Hindi Pravachan

सम्मान और स्तुति को पचाना कठिन है    

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने 3 फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘सम्मान और स्तुति को पचाना कठिन है’ इस के बारे में बताया।  अपमान है ना भाई, अपमान सहन करना, पचाना बहोत आसान बात है। लेकिन मान-रिस्पेक्ट, स्तुति उसे पचाना, उसे सहन करना बहोत कठीन है। अपमान मेरा हो गया, मुझे दुख होता है, लेकिन इससे मेरा कुछ नुकसान नहीं होता। लेकिन जब मुझे मान मिलने लगता है, रिस्पेक्ट मिलने लगता

क्षीरसागर का मन्थन

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘क्षीरसागर का मन्थन’ इस बारे में बताया। ये विमलचित्त सबको मिला है भाई। उसी का मंथन करना यही हमारी जीवन की इतिकर्तव्यता है, प्रमुख ध्येय है। एम्स ऍण्ड ऑबजेक्टीव जिसे हम लोग कहते हैं तो मोस्ट इम्पॉर्टंट एम्स ऍज वेल ऍज ऑब्जेक्टीव इज ओनली धिस। भाई, हमें अमृत पाना है यानी क्या पाना है? अमर नहीं होना है, कोई आदमी,

हर एक इन्सान के पास एक क्षीरसागर होता है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘हर एक इन्सान के पास एक क्षीरसागर होता है’ इस बारे में बताया। हलाहल कहाँ उत्पन्न हुआ था? भाई देखो, क्षीरसागर में। जो परमपवित्र है, जिसमें अपवित्रता बिलकुल नहीं है, ऐसे क्षीरसागर में, जहाँ भगवान का निवास है, ऐसी जगह में भी जब बुरी प्रवृत्तियों की सहाय्यता ली जाती है, तो हलाहल पहले उत्पन्न होता है, यह जान लो भाई।

अहंकार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०५ मई २००५ के पितृवचनम् में ‘अहंकार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है’ इस बारे में बताया।   ये महाप्रज्ञा है और दूसरा है महाप्राण, जो उनका पुत्र है, हनुमानजी, वो भी सर्वमंगल है, क्योंकि उनका नाम ही हनुमंत है यानी ‘हं’कार है। ‘अहं’ में जो ‘अ’ है उसे निकाल दो तो हंकार हो गया। मैं बार-बार कहता हूँ अहंकार है यानी हनुमानजी नहीं हैं, हंकार नहीं

जीवन में अनुशासन का महत्त्व - भाग १०

सद्‌गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ इस बारे में बताया। भाई जीवन में सबसे important क्या है? तुम्हारी कॉम्पीटन्स – सक्षमता और वो कहाँ से आती है? मैथुन केन्द्र से उत्पन्न होती है और वो कैसा केन्द्र है? ‘उष्ण-स्निग्ध-गुरु’ केन्द्र है। उसीकी सहायता के लिए कौन सा केन्द्र चाहिए? ‘सौम्य-स्निग्ध-गुरु’। ये कहाँ से आता है? सद्‌गुरु के दो चरणों से –

जीवन में अनुशासन का महत्त्व - भाग ९

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ इस बारे में बताया। उत्साह कहाँ से उत्पन्न होता है? उत्साह उष्णता से उत्पन्न होता है। उष्णता उत्साह से उत्पन्न होती है और मैंने कहा कि, ‘सद्‌गुरु गायत्री’ में क्या है? ‘उष्णं स्निग्धं गुरुर्तेजो’, ओ.के.। तो गुरुतेज क्या है? ‘उष्ण-स्निग्ध-गुरु’ है और ‘गुरुचरणधूल’ क्या है? ‘सौम्य-स्निग्ध-गुरु’ है। गुरु के चरणों से जो तेज निकलता है,

सच्चिदानन्द सद्‌गुरुतत्त्व - भाग ४

सद्‍गुरुश्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व(Satchidanand Sadgurutattva)’ इस बारे में बताया। सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्तूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्गुरुतत्त्व’ इस बारे में बताया। गुरु के चरण क्या हैं? एक चरण जब शुभंकर होता है, दूसरा अशुभनाशन होता है। यानी balanced perfect. देखिए, एक जगह आप अच्छी चीज़ों को collect करते रहिए और साथ-साथ बुरी चीज़ों को निकालना रोक दीजिए, क्या होगा?

सच्चिदानन्द सद्गुरुतत्त्व - भाग ३

सद्‍गुरुश्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व(Satchidanand Sadgurutattva)’ इस बारे में बताया। तो ये सद्‍गुरुतत्त्व क्या है? सच्चिदानंद स्वरुप है। क्योंकि उसके पास कोई एक्सपेक्टेशन नहीं है, सिर्फ एक इच्छा रखता है, जो मेरा नाम ले, जो मुझसे प्रेम करे, जो मेरी आज्ञा का पालन करे, वो मेरे अपने हैं और उनकी जिंदगी में कैसे ज्यादा से ज्यादा आनंद से भरपूर कर दूँ। कुछ नहीं चाहता

सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व - भाग २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व(Satchidanand Sadgurutattva)’ इस बारे में बताया। जो-जो अस्तित्व है जिंदगी में, उससे सिर्फ हमें आनंद ही मिले, ये किसके हाथ में हो सकता है? किसकी ताक़त हो सकती है? ‘सच्चिदानंद’ की ही यानी सद्‌गुरु की ही और ये आनंद तभी उत्पन्न हो सकता है, जब संयम है, राईट। एकार्थी – extremes बन जाओ तो आनंद कभी नहीं मिलेगा। संयम

सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व - भाग १

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व(Satchidanand Sadgurutattva)’ इस बारे में बताया। तो ये बात ऐसी है कि ये जो गुरुतत्त्व होता है, सद्‍गुरु जो होता है, उसके चरण ये क्या चीज़ है, ये पहले जानना चाहिये हमें। गुरु के चरण यानी क्या? गुरु के चरण, दो चरण जो होते हैं। एक कदम से वो शुभंकर कार्य करते हैं, दूसरे कदम से अशुभनाशन का कार्य