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Radhaji

One of the names of Radhaji is ‘Krishnakala’. While explaining (in Hindi discourse dated 06 October 2005) the metaphysical meaning behind this name, initially, Sadguru Aniruddha dispels the fear of ‘Amavasya’ (new moon day) from our minds. Later, Bapu explains how this name, ‘Krishnakala’, is related to the ego in ‘me’ and how Radhaji destroys this undesired vice. राधाजी का एक नाम ‘कृष्णकला’ भी है। इस नाम के पीछे के

clarifies

Spirituality says that we should offer complete Sharanya (Surrender to Parmatma), but the meaning of this term is often not understood. In the Hindi discourse dated 6th October 2005, Sadguru Aniruddha (Bapu) clarifies this. Bapu says that just as we trust our own existence and do not require any proof for it, we should have trust on the existence of Parmatma, and that the Parmatma always wishes our well-being. Even during

Kojagiri Pournima

In this pravachan, Sadguru Aniruddha explains the importance of Kojagiri Pournima or the Sharad Pournima to us. After telling about the general consideration prevalent among masses, Bapu explains the spiritual significance of this night attached with Shree Kamala-Laxmi. इस प्रवचन में, सद्गुरु अनिरुद्ध हमें कोजागिरी पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा का महत्त्व बताते हैं। कोजागिरी का जनमान्य महत्त्व बताकर, बापू श्रीकमला-लक्ष्मी से जुड़ी इस रात का आध्यात्मिक महत्त्व उजागर करते हैं।

Renuka Mata

In this Marathi discourse dated 2nd October 2008, Sadguru Aniruddha Bapu explains how the first-ever idol of Mother Jagadamba was established. This incident is linked to the temple of Renuka mata in Mahurgad located in the state of Maharastra. While explaining this, Sadguru Aniruddha also stresses the importance of reading of the Ramrasayan book during the Navratri utsav. In this Marathi discourse dated 2nd October 2008, Sadguru Aniruddha Bapu explains

शरण, Radhe Krishna

In this Hindi discourse (dated 6th October 2005), Sadguru Aniruddha explains why one should surrender at the feet of Radhe-Krishna, the Parmatma. Importantly, Bapu has very clearly elucidated the difference between surrendering at the feet of the Almighty and surrendering before a person at war. In the end, with the help of shlok “Sarva-dharman parityajya mam ekam saranam vraja”, Bapu tells us the benefits of surrendering before God. इस हिंदी

खेळ मांडियेला

While explaining Sant Tukaram’s abhang ‘Khel Mandiyela Valvanti Ghai’, Sadguru Aniruddha (Bapu) described the beautiful relation that Lord Vitthal shares with each of his devotees. This relation is such that it cannot be stated in words and also cannot be compared with anything else. ही भक्तीची भूमी म्हणजेच वाळवंट. ही वाळवंट असून मात्र ही उगवते, ह्या लोकांच्या डोळ्यांना दिसत नाही. वाळवंटामध्ये जर तुम्ही एकादशीच्या दिवशी ह्या भक्तांना नाचताना बघितलं तर

कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०६ अक्तूबर २००५ के हिंदी पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम:’ इस बारे में बताया। वो स्वयं भक्तिरूपिणी हैं, ये राधा भक्तिरूपिणी हैं और हम लोग जानते हैं कि श्रीमद्‍भागवत में एक श्लोक है, नारद को भगवान स्वयं श्रीकृष्ण, स्वयं श्रीकृष्ण भगवान कह रहे हैं, ‘मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’ ‘हे नारद, जहाँ मेरे भक्त भजन-पूजन करते

ॐ कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम: – १ ’ इस बारे में बताया। हरि: ॐ, ॐ कृष्णायै नम:। भगवान श्रीकृष्ण को अगर कह दें हम ॐ श्रीकृष्णाय नम:, ये कृष्णायै नम:। यानी भगवती राधा का नाम यहाँ कृष्णा है, कृष्ण नहीं कृष्णा। अब ‘कृष्ण’ नाम के कितने अर्थ होते हैं, हम जानते हैं, बहुत अर्थ होते हैं। एक अर्थ सीधा-सादा है, कृष्ण यानी

देव माझा विठू सावळा - भाग ४

सद्गुरु श्री श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १३ नोव्हेंबर २००३ च्या मराठी प्रवचनात ‘देव माझा विठू सावळा – भाग ४’ याबाबत सांगितले. …आणि हा जो खेळ मांडलाय, तो कोणी मांडलाय? त्या विठोबाने मांडलाय की त्या चंद्रभागेने मांडलाय की त्या वैष्णवांनी मांडलाय? आम्हाला प्रश्न पडतो. एक तर बाबा खेळ मांडलाय, तर तो त्या विठ्ठलाने मांडलेला असला पाहिजे कि हे जे वैष्णव नाचती-गाती म्हणताहेत, त्या वैष्णवांनी मांडलेला असला पाहिजे किंवा त्या चंद्रभागेने मांडलेला असला पाहिजे.

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: - २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के प्रवचन में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: – २’ इस बारे में बताया। जब वो, देखिये भाई, जब तक एकरूप थी, है अद्‍वैतता, दो नहीं थे, एक ही था। तो कौन किसकी भक्ति करेगा, कौन किससे प्यार करेगा? प्यार करने के लिए तो द्वैत तो होना चाहिए। दो लोग चाहिए एक-दूसरे से प्यार करते हैं। तो विभक्त होके ही, तो उसने प्यार करना शुरू