Shree Shabda Dhyanyog

श्रीशब्दध्यानयोग

Shree Shabda Dhyanyog

सप्तचक्रांचे अ) गायत्रीमंत्र व ) स्वस्तिवाक्ये :-

1. मूलाधार चक्र

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  1. गायत्रीमंत्र – ॐ भू: भुव: स्व:। ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ति: प्रचोदयात्॥

    2. स्वस्तिवाक्य

  • मूलाधारगणेशाच्या कृपेमुळे मी संपूर्णपणे सुरक्षित आहे.
  • मूलाधारगणेश की कृपा से मैं संपूर्ण रूप से सुरक्षित हूँ।
  • By the grace of the MuladharGanesh, I am completely safe and secure
  • मूलाधारगणेशस्य कृपया अहं संपूर्णत: सुरक्षित:।

 2. स्वाधिष्ठान चक्र

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1.  गायत्रीमंत्र – ॐ भू: भुव: स्व:। ॐ हिरण्यगर्भाय विद्महे। विरंचये च धीमहि। तन्नो प्रजापति: प्रचोदयात्॥

2.   स्वस्तिवाक्य

  • प्रजापति-हिरण्यगर्भाच्या कृपेमुळे मी सक्षम आहे आणि मी सुखात आहे.
  • प्रजापति-हिरण्यगर्भ की कृपा से मैं सक्षम हूँ और मैं सुखी हूँ।
  • By the grace of Prajapati-Hiranyagarbha, I am capable and I am happy.
  • प्रजापति-हिरण्यगर्भस्य कृपया अहं सक्षम: सुखी च।

3. मणिपुर चक्र

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1.  गायत्रीमंत्र – ॐ भू: भुव: स्व:। ॐ राघवाय विद्महे। रामभद्राय धीमहि। तन्नो श्रीराम: प्रचोदयात्॥

2. स्वस्तिवाक्य

  • श्रीरामकृपेने मी यशस्वी आहे.
  • श्रीराम की कृपा से मैं यशस्वी हूँ।
  • By the grace of Shreeram I am successful.
  • श्रीरामकृपया अहं यशस्वी।
  1. अनाहत चक्र

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1. गायत्रीमंत्र – ॐ भू: भुव: स्व:। ॐ तत्पुरुषाय विद्महे। महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्॥

2. स्वस्तिवाक्य

  • माझा पिता त्रिविक्रम मला सदैव क्षमा करतो.
  • मेरे पिता त्रिविक्रम मुझे सदैव क्षमा करते हैं।
  • The Trivikram, my Father, always forgives me.
  • मत्पिता त्रिविक्रम: मां सदैव क्षमां करोति।

  5. विशुद्ध चक्र

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  1. गायत्रीमंत्र – ॐ भू: भुव: स्व:। ॐ पुरंदराय विद्महे। वृत्रान्तकाय धीमहि। तन्नो वेदेन्द्र: प्रचोदयात्॥

2. स्वस्तिवाक्य

  • युद्ध माझा राम करणार। समर्थ दत्तगुरु मूळ आधार।
    मी सैनिक वानर साचार। रावण मरणार निश्चित॥

  • युद्ध करेंगे मेरे श्रीराम। समर्थ दत्तगुरु मूल आधार।
    मैं सैनिक वानर साचार। रावण मरेगा निश्चित ही॥

  • My Ram will wage war;

    Self-sufficient, Dattaguru is the Origin, the Basis;

    A soldier, I am a vanar in word and in deed; Ravan will die, yes he will.

  • युद्धकर्ता श्रीराम: मम। समर्थ: दत्तगुरु: मूलाधार:।

    साचार: वानरसैनिकोऽहम्। रावणवध: निश्चित:॥

6. आज्ञा चक्र

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1. गायत्रीमंत्र – ॐ भू: भुव: स्व:। ॐ महाप्राणाय विद्महे। आञ्जनेयाय धीमहि। तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्॥

2. स्वस्तिवाक्य

  • साक्षात श्रीहनुमन्त माझा मार्गदर्शक आहे आणि माझे बोट धरून चालत आहे.
  • साक्षात् श्रीहनुमानजी मेरे मार्गदर्शक हैं और वे मेरी उँगली पकड़कर चल रहे हैं।
  • Shreehanumanta Himself is my guide and He walks holding me by the finger.
  • साक्षात् श्री हनुमान् मम मार्गदर्शक: तथा स: मम अंगुलं धृत्वा चलति।

