सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति (The worship offered to any deity ultimately reaches to the Supreme Being Keshava) – अनिरुद्ध बापू

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १० मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति’ इस बारे में बताया। 

अनिरुद्ध बापू ने पितृवचन के दौरान यह बताया की, हर किसी के दिमाग में एक सवाल उठता है । कि हम लोग कौनसी प्रार्थना करे, कौनसा जप करे गुरुक्षेत्रम का मंत्र दररोज करना बहुत अच्छी बात है, सुंदर बात है, compulsory नहीं है। वैदिक धर्म की महत्ता है भारतीय धर्म की महत्ता है की compulsory कुछ नही होता। हम हमारे प्यार से करते है।

हमारे ग्रंथराज मे जितने सारे स्तोत्र दिए है मंत्र दिए है कौनसा भी ले सकते है। लेकिन कोई नियमित रहे तो बहुत अच्छा है, कोई एक महिने मे आप ज्यादा करना चाहते है एक महिना कम करना चाहते है कोइ problem नही है। ok लेकिन उसके सान्निध्य मे रहना। सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति | शव याने आकृती जो आकृती कि परे है।

सच्चिदानंद स्वरूप उस स्वरूप के साथ ही उस स्वरूप के पास ही हमारा हर प्रणाम जाता है। उस स्वरूप के पास से ही सारे वरदान आते है। जो हमारे कुल देवताऎ होती है, इष्टदेवताऎ होती है, वासुदेवताऎ, ग्रामदेवताऎ होते है, नगर देवताऎ होती है। ये सब सच्चिदानंद स्वरूप काही विलास है। बाकी कुछ नही है, ऐसे अनिरुद्ध बापू ने कहा

आगे अनिरुद्ध बापू  बोले, पुरी जिंदगी हम हवा अंदर लेते रहते है, 18 times breathing करते है। कितनी हवा लेते है calculate करके देखिय़े। कितनी हवा हमने अंदर ली। तो जान जाऎगे कि इतनी सारी ढेर सारी हवा अंदर ली । फ़िरभी क्या हमारा वजन बढा। क्या हमारे सर पर भार ज्यादा हो गया नही ना? वैसे ही ये सच्चिदानंद स्वरूप का जो स्वत्व है। हमारे इष्ट देवत का जो स्वत्व है जितना ज्यादा ग्रहण करते रहेंगे उतना अच्छा ही है। उससे कभी toxicity or poisoning नही हो सकता। लेकिन हमारे जिवन के लिऎ जो भी साँस लेना आवश्यक है। तो वैसे ही जो जो आवश्यक है, जो जो अच्छा है। जो हमारे जिवन की रक्षा के लिए, हमारे अपनोंकी रक्षा के लिऎ उनके वृध्दी कि लिऎ, उनके उन्नती के लिऎ। जो भी आवश्यक है उन सबका स्विकार करते रहेंगे।   

‘सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति’ इस बारे हमारे सद्गुरु बापू ने अपने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडियो में देख सकते हैं।

॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

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