मृत्यु पर विजय

harishआज के दौर में दुनिया भर में घटित हो रहीं घटनाओं को देखकर आम आदमी का मानवता पर का विश्वास ही उठने लगता है। हिंसा, ख़ुदगर्ज़ी, दांभिकता, मक़्क़ारी, झूठापन ये अवगुण ही मानो इस कलियुग में दुनिया का उसूल बन रहे हैं। जो इन्सान नेकी से जीने की कोशिश करते हैं, उन्हें दक़ियानुसी क़रार दिया जाता है। जहाँ देखो, वहाँ निराशाजनक दृष्य ही दिखायी देता है।

ऐसी निराश परिस्थिति में एक ऐसी ख़बर सुनायी दी, जिसे सुनकर मानवता का सिर भी शायद गर्व से ऊँचा हो चुका हो।

क्या थी यह ख़बर?

बंगळुरु में एक इन्सान ने, मृत्यु के बाद अपने शरीर के अवयव ज़रूरतमंद इन्सानों को दान करने की इच्छा ज़ाहिर की।

कोई पूछ सकता है, इसमें इतना ख़ास क्या है? आजकल अपने निधन के बाद अपने अवयवों का दान करने की इच्छा कई लोग ज़ाहिर करने लगे है और वह भी मृत्यु से बहुत समय पहले से ही।

इस ख़बर की ख़ास बात यह है कि इसमें अवयवदान करने की इच्छा प्रदर्शित कर चुका यह इन्सान एक दर्दनाक अपघात का शिकार बन गया था। वह हादसा इतना भयानक था कि उस व्यक्ति के शरीर के पूरी तरह दो टुकड़ें होकर ज़मीन पर गिरे थे और उन चंद कुछ पलों में, अपनी मौत को सामने देखते हुए इस इन्सान ने यह इच्छा प्रदर्शित की! यह ख़ासियत है इस ख़बर में।

हरीश नंजाप्पा….तुम्हारे-मेरे तरह ही एक आम इन्सान; लेकिन इस २३ वर्षीय इन्सान ने इन्सानियत के शिखर को ही मानो छू लिया। बंगळुरु के निवासी रहनेवाले हरीश अपने गाँव के ग्रामपंचायत के चुनाव में व्होटिंग करके मोटरबाईक पर से बंगळुरु लौट रहे थे कि तभी नॅशनल हायवे ४ पर एक शक्कर के थैलों (गनीबॅग्ज़) से लदे एक ट्रक ने उनकी बाईक को ओव्हरटेक करने की कोशिश की। इस चक्कर में हरीश बाईक पर का संतुलन खोकर ट्रक के नीचे आ गये और वह भी ऐसी बुरी तरह से कि ठेंठ ट्रक के पहियों के नीचे आकर उनके शरीर के पूर्णत: दो टुकड़ें हो गये! उनकी शारीरिक स्थिति को बयान करने के लिए तो ‘भयानक’, ‘दर्दनाक’, ‘भीषण’….सारे लफ़्ज़ छोटे प्रतीत होते हैं। ख़ैर!

Organ Donationलेकिन शरीर की ऐसी भयानक हालत होने के बावजूद भी, हेल्मेट पहने जाने के कारण हरीश के मस्तिष्क को क्षति नहीं पहुँची थी, जिसके कारण उनका दिमाग़ उस हालत में भी विचार कर सकता था, उस चरमसीमा के दर्द को भी महसूस कर सकता था….और अपने पास ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है, इसका एहसास हरीश को हो गया। मग़र अपनी इस भयानक शारीरिक हालत पर ग़ौर करने के बजाय, यह भयानक अपघात देखकर इकट्ठा हुई भीड़ को अपने हाथों से इशारा कर वे पास बुलाने लगे। हालाँकि प्रत्यक्षदर्शियों में अधिकांश लोग सिर्फ़ मौत का वह हैरतंगेज़ तमाशा देखने के लिए ही खड़े थे, मग़र उनमें से कुछ भले और एक नागरिक के कर्तव्य के प्रति चौकन्ने रहनेवाले लोग आगे आये। हरीश ने उस हालत में भी उन्हें बताया कि वे उन्हें जल्दी से उन्हें अस्पताल ले जायें, ताकि वे अपनी आँखें तथा शरीर के अन्य कुछ अवयव मृत्युपश्चात् ज़रूरतमंदों को दान कर सकें। उन्हें ना तो अपने दर्द का खयाल था और ना ही अपने शरीर की विचित्र स्थिति का!

