इन्सान के पास एक क्षीरसागर होता है’ इस बारे में बताया। हलाहल कहाँ उत्पन्न हुआ था? भाई देखो, क्षीरसागर में। जो परमपवित्र है, जिसमें अपवित्रता बिलकुल नहीं है, ऐसे क्षीरसागर में, जहाँ भगवान का निवास है, ऐसी जगह में भी जब बुरी प्रवृत्तियों की सहाय्यता ली जाती है, तो हलाहल पहले उत्पन्न होता है, यह जान लो भाई।

आपके हृदय में भक्ति का होना यह आपके लिए आवश्यक है - भाग २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने ४ फरवरी २०१६ के प्रवचन में ‘आपके हृदय में भक्ति का होना यह आपके लिए आवश्यक है- भाग २’ इस बारे में बताया।   आप टिफीन लेके जा रहे हैं अपनी बॅग में, राईट, उस बॅग में समझो नीचे ऐसी बॅग होती है राईट, तो पीछे ऐसी बॅग है, यहाँ नीचे यहाँ टिफीन रखा हुआ है, ये जो पार्ट है वो अगर समझो टूट गया रास्ते

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘इस विश्व की मूल शक्ति सद्‍गुरुतत्त्व है’ इस बारे में बताया।

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘इस विश्व की मूल शक्ति सद्‍गुरुतत्व है’ इस बारे में बताया। हमारे मन में प्रश्न उठता होगा कि मैं रामनाम लूं या एक बार रामनाम लेकर १०७ बार राधानाम लूं या गुरू का नाम लूं या जो भी कोई नाम लूं, कितनी भी बार लूं तब भी कोई प्रॉब्लेम नहीं है। एक साथ नामों की खिचडी

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘शुद्धता यह सामर्थ्य है’ इस बारे में बताया।

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘ शुद्धता यह सामर्थ्य है ’ इस बारे में बताया। कृष्ण भगवान और राधाजी का हमारे जिंदगी के साथ क्या रिश्ता है, यह बात समझाने के लिए अनिरुद्ध बापू ने पानी और साबुन का उदाहरण देकर समझाया। उन्होंने कहा- ‘हम देखते हैं कि जब हम स्नान करते हैं। जिस पानी से हम स्नान करते हैं वह पानी

राधा सहस्त्रनाम

सहस्र रामनामतुल्य राधा नाम (Sahastra Ramnaam-Tulya Radha Naam) – Aniruddha Bapu‬ परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के ‘राधासहस्रनाम’ हिंदी प्रवचन में ‘सहस्र-रामनाम-तुल्य राधा नाम’ इस बारे में बताया। जब वेदव्यासजी ने गुरु नारदजी से यह पूछा कि मैं तो बस ‘राम’ नाम रटते ही आ रहा था, क्योंकि आपने ही मुझे बताया था कि एक राम नाम ही सहस्र नामों के बराबर है। तब नारदजी

भक्तमाता राधा- श्रीमती (Bhaktamata Radha - Shreemati) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 25 March 2004

भक्तमाता राधाजी का एक नाम श्रीमती है । भक्तमाता राधाजी हर प्रकार का धन भक्त को देती हैं, भौतिक धन देती हैं । इसलिए वे श्रीमती हैं।  साथ ही मन को सुमति देनेवालीं भी भक्तमाता राधाजी ही हैं । भक्तमाता राधाजी के ‘श्रीमती’ इस नाम के बारे में सद्गुरु श्रीअनिरुद्धसिंह ने अपने २५ मार्च २००४ के प्रवचन में बतायी, जो आप इस व्हिडियो में देख सकते हैं l ॥ हरि

चिन्तन का महत्त्व (Importance of Chintan) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 26 Feb 2004

चाहे सुख हो या दुख, मानव को किसी भी स्थिति में भगवान से दूरी बढानी नहीं चाहिए । जीवन के हर मोड पर, कदम कदम पर भगवान से जुडे रहना जरूरी है । मानव के जीवनरूपी वर्तुल (सर्कल) की केन्द्रबिन्दु भगवान ही रहनी चाहिए । जो भगवान का हमेशा चिन्तन करता है, उसके योगक्षेम की चिन्ता भगवान करते हैं । बुद्धि से भगवान की पर्युपासना करने की ताकत राधाजी देती

कृष्णसंयुता राधा (Krishna-sanyuta Radha) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 19 February 2004

  Krishna-sanyuta Radha – कृष्णसंयुता यह राधाजी का महज नाम नहीं है, बल्कि यह तो राधाजी की स्थिति है, यह राधाजी की आकृति है, यह राधाजी का भाव है । दर असल कृष्णसंयुता ही राधाजी का मूल स्वरूप है  । भरोसा यह कृष्णसंयुत ही होता है और इसीलिए भरोसा यह तत्त्व राधाजी से जुडा है । राधाजी के कृष्णसंयुता इस नाम के बारे में सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध ने अपने १९ फ़रवरी