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सांवेगिक बुद्धिमत्ता का महत्त्व (Importance of Emotional Intelligence) – Aniruddha Bapu Hindi Discourse 8 May 2014

मानव अपनी भावनाओं को पहचानने में गलती करता है और इसी वजह से सही दिशा में आगे नहीं बढ सकता l सांवेगिक बुद्धिमत्ता(Emotional Intelligence) का उचित उपयोग करके मानव को गृहस्थी और परमार्थ में उचित कदम उठाते हुए अपना विकास करना चाहिए l सांवेगिक बुद्धिमत्ता के महत्त्व के बारे में परम पूज्य सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापु ने अपने दि. 8 मई 2014 के हिंदी प्रवचन में महत्त्वपूर्ण विवेचन किया,  जो

सांवेगिक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 8 May 2014

मानव यह भावनाप्रधान प्राणि है l मानव की भावनाओं का अध्ययन करके उसके द्वारा व्यक्ति या समूह का रुझान सांवेगिक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) के आधार से जानने का विज्ञान आज कल विकसित हो रहा है l भावनाओं में बहकर किसी भी घटना के प्रति रिअ‍ॅक्ट न करते हुए परिस्थिति को रिस्पाँड करने के लिए मानव को सांवेगिक बुद्धिमत्ता का उपयोग करना चाहिए l  सांवेगिक बुद्धिमत्ता के बारे में परम पूज्य

सामूहिक बुद्धिमत्ता - भाग २ (Swarm Intelligence) -  Aniruddha Bapu Marathi Discourse 8 May 2014

मुंगीसारख्या प्राण्याच्या सामूहिक बुद्धिमत्तेबाबत(swarm intelligence) संशोधन झाले आहे आणि होत आहे व या संशोधनात थक्क करणारी माहिती मिळत आहे. सामूहिक बुद्धिमत्तेने असाध्य ते साध्य होते, हा मुद्दा मुंग्याच्या सामूहिक बुद्धिमत्तेच्या अभ्यासातून स्पष्ट होतो. मुंग्यांनी सामूहिकपणे स्वत:चाच तराफा करून अ‍ॅमेझॉन नदी शिस्तीत कशी पार केली आणि वारुळातील अवघ्या सामग्रीसह सुरक्षित स्थलान्तर कसे केले याबाबतच्या माहितीपटाबद्द्ल सांगून, जर मुंगीसारखा प्राणी हे करू शकतो तर आम्ही मानवही हे नक्कीच सहजपणे करू शकतो असे

सामूहिक बुद्धिमत्ता - भाग १ (Swarm Intelligence - part 1) - Aniruddha Bapu Marathi Discourse 8 May 2014

मुंगीसारख्या प्राण्याच्या सामूहिक बुद्धिमत्तेबाबत (swarm intelligence) संशोधन झाले आहे आणि होत आहे व या संशोधनात थक्क करणारी माहिती मिळत आहे. सामूहिक बुद्धिमत्तेने अशक्य वाटणारी कार्ये लीलया करता येतात, हा मुद्दा मुंग्याच्या सामूहिक बुद्धिमत्तेच्या अभ्यासातून स्पष्ट होतो. मुंग्यांची वसाहत, त्यामागील त्यांची कल्पकता, त्यांचे अन्न गोळा करणे, शेती आणि पशुपालन करणे याबाबतच्या संशोधनाबद्द्ल सांगून परम पुज्य सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्धांनी गुरूवार दिनांक ८ मे २०१४ रोजी च्या मराठी प्रवचनात सामूहिक बुद्धिमत्तेबाबत सविस्तर माहिती दिली, ती

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सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३१ मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘समय के साथ चलो’ इस बारे में बताया। कईं लोगों को देखता हूँ, तो बस पढ़ते ही रहते हैं, कभी भी देखो खेलते रहते हैं मोबाईल पर, नहीं तो पढ़ते रहते हैं। इससे कुछ नहीं मिलता, ध्यान में रखिए। ये हमारे जो समय भगवान ने दिया हुआ है वो सिर्फ गिना-चुना है। कोई नहीं आज अगर सोचता है, कोई भी

श्रीगुरु चरन सरोज रज

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में हनुमान चलिसा के ‘श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि’ इस चौपाई के बारे में बताया।  पहले सौ बीघा जमिन थी, लेकर आया था सौ बीघा, जाते समय बेचके कुछ भी नहीं रहा, ऐसा नहीं होना चाहिए। सौ बीघा लेके आये थे, दस हजार बीघा करके चले गये, ये मेरे जीवन का एम्स ऍण्ड ऑब्जेक्टीव होना चाहिए। तब जिंदगी

हर एक इन्सान के पास एक क्षीरसागर होता है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘हर एक इन्सान के पास एक क्षीरसागर होता है’ इस बारे में बताया। हलाहल कहाँ उत्पन्न हुआ था? भाई देखो, क्षीरसागर में। जो परमपवित्र है, जिसमें अपवित्रता बिलकुल नहीं है, ऐसे क्षीरसागर में, जहाँ भगवान का निवास है, ऐसी जगह में भी जब बुरी प्रवृत्तियों की सहाय्यता ली जाती है, तो हलाहल पहले उत्पन्न होता है, यह जान लो भाई।

discipline in life

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन (discipline in life) का महत्त्व’ इस बारे में बताया। ये संयम जो है, बहुत आवश्यक होता है। जहाँ जितना बोलना चाहिए, उतना ही बोलना चाहिए। जहाँ जो करना चाहिए, उतना ही करना चाहिए। जहाँ शौर्य चाहिए, वहाँ शौर्य चाहिए। जहाँ शान्ति चाहिए, वहाँ शान्ति ही चाहिए। हर चीज़ की आवश्यकता होती है। लेकिन हम अपने मन पर

जीवन में अनुशासन का महत्त्व - भाग ४

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ इस बारे में बताया। ये गुरु के जो चरण हैं, सद्‍गुरु के, इनको जब हम हमारे हृदय में, दिलो-दिमाग में बिठाते हैं, तो भी ये चरण अपने आप हमें डिसीप्लीन सिखाते हैं। तो ये भी हमें जानना हैं कि गुरु के चरणों से हमारी जिंदगी में डिसीप्लीन कैसे आती है। यानी देखिये, ये गुरु के

चरणसंवाहन  (Serving the Lord’s feet)

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने १५ अप्रैल २०१० के पितृवचनम् में ‘चरणसंवाहन’ के बारे में बताया। बस्‌, उसके चरणों में सर रखेंगे ही, उसके पैर दबायेंगे। जहाँ मिले चान्स तो, उसके चरणधूली में खुद को पूरा का पूरा स्नान करायेंगे ही। लेकिन उसकी आज्ञा का पालन करने की कोशिश, पूरी की पूरी कोशिश करते रहेंगे। ये हुई – ‘तैसेचि चरणसंवाहन।’ ‘तैसेचि हस्ते चरणसंवाहन। हस्तांही चरणसंवाहन।’  अब यहाँ कह रहे हैं कि