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तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के प्रवचन में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:’ इस बारे में बताया। जिसका भी सच्चा उपभोग लेना चाहते हो, जो मेरे हित के लिए हो, तो उसका उपभोग करने के पहले त्याग करना सिखो और ये सिखाने वाली, ये राधा हैं। क्योकिं वो त्याग करके ही उसने जनन किया है सारी सृष्टी का। इसी लिए अगर मैं उसे जननी मानता हूँ, मानता हूँ नहीं मानना

समयोग

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३० जून २००५ के पितृवचनम् में ‘समयोग’ इस बारे में बताया। योग जो है, भगवान, उस भगवती शक्ति और भक्त तीनों का एक समवान हिस्से में आना, एक ही ट्रान्ससेक्शन में, एक ही समय, एक ही पल, तीनों आनंद जो होते हैं, उसे योग कहते हैं। भगवान तो हमेशा आनंदस्वरूप हैं। भगवती जो हैं, वो तो आल्हादिनी स्वरूप हैं, आनन्दप्रदायक, उत्पन्न करनेवाली हैं। खुद आनन्दस्वरूप भगवान,

अग्नि और जल

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३० जून २००५ के पितृवचनम् में ‘अग्नि और जल’ इस बारे में बताया। जल, यह जो हमारा शरीर है, यह शरीर दिखता है तो, क्या पानी दिखता है शरीर में कहीं? बाहर से नहीं दिखता। हर कोई जो सायन्स का स्टुडण्ड है, जानता है कि शरीर का कितना हिस्सा पानी है? ७०% वॉटर है इस शरीर में। पृथ्वी पर कितना पानी है और कितनी जमीन है?

जराहरता

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘जराहरता (Jaraharata)’ इस बारे में बताया। हम लोग सभी यह स्टोरी जानते हैं महाभारत की, जरासंध की, कि जरासंध जब पैदा हुआ तब ऋषिओं ने आकर कहा कि, ‘ये सारे मानवजाति के लिए बहुत खराब बात है।’ तो उसे, टुकड़े करके दो फेंक दिए थे। ‘जरा’ नाम की राक्षसी आकर उन्हें सांधती थी। तभी इसी लिए सांधने के बाद, बार

क्षीरसागर का मन्थन- भाग २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘क्षीरसागर का मन्थन’ इस बारे में बताया। अगर जो भी इन्सान अपनी जिंदगी में अमृतमंथन करना चाहता है, तो उसे पहली बात आवश्यक यह है कि पहले जान ले, तो पहली चीज़ है – ‘ज्ञानं’। ज्ञान, कौन सा ज्ञान, कौन सा ज्ञान? बड़ा ज्ञान नहीं, ब्रह्म-माया वाला ज्ञान नहीं, तो यही ज्ञान, यही जानना कि मेरे पास, मेरे खुद के

श्रीगुरु चरन सरोज रज

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में हनुमान चलिसा के ‘श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि’ इस चौपाई के बारे में बताया।  पहले सौ बीघा जमिन थी, लेकर आया था सौ बीघा, जाते समय बेचके कुछ भी नहीं रहा, ऐसा नहीं होना चाहिए। सौ बीघा लेके आये थे, दस हजार बीघा करके चले गये, ये मेरे जीवन का एम्स ऍण्ड ऑब्जेक्टीव होना चाहिए। तब जिंदगी

क्षीरसागर का मन्थन

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘क्षीरसागर का मन्थन’ इस बारे में बताया। ये विमलचित्त सबको मिला है भाई। उसी का मंथन करना यही हमारी जीवन की इतिकर्तव्यता है, प्रमुख ध्येय है। एम्स ऍण्ड ऑबजेक्टीव जिसे हम लोग कहते हैं तो मोस्ट इम्पॉर्टंट एम्स ऍज वेल ऍज ऑब्जेक्टीव इज ओनली धिस। भाई, हमें अमृत पाना है यानी क्या पाना है? अमर नहीं होना है, कोई आदमी,

हर एक इन्सान के पास एक क्षीरसागर होता है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘हर एक इन्सान के पास एक क्षीरसागर होता है’ इस बारे में बताया। हलाहल कहाँ उत्पन्न हुआ था? भाई देखो, क्षीरसागर में। जो परमपवित्र है, जिसमें अपवित्रता बिलकुल नहीं है, ऐसे क्षीरसागर में, जहाँ भगवान का निवास है, ऐसी जगह में भी जब बुरी प्रवृत्तियों की सहाय्यता ली जाती है, तो हलाहल पहले उत्पन्न होता है, यह जान लो भाई।

अहंकार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०५ मई २००५ के पितृवचनम् में ‘अहंकार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है’ इस बारे में बताया।   ये महाप्रज्ञा है और दूसरा है महाप्राण, जो उनका पुत्र है, हनुमानजी, वो भी सर्वमंगल है, क्योंकि उनका नाम ही हनुमंत है यानी ‘हं’कार है। ‘अहं’ में जो ‘अ’ है उसे निकाल दो तो हंकार हो गया। मैं बार-बार कहता हूँ अहंकार है यानी हनुमानजी नहीं हैं, हंकार नहीं

सच्चिदानन्द सद्‌गुरुतत्त्व - भाग ४

सद्‍गुरुश्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्‍गुरुतत्त्व(Satchidanand Sadgurutattva)’ इस बारे में बताया। सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्तूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘सच्चिदानन्द सद्गुरुतत्त्व’ इस बारे में बताया। गुरु के चरण क्या हैं? एक चरण जब शुभंकर होता है, दूसरा अशुभनाशन होता है। यानी balanced perfect. देखिए, एक जगह आप अच्छी चीज़ों को collect करते रहिए और साथ-साथ बुरी चीज़ों को निकालना रोक दीजिए, क्या होगा?