सप्तचक्रों में सन्तुलन रहने की आवश्यकता (The significance of the balance in sapta chakras) – Aniruddha Bapu Pitruvachanam 15 Oct 2015

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘सप्तचक्रों (sapta chakras) में सन्तुलन रहने की आवश्यकता’ के बारे में बताया।
 
अनिरुद्ध बापू ने पितृवचन के दौरान यह बताया कि अब देखिए जिस पृथ्वी पर हम मानव बनकर आये हैं, उस वसुंधरा के भी सप्तचक्र हैं। वह भी पिंड है ना! तो उसके भी सप्तचक्र होते हैं। वसुंधरा के भी सप्तचक्र होते हैं। ब्रम्हांड के भी सप्तचक्र है। उसी के साथ साथ जान लीजिए कि जिस देश मे हम लोग रहते है उस देश के भी सप्त चक्र होते है। हम भारत के हैं तो भारत के भी सप्तचक्र हैं। भारत के वैसे ही सप्तचक्र होते हैं, मूलाधार से सहस्रार तक। उन्हें कौन बनाता है? – हम भारतीय जो हैं वे बनाते है। हम जैसा बर्ताव करते है वैसे उन चक्रों की ताकद बढती या घटती है। 
उसके बाद मे हमारा जो निवासी प्रदेश है उसके भी सप्तचक्र होते हैं। हम यहॉ मुम्बई में रहते हैं तो ये प्रदेश जो है – ये अक्षांश और रेखांश के अनुसार प्रदेश होते हैं। उसके अपने अपने सप्तचक्र होते है। अभी एक भारत का व्यक्ति अमरिका में रहता हो तो उसका देश तो भारतीय है, उसका कनेक्शन भारत के साथ ही जुडा रहेगा। लेकिन उसका निवास वहाँ होने के कारण उसके सप्तचक्र जो हैं, वे वहॉ के सप्तचक्रों के साथ भी जुड जायेंगे।
इसके बाद, जिस वास्तु में हम रहते हैं याने इमारत, बिल्डींग के भी अपने सप्तचक्र होते हैं। हमारा खुद का अपना appartment / block होता है उसके भी सप्तचक्र होते हैं। इतने सारे सप्तचक्रों के साथ हमारा connection होता है। और यह जो connection है, इसमें जब balance होता है तब ही सुख मिलता है। सप्तचक्रों में सन्तुलन रहने की आवश्यकता’ के बारे में हमारे सद्गुरु अनिरुद्ध बापू ने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं।

॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

Related Post

Leave a Reply