Search results for “श्रीकृष्ण”

Vasudev

In this pravachan clip dated 7th October 2004, Sadguru Aniruddha Bapu reveals the meaning behind the name ‘Vasudev’, who is Devaki’s husband and Shree Krishna’s father. He further clarifies the true meaning of ’33 Koti Dev’ as is mentioned in the Vedas.  Furthermore, Bapu explains in detail about the the 10+1 directions, ‘Ashtvasu’, their role in our lives. based on this, He highlights the significance of Devaki-Vasudev’s marriage. ७ अक्टूबर २००४

mind

In this discourse, Sadguru Aniruddha elucidates the difference between the Conscious mind (बाह्य मन), Subconscious mind (अंतर मन) and the mind that aligns with Divine Resolve (परमेश्वरि मन). He also tells us how Bhagwan Krishna takes birth in our minds. इस प्रवचन व्हिडिओ में सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापु हमें अंतर्मन, बाह्यमन और परमेश्वरी मन इन तीनों में क्या फ़र्क़ है, यह समझा रहे हैं। तथा भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हमारे

Birth of Shree Krishna

In this clip from the Hindi discourse dated 7th October 2004, Sadguru Aniruddha (Bapu) explains “Yashoda-anand-patnyai” naam from the Radha Sahastranaam. Bapu first explains the simple meaning of this name of Radha ji i.e. wife (patni) of the one who gives ananda (happiness) to Yashoda (Shree Krishna’s mother). He further tells us how this name is associated with the birth of Shree Krishna and also tells us how the number

conquer

In this pravachan dated 31st July 2003, Sadguru Aniruddha explains to us the basic meaning of the word “Vishwabhoktaa”, which is used to describe the Paramatma Mahavishnu in Shree Vishnu Sahasranaam. Sadguru Bapu begins by dispelling the misunderstanding that may happen while understanding this name of Shree Mahavishnu. Later, with the example of Arjuna and a quote of Shree Krishna from the Gita, Bapu describes the similarities between the condition

कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०६ अक्तूबर २००५ के हिंदी पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम:’ इस बारे में बताया। वो स्वयं भक्तिरूपिणी हैं, ये राधा भक्तिरूपिणी हैं और हम लोग जानते हैं कि श्रीमद्‍भागवत में एक श्लोक है, नारद को भगवान स्वयं श्रीकृष्ण, स्वयं श्रीकृष्ण भगवान कह रहे हैं, ‘मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’ ‘हे नारद, जहाँ मेरे भक्त भजन-पूजन करते

ॐ कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम: – १ ’ इस बारे में बताया। हरि: ॐ, ॐ कृष्णायै नम:। भगवान श्रीकृष्ण को अगर कह दें हम ॐ श्रीकृष्णाय नम:, ये कृष्णायै नम:। यानी भगवती राधा का नाम यहाँ कृष्णा है, कृष्ण नहीं कृष्णा। अब ‘कृष्ण’ नाम के कितने अर्थ होते हैं, हम जानते हैं, बहुत अर्थ होते हैं। एक अर्थ सीधा-सादा है, कृष्ण यानी

जराहरता

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘जराहरता (Jaraharata)’ इस बारे में बताया। हम लोग सभी यह स्टोरी जानते हैं महाभारत की, जरासंध की, कि जरासंध जब पैदा हुआ तब ऋषिओं ने आकर कहा कि, ‘ये सारे मानवजाति के लिए बहुत खराब बात है।’ तो उसे, टुकड़े करके दो फेंक दिए थे। ‘जरा’ नाम की राक्षसी आकर उन्हें सांधती थी। तभी इसी लिए सांधने के बाद, बार

गुरुक्षेत्रम् मन्त्राचे श्रद्धावानाच्या जीवनातील महत्त्व - भाग ११

सद्गुरू श्री श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या ०८ एप्रिल २०१० च्या मराठी प्रवचनात ‘गुरुक्षेत्रम् मन्त्राचे श्रद्धावानाच्या जीवनातील महत्त्व’ याबाबत सांगितले.    श्रीगुरुक्षेत्रम्‌ मध्ये काय आहे? ह्या त्रिविक्रमाचं निलयं आहे, आलय नाही, गृह नाही, तर निलयं आहे. ह्या मंत्राच्या जपाने, ह्या मंत्राचा स्वीकार करून आम्ही कुठे राहायला जातो? त्या सद्‍गुरुतत्त्वाच्या निलयं मध्ये म्हणजे अंतरगृहामध्ये, सिम्पल, समजलं आणि कसे? तर विच्चे, बेस्ट होऊन. आम्ही ह्या मंत्राचा स्वीकार केला याचा अर्थ आम्ही पन्नास टक्के बेस्ट झालेलो

न्हाऊ तुझिया प्रेमे - २

सद्गुरु गुणसंकीर्तनाचा महिमा अपार आहे. सद्गुरु अनिरुद्धांवरील श्रद्धावानांच्या प्रेमातूनच अनेक भक्तिरचनांचा उदय झाला. अनेक श्रेष्ठ आणि ज्येष्ठ श्रद्धावानांनी ह्या भक्तिरचनांमधून त्यांच्या सद्गुरुंचे गुणसंकीर्तन केले आहे. श्रीकृष्णशास्त्री इनामदार, त्यांच्या पत्नी सुशिलाताई इनामदार, लीलाताई पाध्ये, आद्यपिपा, साधनाताई, मीनावैनी हे सर्व श्रेष्ठ आणि ज्येष्ठ श्रद्धावान होते. त्यांच्या ह्या भक्तिरचनांना सूर आणि स्वरांचे कोंदण लाभले आणि ह्यातूनच जन्म झाला – ‘ऐलतीरी मी पैलतीरी तू’, ‘गाजतीया ढोल नी वाजतीया टाळ’, ‘पिपासा’, ‘वैनी म्हणे’, ‘पिपासा पसरली’,

त्रिविक्रम एकसाथ तीन कदम चलते हैं  (Trivikram walks 3 steps at a time) - Aniruddha Bapu

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध ने ६ मार्च २०१४ के पितृवचनम् में ‘त्रिविक्रम एकसाथ तीन कदम चलते हैं’ इस बारे में बताया। जल जो है इस पृथ्वी पर, पृथ्वी के अंतरिक्ष में हो या पृथ्वी पर हो, कुए में हो या नदी में हो या सागर में हो, आपके बदन में हो, कहीं भी हो, ये जल जितना बना पहले, उतना ही है। करोडों करोडों साल पहले जितना जल बना, वही, उतना