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आदिमातेचा तृतीय नेत्र आदिमातेचा तृतीय नेत्र जीवन मंगलमय करतो (The third eye of Aadimata makes your life auspicious)

सद्गुरू श्री अनिरुद्ध बापूंनी त्यांच्या ०९ जानेवारी २०१४ च्या मराठी प्रवचनात  ‘आदिमातेचा तृतीय नेत्र जीवन मंगलमय करतो’ याबाबत सांगितले. Fear of injury, आयुष्य आमचं सगळं या एका fear मध्ये बंदिस्त होऊन पडतं. पटतंय? या fear मधून बाहेर पडायचं असेल, तर आपल्या आईने एक अल्गोरिदम दिलेला आहे, अतिशय सुंदर. आपण जो मंत्र म्हणतो या स्वस्तिक्षेम संवादम् मध्ये, त्याच्या सुरुवातीलाच आपण म्हणतो – सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्यै त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

बा पु ने पिछले गुरुवार को यानी २३-०१-२०१४ को ‘सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ।।’ इस ‘दुर्गा मंत्र’ के अल्गोरिदम पर प्रवचन किया । इस प्रवचन का हिन्दी अनुवाद ब्लॉग पर विस्तृत रूप में अपलोड किया गया है । इस प्रवचन के दो महत्त्वपूर्ण मुद्दें थे- १) यह अल्गोरिदम निश्चित रूप से क्या है और २) इस अल्गोरिदम के विरोध में महिषासुर किस तरह कार्य करता है

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ॐ   रामवरदायिनी श्रीमहिषासुरमर्दिन्यै नम:। इस महिषासुरमर्दिनी ने ही, इस चण्डिका ने ही, इस दुर्गा ने ही सब कुछ उत्पन्न किया। प्रथम उत्पन्न होनेवाली या सर्वप्रथम अभिव्यक्त होनेवाली वह एक ही है। फिर वह उन तीन पुत्रों को जन्म देती है और फिर सबकुछ शुरू होता है । हमने बहुत बार देखा, हमें यह भी समझ में आया की यह एकमात्र ऐसी है, जिसका प्राथमिक नाम, पहला नाम ही उसका

Saptamatruka Poojan

  On Thursday, 24th October 2013, Param Poojya Bapu, in His discourse, spoke on a very important topic. It is the ardent wish of every parent that their child should lead a long and healthy life. Traditionally, Shashti Poojan has been performed for this very purpose. However, over a period of time, this poojan has gradually lost its importance and has been reduced to a mere ritual. Param Poojya Bapu through his

सप्तमातृका पूजन ( Saptamatruka pujan)

    गुरुवार, दि. २४ अक्तूबर २०१३ के दिन परमपूज्य बापूजी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर प्रवचन किया। प्रत्येक माता-पिता की इच्छा होती है कि अपने बच्चे का जीवन स्वस्थ हो और उसे दीर्घ आयु मिले। इस दृष्टिकोन से सदियों से चली आ रही परंपरा अनुसार घर में बच्चे के जन्म के बाद षष्ठी पूजन किया जाता है।  मगर समय के चलते गलत रूढ़ियाँ पड़ती गईं जिनकी वजह से इस

सप्तमातृका पूजन (Saptamatruka Pujan)

  गुरुवार, दि. २४ ऒक्टोबर २०१३ रोजी परमपूज्य बापूंनी एका अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषयावर प्रवचन केले. प्रत्येक आई-वडिलांची इच्छा असते की आपल्या बाळाचं जीवन निरोगी असावं आणि त्याला दीर्घायुष्य लाभावं. ह्या दृष्टीकोनातून पूर्वापार परंपरेनुसार घरात बाळ जन्माला आल्यानंतर षष्ठी पूजन केलं जातं. मात्र काळाच्या ओघात चुकीच्या रूढी जोपासल्या गेल्या कारणाने ह्या पूजनाचे महत्त्व फक्त कर्मकांडापुरते मर्यादित राहिले. ह्या पूजनाचा उद्देश, त्याचे महत्व आणि मूळ पूजनपद्धती ह्याबद्दल परमपूज्य बापूंनी प्रवचनातून मार्गदर्शन केले.

स्वस्तिक्षेम संवादम्‌ (Swastikshem Sanwad)

कल परमपूज्य बापूजी ने प्रवचन में स्वस्तिक्षेम संवादम्‌ की संकल्पना सारे श्रद्धावानों के समक्ष रखी; सभी श्रद्धावानों के हित के लिए। इस में प्रत्येक श्रद्धावान को चण्डिकाकुल के किसी भी सदस्य के साथ संवाद करना है। श्रद्धावान के मन की भावना, विचार या वो जो कुछ कहना चाहता है वो उस सदस्य के समक्ष कह सकता है। पहले बापू श्रीहरिगुरुग्राम में प्रवचन से पूर्व, “सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि

स्वस्तिक्षेम संवादम् (swastikshem-sanwad)

काल परमपूज्य बापूंनी प्रवचनामध्ये स्वस्तिक्षेम संवादम्‌ची संकल्पना सर्व श्रद्धावानांसमोर मांडली; सर्व श्रद्धावानांच्या हितासाठी. यामध्ये प्रत्येक श्रद्धावानाने चण्डिकाकुलातील कुठल्याही सदस्याशी संवाद साधावयाचा आहे. श्रद्धावानाच्या मनातील भावना, विचार किंवा तो जे काही सांगू इच्छितो ते त्या त्या सदस्यासमोर त्याने मांडावयाचे आहे.  प्रथम बापू श्रीहरिगुरुग्राम येथे प्रवचना आधी, “सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते।।’ हा श्‍लोक म्हणतील. त्यानंतर कमीतकमी ५ मिनिटांचा काळ असेल, ज्या वेळेस प्रत्येक श्रद्धावानाने डोळे बंद करून, आपण प्रत्यक्ष

बापूजी द्वारा श्रद्धावानानों के लिए नववर्ष की सौगात - मातृवात्सल्य उपनिषद (New year gift to Shraddhavan-Matruvatsalya Upanishad)

New year gift to Shraddhavan-Matruvatsalya Upanishad ॥ हरि ॐ ॥   दीवाली से पहलेवाले गुरूवार के प्रवचन में बापूजी ने कहा था कि दत्तजयंतीके दिन मातृवात्सल्य उपनिषद उपलब्ध होगा। तब बापूजी ने उपनिषद के बारेमें कहा था कि, “यह उपनिषद हर एक के लिए उस के जीवन की, मन की कमतरता के लिए उसके दुर्गुणोंके लिए, प्रत्येक पुण्य के लिए, प्रत्येक पाप के लिए, उसके पूर्व एवं इस जीवन के