Search results for “दत्तगुरु”

सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व - भाग २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व(Satchidanand Sadgurutattva)’ इस बारे में बताया। जो-जो अस्तित्व है जिंदगी में, उससे सिर्फ हमें आनंद ही मिले, ये किसके हाथ में हो सकता है? किसकी ताक़त हो सकती है? ‘सच्चिदानंद’ की ही यानी सद्‌गुरु की ही और ये आनंद तभी उत्पन्न हो सकता है, जब संयम है, राईट। एकार्थी – extremes बन जाओ तो आनंद कभी नहीं मिलेगा। संयम

आप कभी भी अकेले नहीं हैं, त्रिविक्रम आपके साथ है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध ने ४ फरवरी २०१६ के प्रवचन में ‘आप कभी भी अकेले नहीं हैं, त्रिविक्रम आपके साथ है (You Are Never Alone, Trivikram Is With You)’ इस बारे में बताया।   आप बोलेंगे बापू किसकी भक्ति करें हम लोग? किसी भी, किसी भी रूप की भक्ति कीजिये। मैंने कभी नहीं कहा कि इसी की भक्ति करो। मैं इसे माँ चण्डिका, माँ जगदंबा बोलता हूँ, आप दूसरे किसी की उपासना

नामस्पर्श

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌. हम यह जो मंत्रगजर करते हैं – ‘रामा रामा आत्मारामा….’, वह कहाँ जाकर पहुँचता हैं? क्या हवा में घूमता रहता है इधर कहाँ? या पूरे ब्रह्मांड में या हवा में जाकर पहुँचता है? कहाँ जाता होगा? There is a definite place, where it goes….where it reaches….where it is absorbed….where it is pulled. Only one place. कौनसी जगह हैं वह? त्रिविक्रमनिलयम श्रीगुरुक्षेत्रम्‌॥ हम लोग

जयंती मंगला काली

हरि ॐ २१-०२-२०१९ हरि ॐ. श्रीराम. अंबज्ञ. नाथसंविध् नाथसंविध् नाथसंविध्. ‘रामा रामा आत्मारामा त्रिविक्रमा सद्गुरुसमर्था, सद्गुरुसमर्था त्रिविक्रमा आत्मारामा रामा रामा’ जो कोई भी यह जप करता है, मंत्रगजर करता है, (वह) भक्तिभावचैतन्य में रहने लगता है। कुछ लोगों के मन में प्रश्न उठा है। सही प्रश्न है – ‘बापू, यह मंत्रगजर तो सर्वश्रेष्ठ है, आपने बताया, मान्य है हमें Definitely। लेकिन ‘माँ’ का नाम नहीं है इसमें?’ यह मैंने पहले

Bhaktibhav Chaitanya

    ‘अल्फा टू ओमेगा’ न्युजलेटर – हिन्दी संस्करण   जनवरी २०१९ संपादक की कलम से   हरि ॐ श्रद्धावान सिंह / वीरा,   सभी श्रद्धावान नवम्बर और दिसम्बर महीने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे क्योंकि यह महीने अपने साथ श्री अनिरुद्ध पूर्णिमा और सच्चिदानन्द उत्सव लेकर आए जोकि सभी श्रद्धावानों के लिए हर्षोल्लास के शिखर हैं। श्री ‘सच्चिदानन्द उत्सव’ श्रद्धावानों के लिए “भक्तिभाव” का प्रतीक है जो

sedentary lifestyle

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ, नाथसंविध्‌,  नाथसंविध्‌,  नाथसंविध्‌.  कष्ट के बिना फल नहीं, ओ.के? और बाकी सारी चीज़ों के लिए तो हमलोग कष्ट करते रहते हैं। We go on putting our all efforts in everything….whatever we desire for. जो हमे चाहिए, उसके लिए हम लोग बहुत प्रयास करते रहते हैं…. मन से, तन से, धन से; लेकिन ये सब चीज़ें जो देता है, उसके लिए हम कितने श्रम करते हैं? ये

जाणीव (Consciousness)

सद्गुरू श्री अनिरुद्ध बापूंनी त्यांच्या २० जून २०१३ च्या मराठी  प्रवचनात ‘जाणीव (Consciousness)’ याबाबत सांगितले.   हा जो देव म्हणजे काय? परमेश्वर म्हणजे नक्की काय? तर साधी गोष्ट लक्षात ठेवायची की परमेश्वर माणसाला समजला कसा? हे बघायचं झालं, तर आपले वेद अतिशय सुस्पष्टपणे आपल्याला सांगतात, की देव माणसामध्ये कसा पसरला? म्हणजे काय? तर परमेश्वराची जाणीव, परमेश्वराची जाणीव माणसाला, कशी झाली? काय वाक्य लक्षात घ्या, परमेश्वराची जाणीव किंबहुना परमेश्वराच्या आहेपणची जाणीव, म्हणजे

त्रिविक्रमाची १८ वचने (मराठी)

दत्तगुरुकृपे मी सर्वसमर्थ तत्पर । श्रद्धावानास देईन सदैव आधार ॥१॥ मी तुम्हांसी सहाय्य करीन निश्‍चित । मात्र माझे मार्ग त्रि-नाथांसीच ज्ञात ॥२॥ धरू नका जराही संशय याबाबत । न होऊ देईन तुमचा मी घात ॥३॥ प्रेमळ भक्ताचिया जीवनात । नाही मी पापे शोधीत बसत ॥४॥ माझिया एका दृष्टिपातात । भक्त होईल पापरहित ॥५॥ माझ्यावरी ज्याचा पूर्ण विश्‍वास । त्याच्या चुका दुरुस्त करीन खास ॥६॥  तैसेचि माझ्या भक्तां जो देई त्रास

त्रिविक्रम के १८ वचन (हिन्दी)

दत्तगुरुकृपा से मैं सर्वसमर्थ तत्पर । श्रद्धावान को दूँगा सदैव आधार ॥१॥ मैं तुम्हारी सहायता करूँगा निश्‍चित । परन्तु मेरे मार्ग त्रि-नाथों को ही है ज्ञात ॥२॥ मत करना इस विषय में संदेह बिलकुल भी । न होने दूँगा घात तुम्हारा मैं कभी भी ॥३॥ प्रेमल भक्त के जीवन में । नहीं ढूँढ़ने बैठता हूँ पाप मैं ॥४॥ हो जाते ही मेरा एक दृष्टिपात । भक्त बन जायेगा पापरहित ॥५॥

सब श्रद्धावानों के लिये माँ जगदंबा का आशीर्वाद

माझ्या श्रद्धावान मित्रांनो व बालकांनो! सध्याची जागतिक परिस्थिती दिवसेंदिवस अधिकच बिकट होत चालली आहे. ह्या वर्षामध्ये भारतवर्षाचे व भारतधर्माचे शत्रू अतिशय जोर करू पाहत आहेत. भारतवर्ष सर्व शत्रूंशी यशस्वी मुकाबला करेल ह्याविषयी संशयच नाही. परंतु ह्यापुढील अडीच हजार वर्षांचा काळ सर्व स्तरांवर विचित्र व विलक्षण वळणे घेणाराच असणार आहे. श्रद्धावानांना ह्या काळात स्वतःचे हित साधून, भारतवर्षाचे व भारतधर्माचे हित साधत, जीवनातील आपदा दूर करण्यासाठी माझ्या मनात जगदंबेच्या व दत्तगुरुंच्या प्रार्थनेनंतर