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भगवान हमें वही देते हैं जो हमारे लिए सर्वोत्तम होता है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २० अक्तूबर २००५ के पितृवचनम् में ‘भगवान हमें वही देते हैं जो हमारे लिए सर्वोत्तम होता है’ इस बारे में बताया। जब हम, आप कोई काम करने निकलते हैं, हम क्या करते हैं? आज कोई इन्सान को जाकर मिलना है, भगवान काम कर दे अच्छा होगा। भगवान की याद की, भगवान को प्रणाम किया। काम करके आए, भगवान से, दिल से प्रार्थना की, भगवान, आपने बात

लीला की व्याख्या (Definition Of Leela)

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध ने २० फरवरी २०१४ के पितृवचनम् में ‘लीला की व्याख्या’ के बारे में बताया। तो ये भगवान की कृपा जो है, दिखाई नहीं पडती, हेल्थ दिखाई नहीं पडती, हेल्थ के असर हम लोग जानते हैं। Proper आरोग्य क्या है, हम महसूस कर सकते हैं। वैसे ही भगवान की कृपा यह महसूस करने की बात होती है। और ये जो कथाओं को हम पढते हैं, ये कथाओं से

Aniruddha Bapu told in his Pitruvachanam dated 18 Feb 2016 about ’God can read your mind’

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १८ फरवरी २०१६ के पितृवचनम् में ‘भगवान आपके मन को जानता है’ इस बारे में  बताया। ये जो मूलाधार चक्र हमारे हर एक के शरीर मे है, इसके स्वामी हैं ये (गणेशजी), और ये जो चक्र है, ये मनुष्य के आनंद के लिये है। उसके जीवन का अभ्युदय करने के लिये है। यहां परमानंद की बात नहीं है, यहां परमार्थ की बात नहीं है,

"नित्य उपासना" और "हरिगुरु गुणसंकीर्तन" का अनन्यसाधारण महत्व - (The importance of "Daily Prayers" & "Hariguru Gunasankirtan") - Aniruddha Bapu Pitruvachanam 31st Dec 2015

नये साल का स्वागत करते समय, ३१ दिसंबर २०१५, गुरुवार के दिन सद्‌गुरु बापू ने अपने पितृवचन में, अगले साल याने २०१६ साल में “नित्य उपासना” (daily prayers) और “हरिगुरु गुणसंकीर्तन” के अनन्यसाधारण महत्व को विशद किया था। इस पितृवचन का महत्वपूर्ण भाग संक्षिप्त रूप में मेरे श्रद्धावान मित्रों के लिए इस पोस्ट के द्वारा मैं दे रहा हूँ। “अभी २०१६ साल चंद घण्टों में शुरु होनेवाला है । हर

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सद्‍गुरुतत्त्व पर मनुष्य का जितना विश्वास होता है, उतनी कृपा वह प्राप्त करता है (SadguruTattva renders to everyone according to his faith) भगवान ने इस विश्व को अपने सामर्थ्य से बनाया है, उन्हें किसीकी जरूरत नहीं पडी थी। वे हर एक के जीवन में उस व्यक्ति के लिए जो भी उचित है वही करते हैं; बस मानव को भगवान पर भरोसा रखना चाहिए। ‘भजेगा मुझको जो भी जिस भाव से।

समर्पण ही आराधना की आत्मा है (Surrendering to The God is the Core of Worship) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 04 March 2004

मैं भगवान का हूँ, मेरे पास जो कुछ भी है वह भगवान का दिया हुआ ही है, मैं जो भक्ति कर रहा हूँ वह भगवान की कृपा से भगवान को प्राप्त करने के लिए ही कर रहा हूँ, इस समर्पित भाव के साथ श्रद्धावान को भक्तिपथ पर चलना चाहिए । केवल काम्यभक्ति न करते हुए समर्पण भाव से भगवान की आराधना करना श्रेयस्कर है, समर्पण ही आराधना की आत्मा है(Surrendering

और देवता चित्त न धरई। (Aur devata chitta na dharai)

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने ४ फरवरी २०१६ के प्रवचन में ‘और देवता चित्त न धरई’ इस बारे में बताया।   हमें एक करोड़ जप करने के बाद ही भगवान कृपा करेंगे ऐसा नहीं हैं। हमने जन्म में कभी भी नाम नहीं लिया है, पहली बार लिया, फिर भी वह काम करने वाला है, यह जान लो। लेकिन थोड़ी सी सबूरी रखना आवश्यक है ना! भगवान ने कभी ऐसा किया है,

भगवान की कृपा

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धने ३० जनवरी २०१४ के पितृवचनम् में ‘उनके जैसे वही सक्षम है’ इस बारे में बताया। हमारे लिये बहुत संकट हैं, अडचन है, हमें भगवान चाहिये, भगवान की कृपा चाहिये, तो पहले ये जान लो कि भगवान की कृपा किसे प्राप्त करनी है? मुझे प्राप्त करनी है। मुझे कोई लाकर देनेवाला नहीं है। मेरे लिये, अगर मुझे कुछ तकलीफ है, तो मेरी माँ दवा लेगी तो चलेगा क्या?

Tulsidas ji

In His discourse dated 7th October 2004, Sadguru Aniruddha Bapu beautifully explains how Bhagwaan Shree Hanuman blessed the great saint Tulsidas ji and helped him compose the Holy Scripture (Granth) ‘Shree Ramcharitmanas’ which is loved and revered by devotees even today. Further, Bapu guides us on how we can do “”Gunasankirtan”” about our God and how it benefits us. ७ अक्तूबर २००४ के अपने प्रवचन में, सद्गुरु अनिरुद्ध बापू बताते

directions

In this discourse dated 7th October 2004, Sadguru Aniruddha Bapu explains the difference between the physical directions and the direction of one’s intent. Sadguru Bapu speaks in detail about how Sai Baba got ‘Shree Sai Satcharit’ – the Gunsankirtan of Sai Baba, composed by Hemadpant for the welfare of everyone. Furthermore, Sadguru Aniruddha reveals Hemadpant’s aim in life and the reason that led him to receive the purest and ultimate