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ॐ कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०३ मार्च २००५ के पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम: – १ ’ इस बारे में बताया। हरि: ॐ, ॐ कृष्णायै नम:। भगवान श्रीकृष्ण को अगर कह दें हम ॐ श्रीकृष्णाय नम:, ये कृष्णायै नम:। यानी भगवती राधा का नाम यहाँ कृष्णा है, कृष्ण नहीं कृष्णा। अब ‘कृष्ण’ नाम के कितने अर्थ होते हैं, हम जानते हैं, बहुत अर्थ होते हैं। एक अर्थ सीधा-सादा है, कृष्ण यानी

भक्तप्रेमाने कृष्ण मुकुटावर मोरपीस धारण करतो (Krishna, affectionate to His devotees wears a peacock feather on his crown) - Aniruddha Bapu Marathi Discourse 10 March 2005

राम अवतारात वनवासी रामाला वनातील एका मोराने जलस्रोतापर्यंत जाण्याचा मार्ग स्वत:चे एक एक पीस त्या वाटेवर अर्पण करत करत दाखवला. त्या मोराच्या त्या प्रेमाची आठवण म्हणून रामाने पुढील अवतारात म्हणजेच कृष्णावतारात स्वत:च्या मुकुटावर मोरपीस धारण केले. देव भक्ताला प्रेमाने डोक्यावर घेतो याचे हे उदाहरण आहे. कृष्णाने माथ्यावर मोरपीस का धारण केले आहे, याबद्दल परम पूज्य सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापुंनी त्यांच्या १० मार्च २००५ रोजीच्या प्रवचनात सांगितले, जे आपण या व्हिडियोत

कृष्णसंयुता राधा (Krishna-sanyuta Radha) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 19 February 2004

  Krishna-sanyuta Radha – कृष्णसंयुता यह राधाजी का महज नाम नहीं है, बल्कि यह तो राधाजी की स्थिति है, यह राधाजी की आकृति है, यह राधाजी का भाव है । दर असल कृष्णसंयुता ही राधाजी का मूल स्वरूप है  । भरोसा यह कृष्णसंयुत ही होता है और इसीलिए भरोसा यह तत्त्व राधाजी से जुडा है । राधाजी के कृष्णसंयुता इस नाम के बारे में सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध ने अपने १९ फ़रवरी

कृष्णायै नम:

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०६ अक्तूबर २००५ के हिंदी पितृवचनम् में ‘ॐ कृष्णायै नम:’ इस बारे में बताया। वो स्वयं भक्तिरूपिणी हैं, ये राधा भक्तिरूपिणी हैं और हम लोग जानते हैं कि श्रीमद्‍भागवत में एक श्लोक है, नारद को भगवान स्वयं श्रीकृष्ण, स्वयं श्रीकृष्ण भगवान कह रहे हैं, ‘मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’, मद्‌भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।’ ‘हे नारद, जहाँ मेरे भक्त भजन-पूजन करते

जराहरता

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने २४ फरवरी २००५ के पितृवचनम् में ‘जराहरता (Jaraharata)’ इस बारे में बताया। हम लोग सभी यह स्टोरी जानते हैं महाभारत की, जरासंध की, कि जरासंध जब पैदा हुआ तब ऋषिओं ने आकर कहा कि, ‘ये सारे मानवजाति के लिए बहुत खराब बात है।’ तो उसे, टुकड़े करके दो फेंक दिए थे। ‘जरा’ नाम की राक्षसी आकर उन्हें सांधती थी। तभी इसी लिए सांधने के बाद, बार

Saraswati Poojan (Dasara/Vijayadashami)

Hari Om, During his Pitruvachan dated 10th October 2019, Sadguru Shree Aniruddha had spoken about “Yaa kundendutusharhaardhawaalaa’ prayer. Also, he had said that the details of the Saraswati Poojan that is performed on the day of Dasara at home would be shared through my blog. Accordingly, given below are the details of the poojan: Poojan Material: 1. Turmeric (haridra), kumkum, akshata 2. Niraanjan (lamp) 3. Coconut – 2 nos. 4.

सरस्वती पूजन (दशहरा/विजयादशमी)

हरि ॐ, दिनांक १० अक्तूबर २०१९ को किये हुए पितृवचन में सद्‌गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ‘या कुन्देन्दुतुषारहारधवला’ इस प्रार्थना के बारे में बताते हुए, दशहरे के दिन घर में सरस्वती पूजन कैसे किया जाता है इसकी जानकारी मेरे ब्लॉग में दी जायेगी, ऐसा कहा था। उसके अनुसार इस पूजन की जानकारी दे रहा हूँ। पूजन सामग्री १) हल्दी, कुंकुम, अक्षता २) निरांजन ३) नारियल – २ ४) गुड़-खोपरे का नैवेद्य

सरस्वती पूजन (दसरा/विजयादशमी)

हरि ॐ, दिनांक १० ऑक्टोबर २०१९ रोजी झालेल्या पितृवचनात सद्‌गुरु श्री अनिरुद्धांनी ’या कुन्देन्दुतुषारहारधवला’ या प्रार्थनेबद्दल सांगताना दसर्‍याच्या दिवशी घरी सरस्वती पूजन कसे केले जाते याची माहिती माझ्या ब्लॉगवरून देण्यात येईल असे सांगितले होते. त्याप्रमाणे या पूजनाची माहिती खाली देत आहे.    पूजन साहित्य  १) हळद, कुंकू, अक्षता २) निरांजन ३) नारळ – २ ४) गुळ-खोबर्‍याचा नैवेद्य ५) फूले, सोने (आपट्याची पाने) ६) सरस्वती – पुस्तके आणि चित्र ७) सुपारी

'अभिसंवाहन’, Thursday Pravachan

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने १५ अप्रैल २०१० के पितृवचनम् में ‘अभिसंवाहन’ शब्द का अर्थ’ इस बारे में बताया। अभी चरणसंवाहन करना है, अभी क्या कहते हैं, मस्तक, ‘करावे मस्तके अभिवंदन। तैसेचि हस्तांही चरणसंवाहन।’ ‘तैसेचि – तैसेचि’ यानी ‘वैसे ही’।, तैसेचि का मतलब है वैसे ही। यानी जैसे अभिवंदन किया, तो यहाँ संवाहन कैसा होना चाहिए? अभिसंवाहन होना चाहिए। चरणों का संवाहन तो मस्तक का, एक उपचार तो हम जान गए,

गुरुक्षेत्रम् मन्त्राचे श्रद्धावानाच्या जीवनातील महत्त्व - भाग ११

सद्गुरू श्री श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या ०८ एप्रिल २०१० च्या मराठी प्रवचनात ‘गुरुक्षेत्रम् मन्त्राचे श्रद्धावानाच्या जीवनातील महत्त्व’ याबाबत सांगितले.    श्रीगुरुक्षेत्रम्‌ मध्ये काय आहे? ह्या त्रिविक्रमाचं निलयं आहे, आलय नाही, गृह नाही, तर निलयं आहे. ह्या मंत्राच्या जपाने, ह्या मंत्राचा स्वीकार करून आम्ही कुठे राहायला जातो? त्या सद्‍गुरुतत्त्वाच्या निलयं मध्ये म्हणजे अंतरगृहामध्ये, सिम्पल, समजलं आणि कसे? तर विच्चे, बेस्ट होऊन. आम्ही ह्या मंत्राचा स्वीकार केला याचा अर्थ आम्ही पन्नास टक्के बेस्ट झालेलो