युक्रेन का विस्फोट – भाग २

भाग -१

मगर ’सोविएत रशिया’ से स्वतंत्र हुए युक्रेन को रशिया के प्रभाव से निकालने की जरुरत ही क्यों थी?

the grand chessboardइसका उत्तर ढूंढने के लिए फिरसे थोडा पीछे जाना पडेगा। सन १९९७ में अमेरिका के एक प्रभावशाली राजनीतिक माने जानेवाले जिबिग्नोव ब्रिजेन्स्की की एक किताब प्रसिद्ध हुई। किताब का नाम था, ’द ग्रैंड चेसबोर्ड: अमेरिकन प्रायमसी ऐण्ड इट्स जिओस्ट्रैटेजिक इम्पेरेटिवज्’, इस किताब में उन्होंने ‘युरेशिया’(युरोप व रशिया) को शतरंज की बिसात कहकर, जागतिक प्राबल्य के लिए इसी बिसात पर सच्चा संघर्ष होगा, ऐसा मत रखा। तब इस बिसात पर युक्रेन की जगह बहुत महत्वपूर्ण होगी, भूराजनीतिक दृष्टि से यह देश युरेशिय का केंद्रबिन्दु साबित होगा ऐसा कहा गया।

 स्वत्तंत्र और युरोप के प्रभाववाले युक्रेन का अस्तित्व ही रशिया का ‘युरेशियन’ साम्राज्य का सपना उध्वस्त करने के लिए काफी है, यह बात भी ब्रिजेन्स्की ने अपनी किताब में कही है। ब्रिजेन्स्की ने उनके कार्यकाल में चीन, इराण, पूर्वी युरोप एवं अफगानिस्तान के संदर्भ में जो कुछ कहा था, उसका प्रभाव आज भी कायम है। इस से ब्रिजेन्स्की का अमेरिका की परराष्ट्र धारणा पर प्रभाव आसानी से समझ में आएगा।

 युक्रेन को अपनी ओर खींचने की कोशिश के पीछे जो सूत्र है वह बहुत हद तक ब्रिजेन्स्की द्वारा रखे गए विचारों पर ही आधारित है। इसलिए ‘ऑरेंज रिव्होल्युशन’ के बाद पकड ढीली होने के बावजूद अमेरिका और सहकारी युरोपीय देशों ने फिर एक बार युक्रेन पर प्रभाव डालने की कोशिशें शुरु कर दी। रशिया के समर्थक जाने जानेवाले राष्ट्रपति यानुकोविच के अनुमान और राज इस बात का कारण बने। युक्रेन को युरोप से जोडनेवाले ‘युक्रेन-युरोपियन युनियन असोसिएशन अ‍ॅग्रीमेंट’ का मुद्दा देश अंतर्गत असंतोश की चिंगारी सुलगानीवाली साबित हुई।

Putinरशिया के प्रभाव तले राष्ट्रपति विक्टर याजुकोविच ने ‘युक्रेन-युरोपियन युनियन असोसिएशन अ‍ॅग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। यह इन्कार युक्रेन की राजधानी किव समेत अन्य शहरों में आंदोलन भडकानेवाला साबित हुआ। वह दिन था २१ नवम्बर २०१३। थोडासा पीछे मुडकर देखें तो पता चलता है कि ठीक नौं साल पहले ‘ऑरेंज रिवोल्युशन’ भी इसी दिन भडका था।

 ‘ऑरेंज रिवोल्युशन’ के दौर में अमेरिका का हस्तक्षेप भले ही बाद में दिखाई दिया, फिर भी सन २०१४ में भडके हुए आंदोलन में अमेरिका और अन्य पाश्चात्य देश खुलेआम युक्रेन के सरकार विरोधी आदोलकों के साथ दिखाई दिए। अमेरिका और युरोप के अनेक वरिष्ठ अधिकारी और नेता आंदोलकों से मिलकर निडरता से साथ दे रहे थे।

 २१ नवम्बर २०१३ के दिन उडी हुई आंदोलन की चिंगारियां ने फिर एक बहुत बडे आंदोलन का रूप ले लिया। इस आंदोलन का नाम था, ‘युरोमैदान रिवोल्युशन’। राजधानी किव के मध्यवर्ति भाग में रखे गए नाम पर से यह नाम मशहूर हुआ था। नवम्बर महीने से शुरु हुए इस आंदोलन को फरवरी में हिंसक मोड मिला, या यूं कहें कि मोड दिया गया। आंदोलन को निर्णायक मोड तक लाने के लिए तीन महीने लगे होंगे, और इसके बाद की घटनाएं झटपट घटीं।