 7. सहस्रार चक्र

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  1. गायत्रीमंत्र – ॐ भू: भुव: स्व:। ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे। सर्वशक्त्यै च धीमहि। तन्नो जगदम्ब प्रचोदयात्॥
  2. स्वस्तिवाक्य
  • मी परिपूर्ण आहे. मी सुशान्तमन-दुर्गादास आहे.
  • मैं परिपूर्ण हूँ। मैं सुशान्तमन-दुर्गादास हूँ।
  • I am complete and sufficient.I am a calm, serene and peaceful server of the Mother Durga.
  • अहं परिपूर्ण:। अहं सुशान्तमनोदुर्गादास:।

मातृवाक्य :-

  • माझ्या बालका, मी तुझ्यावर निरंतर प्रेम करीत राहते.

  • मेरे बच्चे, मैं तुम से निरंतर प्रेम करती रहती हूँ।

  • My dear child, I love You always.

  • मम बालक, अहं त्वयि निरन्तरं स्निह्यामि।

ॐ शान्ति: शान्ति: सुशान्ति: ॥

सप्तचक्र उपासना - अधिक सुलभतेने कशी करावी?

[dropcap]गु[/dropcap]रुवार, दि. १५ ऑक्टोबर २०१५ रोजी परमपूज्य सद्‌गुरु बापूंनी “श्रीशब्दध्यानयोग” ही, श्रद्धावानांचा अभ्युदय (सर्वांगीण विकास) घडवून आणणारी सप्तचक्रांची उपासना श्रीहरिगुरुग्राम येथे सुरु केली. त्यानंतर संस्थेतर्फे ह्या उपासनेची माहिती देणारी पुस्तिकाही श्रद्धावानांकरिता उपलब्ध करण्यात आली. पुस्तिकेत दिलेल्या माहितीनुसार, श्रद्धावान पुस्तिकेतील चक्रांच्या प्रतिमेकडे पाहता पाहता त्या संबंधित चक्राचा गायत्री मंत्र आणि स्वस्तिवाक्य म्हणत घरी उपासना करू शकतात. गुरुवार, दि. २१ जानेवारी २०१६ रोजी आपल्या पितृवचनामध्ये सद्‌गुरु बापूंनी अकारण कारुण्याची पुन्हा एकदा प्रचिती

सप्तचक्र उपासना - अधिक सुलभतासे कैसे करे?

[dropcap]गु[/dropcap]रुवार, दि. १५ अक्तूबर २०१५ को परमपूज्य सद्‌गुरु बापू ने “श्रीशब्दध्यानयोग” यह, श्रद्धावानों का अभ्युदय (सर्वांगीण विकास) करानेवाली सप्तचक्रों की उपासना श्रीहरिगुरुग्राम में शुरू की। उसके बाद, इस उपासना की जानकारी देनेवाली पुस्तिका भी संस्था की ओर से श्रद्धावानों के लिए उपलब्ध करायी गयी। पुस्तिका में दी गयी जानकारी के अनुसार, श्रद्धावान पुस्तिका में दी गयीं चक्रों की प्रतिमाओं की ओर देखते हुए उस संबंधित चक्र का गायत्री मंत्र और

Aniruddha Bapu pitruvacahanam

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘ श्रीशब्दध्यानयोग यह अद्भुत है’ इस बारे में बताया।    श्रीशब्दध्यानयोग में उपस्थित रहना है सिर्फ हमको। ना कोई एन्ट्री फीज्‌ है, ना कोई दक्षिणा मूल्य है, या और कुछ भी नहीं है। हमें उपस्थित रहना है, जितना हो सके। अगर एक गुरुवार आ सके, बात ठीक है, अगर महिने में एक ही बार आ सकते हैं तो भी

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘श्रीशब्दध्यानयोग के साथ स्वयं को जोड लो’ इस बारे में बताया।

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘श्रीशब्दध्यानयोग के साथ स्वयं को जोड लो’ इस बारे में बताया।   स्वस्तिवाक्य जो होंगे, ये वाक्य हमारे उस उस चक्र को स्ट्रेन्थ देते हैं, पॉवर देते हैं, शक्ति देनेवाले वाक्य हैं। हमारे उस मूलाधार चक्र का स्वस्तिवाक्यम्‌, जो हम बोलेंगे, सिर्फ उच्चार से यहॉं आपके उस चक्र की ताकद बढ जाएगी, जो दुर्बलता होगी वह दूर हो

