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जलाचा अध्यात्मिक इतिहास

परम पूज्य सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापुंनी गुरूवार दिनांक २० फ़ेब्रुवारी २०१४ रोजी च्या मराठी प्रवचनात श्री हरिगुरुग्राम येथे त्रिविक्रमाचा प्रतिनिधि असणाऱ्या जलाचा अध्यात्मिक इतिहास काय आहे, हे सांगीतले. बापूंनी पुढील व्हिडिओमध्ये हा मुद्दा स्पष्ट केला आहे.

clarifies

Spirituality says that we should offer complete Sharanya (Surrender to Parmatma), but the meaning of this term is often not understood. In the Hindi discourse dated 6th October 2005, Sadguru Aniruddha (Bapu) clarifies this. Bapu says that just as we trust our own existence and do not require any proof for it, we should have trust on the existence of Parmatma, and that the Parmatma always wishes our well-being. Even during

माँ दुर्गा , Mother Durga

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ३१ मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘माँ दुर्गा हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देती हैं’ इस बारे में बताया। मुझे अच्छा लगता है हमें, कोई भी सीधा ऐसा बैठा है, तो मुझे अ़च्छा नहीं लगता, वो काम करता रहे बस, बस, बस। I am myself workaholic and I want everyone be is workaholic absolutely. काम करते रहिए यार, शान से जियेंगे। So improve your english. ये अध्यात्मिक

गुरु-आज्ञा

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ इस बारे में बताया। गुरु-आज्ञा-परिपालनं, सर्वश्रेयस्करं। गुरु-आज्ञा का पालन करना ही सबसे श्रेय, श्रेयस्कर चीज़ है। सर्वश्रेय यानी सर्व बेस्ट जो है, वो हमें किससे प्राप्त होता है? गुरु-आज्ञा से प्राप्त होता है, राईट। इसी लिए ‘गुरुचरण पायस’ कहा गया है। ‘The Discipline’ बाकी की only they are a Dicipline. ये बाकी के डिसील्पीन्स से

रामाचा आत्मा, significance of life

सद्गुरू श्री श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या ०८ एप्रिल २०१० च्या मराठी प्रवचनात ‘गुरुक्षेत्रम् मन्त्राचे श्रद्धावानाच्या जीवनातील महत्त्व’ याबाबत सांगितले.    त्यानंतर येतो अंकुरमंत्र, एकदा हा ‘विच्चे’ सकट असणारा मंत्र आमचा ध्वजा घेऊन पुढे निघाला. ह्या बाकीच्या बाधाप्रशमनं, पापप्रशमनं, कोपप्रशमनं, सर्वसमर्थं सर्वार्थसमर्थं, त्रिविक्रमनिलयं ही तीन पावलं आम्हाला कळली की त्याच्यानंतर येतो तो अंकुरतत्त्व. इथे आम्हाला ओळख पटवून दिलेली आहे. दत्तात्रेय कोण? रामाचा आत्मा, सिम्पल. आम्हाला ह्याच्यामधून एकदा हे तीन मंत्र आम्हाला नीट कळले

Devotional-Sentience-website-Hindi-Screen

  हरि ॐ, सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध (बापू) १९९६ से विष्णुसहस्रनाम, राधासहस्रनाम, ललितासहस्रनाम, रामरक्षा, साईसच्चरित जैसे विषयोपर प्रवचन के माध्यमसे श्रद्धावानोंसे संवाद करते हैं।  हर श्रद्धावान के दिल को छू जानेवाली बात है – बापु का हर गुरुवार का प्रवचन। लगभग सभी श्रद्धावान इस प्रवचन के माध्यम से ही बापु से जुड़ते गये हैं। बापु के प्रवचन, ‘अध्यात्म एवं व्यवहार दोनों में उचित संतुलन कैसे प्राप्त कर सकते हैं’ इसका सीधे-सादे आसान

नामस्पर्श

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌. हम यह जो मंत्रगजर करते हैं – ‘रामा रामा आत्मारामा….’, वह कहाँ जाकर पहुँचता हैं? क्या हवा में घूमता रहता है इधर कहाँ? या पूरे ब्रह्मांड में या हवा में जाकर पहुँचता है? कहाँ जाता होगा? There is a definite place, where it goes….where it reaches….where it is absorbed….where it is pulled. Only one place. कौनसी जगह हैं वह? त्रिविक्रमनिलयम श्रीगुरुक्षेत्रम्‌॥ हम लोग

ध्येय गाठण्यासाठी शरीर सहाय्यक आहे. (The body helps us to achieve our goals)

सद्गुरू श्री अनिरुद्धांनी त्यांच्या १५ मे २०१४ च्या मराठी प्रवचनात ‘ध्येय गाठण्यासाठी शरीर सहाय्यक आहे’ याबाबत सांगितले. त्याचा जो समय आहे, जीवनकाळ आहे, देहाची अवस्था आहे, त्या अवस्थानुसार प्रत्येक माणसाची development झालीच पाहिजे. पटतेय? आणि हे कशाने होऊ शकतं? बुद्धीचा वापर कशासाठी तर जीवनातला समय नीटपणे वापरण्यासाठी. मग ह्याला मदत कोण करतं? शरीर. मी मनोमय देह म्हणत नाही आहे, प्राणमय देह म्हणत नाही आहे, हे जे दिसतं ना शरीर, ते

परमपूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने ३ सितंबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘दिन में कम से कम चौबीस मिनट तो उपासना करनी ही चाहिए’ इस बारे में बताया। एक चीज बोलता हूँ कि बड़े प्यार के साथ। वेद हैं चार, अठारह पुराण हैं, तेईस उपपुराण हैं, एक सौ आठ उपनिषद हैं, गीता है, रामायण है, महाभारत है, अपने ही सारे ग्रंथ हैं और बहुत सारे ग्रंथ हैं। इस भारत में

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १४ जनवरी २०१६ के पितृवचनम् में जिंदगी में ‘आपके साथ जप करने के लिए त्रिविक्रम को बुलाइए’ इस बारे में बताया। अध्यात्म करते समय भी, बापू ने बोला है अभी ३६ बार कुछ करना है या १० बार करें, जो आप करते हो, तभी पहले उनको बुलाना, हे दादी माँ, आजा! हे त्रिविक्रम, आ मेरे साथ जप करने के लिये! तेरा जप तू ही