 २२ फरवरी, २०१४ के दिन संसद ने राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को निकाल दिया गया। तत्पश्चात उन्होंने युक्रेन से भागकर रशिया में आश्रय लिया। इसके बाद सामयिक सरकार की स्थापना, नए चुनावों की घोषणा, परदेसी सहायता और अमेरिका एवं युरोप द्वारा इन सभी के लिया घोषित किया हुआ समर्थन, यह सारी घटनाएं कुल हफ्तेभर में ही घट गईं। मगर इस दौरान रथिया भी शांति से नहीं बैठा रहा। रशिया के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन अच्छी तरह से जानते थे कि युक्रेन रशिया के लिए कितना महत्वपूर्ण है। रशिया के इंधन और संरक्षण क्षेत्र का हित युक्रेन पर बडे पैमाने पर आधारित था। युरोप पर दबाव और प्रभाव डालने के लिए भी युक्रेन रशिया के लिए महत्वपूर्ण होने की वजह से रशिया ने भी ’रशियन’ वंश के नागरिकों की सुरक्षा का कारण बताकर युक्रेन का ’क्रिमिया’ प्रांत रशिया में विलीन कर दिया। वास्तव में ’क्रिमिया’ तो रशिया ने ही युक्रेन को ’भेंट’ में दिया हुआ प्रांत था और इस प्रांत में रशिया ने अपना सैनिकी तल भी उभारा हुआ था।

  Cremia Mapइसलिए ’क्रिमिया’ आसानी से रशिया के हाथों में आ गया। मगर केवल क्रिमिया को अपने नियंत्रण में लेकर रशिया शांत नहीं बैठा। युक्रेन पर प्रभाव गंवाया होगा, पर फिर भी रशिया का प्रभाव कम नहीं हुआ था। इसी प्रभाव का उपयोग करके रशिया ने युक्रेन के पूर्वी प्रांत में असंतोष की चिंगारी भडकाई। पूर्वी युक्रेन के डोनेस्क व लुहान्स्क इन दो प्रांतों में रशियान वंश के नागरिकों की संख्या ज्यादा थी, इसलिए ‘युक्रेनियन विरुद्ध रशियन’ ऐसी वांशिक शालीनता के मुद्दे पर आग बहुत भडकी। यह प्रांत रशियन सीमा से जुडा हुआ होने की वजह से इस भाग में आतंकियों की सहायता करना रशिया के लिए आसान था। इसीलिए युक्रेन की सेना पाश्चात्यों की सहायता पर यहां तक आकर कई महीने बीत गए फिर भी आतंकियों को मारना तो दूर, उन्हें वहां से हटाना भी युक्रेन के लिए संभव न हो पाया है। बल्कि, पूर्वी युक्रेन के इस संघर्ष के कारण ’रशिया’ के विरोध में युक्रेन की मर्यादाएं साफ होने लगीं। युक्रेन की सेना आतंकियों के विरुद्ध नाकामयाब होती दिखाई देने पर अमेरिका समेत पाश्चात्य देशों ने सैनिकी सहायता देना आरम्भ किया। मगर, यह इस सहायता के बावजूद युक्रेन के सैनिकों का मनोबल नहीं बढा। युक्रेन की सेना द्वारा विभिन मुहीमें नाकामयाब साबित हुईं। इ्न मुहीमों से दोनों तरफ का नुकसान होने के अलावा कुछ भी हाथ नहीं आया। पूर्वी युक्रेन में हुए संघर्ष में दोनों तरफ के कुल चार हजार लोग मारे गए।

 पिछले एक-दो महीनों में सैनिकी कार्यवाईयां बंद हो चुकी होंगी, फिर भी अंतरराष्ट्रिय स्तर पर समीकरण बहुत ही बदल चुके हैं। अमेरिका और युरोप ने आर्थिक निर्बंधों का शस्त्र उठाया ताकि रशिया युक्रेन से खुद-ब-खुद लौट जाए। उनके इस हमले को रशिया ने भी निर्बंधों के रूप में जोरदार प्रत्युत्तर दिया। आर्थिक निर्बंधों के अलावा अन्य क्षेत्र में भी पाश्चात्य देशों ने रशिया के साथ सहकार्य का हाथ छुडाने लगे। इसका परिणाम जितना रशिया पर हुआ उतना ही युरोप पर भी होता दिखाई दे रहा है।

 आर्थिक बातों के बारे में ही गौर करें तो इन दिनों युक्रेन, रशिया और युरोप तीनों की अर्थव्यवस्था संकट में है। युक्रेन को तो युरोप, अमेरिका और उनके नियंत्रण तले आर्थिक संघटनाओं द्वारा ’आर्थिक सहायता’ के अलावा कोई चारा नहीं है। तो इससे पूर्व कर्ज में डूबे हुए युरोप की अर्थव्यवस्था फिरसे मंदी के चपेट में है। रशिया विश्व के विभिन्न भागों से अपने प्रभाव और मूल आर्थिक ताकत के बल पर डटा हुआ है और साथ ही साथ भविष्य का विचार करके चीन समेत एशियाई देशों से नजदीकी रिश्ता और सोने की बढती खरीद जैसे कदम उठाने लगा है।