Aniruddha Bapu pitruvacahanam

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में श्रीशब्दध्यानयोग- आज्ञाचक्र और सहस्रार चक्र उपासना के बारे में जानकारी दी।   आज्ञाचक्र के स्वामी स्वयं महाप्राण हनुमानजी है, अत एव आज्ञाचक्र प्रतिमा का पूजन महाप्राण सूक्तों से होगा। यह महाप्राण सूक्त बहुत ही सुंदर है। छांदोग्य उपनिषद्‌ में बहुत सुंदर महाप्राण सूक्त है, मुख्य प्राण को इतनी आसानी से कहीं समझाया नहीं गया है, जितना कि छांदोग्य

श्रीशब्दध्यानयोग-विधि

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘श्रीशब्दध्यानयोग-विधि’ के बारे में बताया।   अनिरुद्ध बापू ने पितृवचन में यह बताया कि पहले मूलाधार चक्र की उपासना होगी, पूजन होगा। उसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र की प्रतिमा होगी। मूलाधार चक्र के बाद स्वाधिष्ठान चक्र इसी क्रम से सप्त चक्रों की उपासना एवं पूजा होगी।   स्वाधिष्ठान चक्र – इसके स्वामी है प्रजापति ब्रह्मा। यहाँ प्रजापतति हिरण्यगर्भ

श्रीशब्दध्यानयोग-विधि

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में श्रीशब्दध्यानयोग के बारे में जानकारी दी।   अनिरुद्ध बापू ने पितृवचन के दौरान यह बताया कि ‘श्री’ यानी आदिमाता। आदिमाता अदिति, जो परमेश्वर से दत्तगुरु से अभिन्न स्वरूप में रहती है, उसे अदिति कहते हैं, श्री आदिमाता के प्रथम स्वरूप को अदिति कहते हैं, वह जब प्रकट होती है तो उसे गायत्री कहते हैं।   यह जो

सहस्रार चक्र

सप्तचक्रांचे अ) गायत्रीमंत्र व ब) स्वस्तिवाक्ये :- 1. मूलाधार चक्र         गायत्रीमंत्र – ॐ भू: भुव: स्व:। ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ति: प्रचोदयात्॥     2. स्वस्तिवाक्य – मूलाधारगणेशाच्या कृपेमुळे मी संपूर्णपणे सुरक्षित आहे. मूलाधारगणेश की कृपा से मैं संपूर्ण रूप से सुरक्षित हूँ। By the grace of the MuladharGanesh, I am completely safe and secure मूलाधारगणेशस्य कृपया अहं संपूर्णत: सुरक्षित:।  2. स्वाधिष्ठान चक्र    

Aniruddha Bapu pitruvacahanam

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘श्रीशब्दध्यानयोग जीवन में सुसंगति एवं सन्तुलन लाता है’ इस बारे में बताया।   अनिरुद्ध बापू ने पितृवचन के दौरान यह बताया कि हम जिन व्यक्तियों के साथ रहते हैं, जिन व्यक्तियों के साथ हमारा रोजमर्रा का काम होता है, उनके साथ हमारे सप्तचक्र जुडे हुए होते हैं। इस लिए जिस घर में यह balance नहीं है, उस घर

श्रीशब्दध्यानयोग-विधि

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘सप्तचक्रों (sapta chakras) में सन्तुलन रहने की आवश्यकता’ के बारे में बताया।   अनिरुद्ध बापू ने पितृवचन के दौरान यह बताया कि अब देखिए जिस पृथ्वी पर हम मानव बनकर आये हैं, उस वसुंधरा के भी सप्तचक्र हैं। वह भी पिंड है ना! तो उसके भी सप्तचक्र होते हैं। वसुंधरा के भी सप्तचक्र होते हैं। ब्रम्हांड के

Aniruddha Bapu pitruvacahanam

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘श्रीशब्दध्यानयोग’ के बारे में बताया। अनिरुद्ध बापू ने आज से शुरू किये हुए प्रथम पितृवचन के दौरान यह बताया कि ‘आज मी येथे आलो आहे सांगितल्याप्रमाणे, ते काहीतरी नवीन तयार करण्यासाठी. हम जो आज यहॉ मिल रहे हैं, एकही कारण से। हमें स्वस्तिक्षेम्‌ संवादम्‌ मिला, हमें श्रीश्वासम्‌ में गुह्यसूक्तम्‌ मिला, आज हमें क्या मिलनेवाला है? बहोत ही