उनमें से कुछ ने पुलीस को ख़बर कर दी और बाकी के लोगों ने हरीश के शरीर के दोनों भाग एकत्रित कर उन्हें अस्पताल ले जाने की तैयारी शुरू कर दी। पुलीस के द्वारा शीघ्रतापूर्वक अँब्युलन्स बुलायी जाने के कारण चन्द कुछ मिनटों में ही हरीश अस्पताल पहुँच चुके थे। लेकिन दुर्भाग से उनका कुछ ही समय में देहांत हो गया।

Map shows Indian states that have done Deceased Donation Transplantation in India
Map shows Indian states that have done Deceased Donation Transplantation in India

लेकिन उनकी मृत्यु व्यर्थ नहीं गयी। उन्होंने प्रत्यक्षदर्शियों से जतायी इच्छा उनपर इलाज कर रहे डॉक्टरों तक पहुँचायी गयी थी। उनकी मृत्युपश्चात् उनकी आँखें एक आय-बँक को डोनेट की गयीं। लेकिन उनके अन्य अवयव, काफ़ी ख़ून बह जाने के कारण डोनेट करने के क़ाबिल नहीं बचे थे। ना सही, लेकिन इस वाकये में यही बात ग़ौरतलब है कि तुम्हारे-मेरे जैसा एक आम इन्सान, इतने भयानक हादसे का शिकार होकर भी, अपने पास वक़्त कम बचा है यह जानते हुए भी, अपनी वेदनाओं के बारे में या अपनी दर्दनाक स्थिति के बारे में न सोचते हुए, समयानुकूल सूझ दिखाकर यह विचार करता है कि कैसे मैं औरों के काम आ सकूँ!

आज दुनिया में कई ऐसे जीव हैं, जो दुर्भाग्यवश शारीरिक दृष्टि से हमारी तरह पूर्णत: स्वस्थ नहीं हैं। ऐसे अभागे व्यक्तियों की शारीरिक खामियों को पूरा करने के लिए ‘अवयवदान’ यह एक सुंदर उपाय है। अपनी मृत्यु के बाद अपने अवयवों का दान करने से कई अभागे जीवों के जीवन में आनंद खिल सकता है।

सचमुच! हरीश की इस एक कृति ने इन्सानियत का भी सिर फ़क्र से ऊँचा कर दिया!

॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

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2 Comments


  1. मानवी शरीर हे क्षणभंगूर आहे, मृत्यूनंतर सारेच नष्ट होते. मात्र अवयरुपी जिवंत रहायचे असेल तर आपण ‘अवयव दान‘ करू शकतो. मृत्यूपश्चात एक देह अनेक जणांच्या आयुष्यात एक आशेचा नवा किरण आणू शकतो. समीरदादांच्या ब्लॉगवरील हरीश नंजाप्पाविषयी वाचनात आले. आपला ऍक्सिडेंट होऊन आपली अत्यंत बिकट अवस्था झालेली असतानाही त्याने त्याला वाचवणार्‍या लोकांसमोर त्याची आधीपासून असलेली अवयवदानाची इच्छा प्रकट केली !!! केवळ २३ वर्षे वय असलेला एक युवक अवयवदानाविषयी इतका जागरूक असून दुसर्‍यांच्या रूक्ष, सुकलेल्या आयुष्यात स्वत:चे अवयवदान करून हिरवीगार फुलांची बाग फुलवू शकतो हे वाचून भरून आले…


  2. The God Is Greatहरीश सारख्यांमुळेच जग चाहते आगे,अंबन्य

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