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श्री दुर्गा भगवती आराधना

काल मंगळवार, दिनांक २२ डिसेंबर २०१५ रोजी श्रीअनिरुद्ध गुरुक्षेत्रम्‌मध्ये “श्री दुर्गा भगवती आराधना (श्रीयंत्र महाभिषेक पूजन)” हा सोहळा अत्यंत मंगलमय व भक्तीपूर्ण वातावरणात संपन्न झाला. पूर्ण वेदोक्त पद्धतीने व नंदाईंच्या उपस्थितीत होणार्‍या ह्या पूजन व अभिषेक सोहळ्याची सुरुवात सकाळी ९.०० वाजता शांतीपाठाने झाली.  ह्या सोहळ्याचे प्रमुख वैशिषट्य होते ते पूजनस्थळी विराजमान झालेले, एरव्ही परमपूज्य बापूंच्या निवासस्थानी देवघरामध्ये असलेले व विशेष पद्धतीने घडवून घेतलेले पंचधातूचे त्रिमितीय श्रीयंत्र. सकाळी ११.०० ते दुपारी

forgiveness (क्षमा)

In the Hindi discourse from 29th December 2005, Sadguru Aniruddha (Bapu) tells us, How Bhagwati Radhaji always forgives unconditionally. Also, Bapu explains to us about the connection between forgiveness (क्षमा) and our growth and future development. २९ दिसंबर २००५ के हिंदी प्रवचन में सद्गुरु श्रीअनिरुद्धबापू हमें, भगवती राधाजी कैसे हमेशा अकारण क्षमा प्रदान करती हैं, यह बता रहे हैं| साथ ही, यह क्षमा, हमारी उन्नति और हमारा भविष्यकालीन विकास, किस

A pure, Satvic, simple and yet supremely sacred way of doing the Navratri Poojan

  The procedure for performing the ‘Navratri Puja’ rituals, as given in the editorial from ‘Dainik Pratyasha’ dated September 14 2017, is given below. This procedure has been provided in both Hindi and Marathi languages. Every Shraddhavaan can perform the Navratri Poojan at home in this manner.     Pratishthapana (installation):    1) Before starting Poojan on the first day of Navratri, a layer of geru (गेरू) should be applied to the

ॐ कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम: – १ ’ इस बारे में बताया। हरि: ॐ, ॐ कृष्णायै नम:। भगवान श्रीकृष्ण को अगर कह दें हम ॐ श्रीकृष्णाय नम:, ये कृष्णायै नम:। यानी भगवती राधा का नाम यहाँ कृष्णा है, कृष्ण नहीं कृष्णा। अब ‘कृष्ण’ नाम के कितने अर्थ होते हैं, हम जानते हैं, बहुत अर्थ होते हैं। एक अर्थ सीधा-सादा है, कृष्ण यानी

समयोग

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३० जून २००५ के पितृवचनम् में ‘समयोग’ इस बारे में बताया। योग जो है, भगवान, उस भगवती शक्ति और भक्त तीनों का एक समवान हिस्से में आना, एक ही ट्रान्ससेक्शन में, एक ही समय, एक ही पल, तीनों आनंद जो होते हैं, उसे योग कहते हैं। भगवान तो हमेशा आनंदस्वरूप हैं। भगवती जो हैं, वो तो आल्हादिनी स्वरूप हैं, आनन्दप्रदायक, उत्पन्न करनेवाली हैं। खुद आनन्दस्वरूप भगवान,

अहंकार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०५ मई २००५ के पितृवचनम् में ‘अहंकार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है’ इस बारे में बताया।   ये महाप्रज्ञा है और दूसरा है महाप्राण, जो उनका पुत्र है, हनुमानजी, वो भी सर्वमंगल है, क्योंकि उनका नाम ही हनुमंत है यानी ‘हं’कार है। ‘अहं’ में जो ‘अ’ है उसे निकाल दो तो हंकार हो गया। मैं बार-बार कहता हूँ अहंकार है यानी हनुमानजी नहीं हैं, हंकार नहीं

Saraswati Poojan (Dasara/Vijayadashami)

Hari Om, During his Pitruvachan dated 10th October 2019, Sadguru Shree Aniruddha had spoken about “Yaa kundendutusharhaardhawaalaa’ prayer. Also, he had said that the details of the Saraswati Poojan that is performed on the day of Dasara at home would be shared through my blog. Accordingly, given below are the details of the poojan: Poojan Material: 1. Turmeric (haridra), kumkum, akshata 2. Niraanjan (lamp) 3. Coconut – 2 nos. 4.

सरस्वती पूजन (दशहरा/विजयादशमी)

हरि ॐ, दिनांक १० अक्तूबर २०१९ को किये हुए पितृवचन में सद्‌गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ‘या कुन्देन्दुतुषारहारधवला’ इस प्रार्थना के बारे में बताते हुए, दशहरे के दिन घर में सरस्वती पूजन कैसे किया जाता है इसकी जानकारी मेरे ब्लॉग में दी जायेगी, ऐसा कहा था। उसके अनुसार इस पूजन की जानकारी दे रहा हूँ। पूजन सामग्री १) हल्दी, कुंकुम, अक्षता २) निरांजन ३) नारियल – २ ४) गुड़-खोपरे का नैवेद्य

सरस्वती पूजन (दसरा/विजयादशमी)

हरि ॐ, दिनांक १० ऑक्टोबर २०१९ रोजी झालेल्या पितृवचनात सद्‌गुरु श्री अनिरुद्धांनी ’या कुन्देन्दुतुषारहारधवला’ या प्रार्थनेबद्दल सांगताना दसर्‍याच्या दिवशी घरी सरस्वती पूजन कसे केले जाते याची माहिती माझ्या ब्लॉगवरून देण्यात येईल असे सांगितले होते. त्याप्रमाणे या पूजनाची माहिती खाली देत आहे.    पूजन साहित्य  १) हळद, कुंकू, अक्षता २) निरांजन ३) नारळ – २ ४) गुळ-खोबर्‍याचा नैवेद्य ५) फूले, सोने (आपट्याची पाने) ६) सरस्वती – पुस्तके आणि चित्र ७) सुपारी

अभिवंदन शब्द का अर्थ

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने १५ अप्रैल २०१० के पितृवचनम् में ‘अभिवंदन शब्द का अर्थ’ इस बारे में बताया। तो अभिवंदन करते समय क्या होता है, जो कर्दम ऋषि ने किया वो पूर्ण रूप से अभिवंदन है कि ‘इसके चरणों से अधिक श्रेष्ठ कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं’ ये अभिवंदना है बस्‌! ‘The Best, The Best I got The Best’ right, इस भाव से अपना मस्तक उनके चरणों में रखोगे