  इस सब में ’इंधन’ जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को नजरंदाज करना ठीक नहीं होगा। रशिया के पास इंधन के बहुत बडे भंडार हैं और इन भंडारों के मुख्य ग्राहक है युरोप। और इस ग्राहक के पास जाने का मार्ग युक्रेन से जाता है। युरोप को इंधन की आपूर्ति के सभी महत्वपूर्ण और इंधन के बडे पाइपलाइन युक्रेन से ही गुजरते हैं। ऐसे युक्रेन पर ग्राहक के रूप में ’युरोप’ या अपना राज खोनेवाली अमेरिका का प्रभाव होना यह बात रशिया को कभी गवारा नहीं होगी। इसलिए किसी भी कीमत पर युक्रेन पर पाश्चात्यों का पूरा प्रभाव न हो पाए इसलिए रशिया की कोशिशें जारी हैं।

 इन दिनों रशिया और अमेरिका के संबंध ‘सोविएत रशिया’ के दौर के शीतयुद्ध की स्थिति तक पहुंच चुके हैं। अमेरिका के साथ यह तनाव रशिया और युरोपिय महासंघ में सहमति पर विपरीत परिणामकारक साबित हुआ है। उस पर अमेरिका और युरोपिय देशों की सैनिकी संघटना मानी जानेवाली नाटो, युक्रेन के मुद्दे पर रशिया को अधिकाधिक चेतावनियां देने की कोशिश कर रही है।

 Gas-Pipelines in Ukraine

युक्रेन के मुद्दे पर उठाया हुआ एक गलत कदम दोनों देशों समेत विश्व को भी विश्वयुद्ध की ओर ले जानेवाला साबित होगा, ऐसे स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। और इन सब में युक्रेन में निर्माण हुई समस्या का समाधान आनेवाले नजदीकी समय में दिखाई नहीं दे रहा है। बल्कि विश्लेषक और विशेषज्ञों का मानना है कि, युक्रेन की वजह से निर्माण हुआ तनाव ’फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट’ है और यह तनाव कई सालों तक बना रहेगा।

 ‘ऑरेंज रिवोल्युशन’ को एक दशक पूरा नहीं हुआ और युक्रेन में दूसरी क्रांति आ गई है। इस क्रांति का ’रंग’ दिखाई भले ही न देता हो, फिर भी युक्रेन के सर्वसामान्य नागरिकों के लिए शायद लाल अर्थात खून से लथपथ होने की संभावना अधिक है। क्योंकि, युक्रेन का इतिहास और भुगोल और पिछले कई दशकों से अंतरराष्ट्रिय समीकरण देखें तो युक्रेन की समस्या का समाधान निकले ऐसी इच्छा युक्रेन के सर्वसामान्य जनता के अलावा अन्य किसी की नहीं होगी। बल्कि, लोकतंत्र, मुक्त अर्थव्यवस्था, वंशवाद, इतिहास जैसे विभिन्न मुद्दों पर युक्रेन का ’खेल’ कैसे खेला जाए इसके गणित दोनों तरफ से लगाए जा रहे हैं।

 क्या यह गणित कभी हल होगा? या बंटवारा, समझौता को कामयाबी हासिल होगी और महासत्ताएं यह प्रश्न भाईचारे से निकाल पाएंगे? इस प्रश्न का उत्तर फिलहाल नकारात्मक है। क्योंकि युक्रेन के प्रश्न का हल निकाले जाने के लिए निर्माण नहीं किया गया है। इसके पीछे प्रभाव और इंधन की राजनीति समूचे विश्व को लपेट रही है। इस विश्व पर अंत में किसका प्रभाव प्रस्थापित होगा, इस प्रश्न का उत्तर युक्रेन जैसी समस्याएं निर्माण करके ढूंढे जा रहे हैं। मगर उत्तर मिलना इतना आसान नहीं है। रशिया को घुटने टेकने पर मजबूर करने के सपने अमेरिका देख रहा है, मगर वह कभी भी कामयाब नहीं होगा, ऐसी धमकी रशियन राष्ट्रपति पुतिन ने दी है। तो अमेरिका के जॉन मॅक्कन जैसे जहाल नेता और ब्रिझेन्स्की जैसे बुद्धीमानों का मानना है कि, रशिया को नेस्तनाबूत करने के लिए हर संभव कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है। महासत्ताएं जब अपनी सारी क्षमता दांव पर लगा देती हैं उन युद्धों के या छुपे युद्धों के परिणाम आसानी से नहीं निकलते। परिणामों लिए समय लगता है। आमसामने होनेवाले युद्दों में जितना नुकसान होता, उससे कई गुना अधिक नुकसान इस दौर में होनेवाले युद्धों में होगा।

 यदि यह नुकसान युक्रेन, रशिया या अमेरिका तक ही सीमित रहते तब भी अधिक दुर्भाग्य की बात न होती, मगर इस हानी का झटका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुडे हुए न होने के बावजूद हजारों मैलों तक सर्वसामान्य जनता को भी भुगतने पडेंगे। कैसे? इस प्रश्न का उत्तर हमें शीतयुद्ध के इतिहास से मिल सकता है।

॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

                                                       

                                                       

                                                         युरोमैदान रिवोल्युशन

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