discourse

“Sadguru Shree Aniruddha’s discourse answers so many of the questions that cross the mind. They give the strength to tackle difficult situations and make us feel confident and taken care of.”

This is what every person who comes to Shree Harigurugram (The New English School, Bandra East, Mumbai) to attend Sadguru Shree Aniruddha Bapu’s discourses feels. He feels it on the very first Thursday that he came and he feels it every Thursday there on. He can relate to the topics and the lucidity of the language, the simplicity of the explanation make it easy for him to implement all that he takes home. He not only knows what to do but also how to do it.

The discourse does not dwell on complex and erudite subjects. For instance, the discourse based on the Vishnusahasranaam deals with one of the thousand names of Vishnu and sheds light on the special attributes of this name and all of this in a way that we all can relate to, imbibe, practice and feel the goodness of it in our lives. What good is a fact that is great and admirable but has nothing to do with us common persons? Every person is entitled to know and understand the path to happiness, the path to God and the path to virtue.

Worldly life never stands in the way of spirituality and the two are not mutually exclusive. In fact the first successful step towards a spiritual life is a virtuous and dutiful worldly life.

The guidance that the discourses offer are therefore, signposts to happiness and strength in life. A perfect family person Himself, Sadguru Shree Aniruddha Bapu’s discourses guide about parenting, about duties and responsibilities within the family, within a society, within the motherland and of course towards mankind at large.

संघर्ष से विकास होता है (The Struggle brings the Growth) - Aniruddha Bapu

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २८ एप्रिल २०१६ के पितृवचनम् में  ‘संघर्ष से विकास होता है’, इस बारे में बताया। संघर्ष क्या है? संघर्ष। कौन सही या कौन गलत ये decide करने के लिये नहीं होता। संघर्ष होता है, विकास के लिये। संघर्ष किस लिये होना चहिये? विकास के लिये। मेरी भी भलाई हो और सामनेवाले की भी भलाई हो। जैसे, स्कूल में देखो, डिबेट रहती है, वाद विवाद

नये युग का स्वीकार बडे प्यार से करो (Accept the new era with love) - Aniruddha Bapu

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने 31 मार्च २०१६ के पितृवचनम् में ‘नये युग का स्वीकार बडे प्यार से करो’ इस बारे में बताया। मृत्यु सिर्फ़ शरीर की ही नहीं बल्की कार्य की भी होती है, मृत्यु मन की भी होती है, भावना की भी होती है। मृत्यु रिश्ते की भी होती है। Husband & Wife जब divoce लेते हैं तो वो उस शादी की मृत्यु ही है। एक मॉ-बाप

Aniruddha Bapu pitruvacahanam

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १५ अक्तूबर २०१५ के पितृवचनम् में ‘ श्रीशब्दध्यानयोग यह अद्भुत है’ इस बारे में बताया।    श्रीशब्दध्यानयोग में उपस्थित रहना है सिर्फ हमको। ना कोई एन्ट्री फीज्‌ है, ना कोई दक्षिणा मूल्य है, या और कुछ भी नहीं है। हमें उपस्थित रहना है, जितना हो सके। अगर एक गुरुवार आ सके, बात ठीक है, अगर महिने में एक ही बार आ सकते हैं तो भी

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ३ सितंबर २०१५ के प्रवचन में ‘प्रवचन नहीं, बस बातें’ इस बारे में बताया।

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ३ सितंबर २०१५ के प्रवचन में ‘प्रवचन नहीं, बस बातें’ इस बारे में बताया। आनिरुद्ध बापू ने अपने प्रवचन में कहा – ‘मैंने पहले दिन से कहा कि मैं यहां आप को जो अच्छा लगता है, किसी को भी अच्छा लगता है, वह बोलने के लिए कभी नही बैठा हूँ… और कभी मैंने इस पद्धति का अनुनय भी नहीं किया। जो मुझे अच्छा

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘इस विश्व की मूल शक्ति सद्‍गुरुतत्त्व है’ इस बारे में बताया।

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘इस विश्व की मूल शक्ति सद्‍गुरुतत्व है’ इस बारे में बताया। हमारे मन में प्रश्न उठता होगा कि मैं रामनाम लूं या एक बार रामनाम लेकर १०७ बार राधानाम लूं या गुरू का नाम लूं या जो भी कोई नाम लूं, कितनी भी बार लूं तब भी कोई प्रॉब्लेम नहीं है। एक साथ नामों की खिचडी

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २०१५ के हिंदी प्रवचन में ‘भक्ति हमारा शुद्ध भाव बढाती है’ इस बारे में बताया।

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘भक्ति हमारा शुद्ध भाव बढाती है’ इस बारे में बताया। हिरन और शेर का उदाहरण देते हुए अनिरुद्ध बापू ने भय और निर्भयता ये शुद्धता और अशुद्धता से ही आते हैं, यह समझाया। हिरन के पास भय है और यह भय (डर, Fear) यह सब से बुरी अशुद्धता है। यहॉ अशुद्धता के बारे में नही सोच

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘शुद्धता यह सामर्थ्य है’ इस बारे में बताया।

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘ शुद्धता यह सामर्थ्य है ’ इस बारे में बताया। कृष्ण भगवान और राधाजी का हमारे जिंदगी के साथ क्या रिश्ता है, यह बात समझाने के लिए अनिरुद्ध बापू ने पानी और साबुन का उदाहरण देकर समझाया। उन्होंने कहा- ‘हम देखते हैं कि जब हम स्नान करते हैं। जिस पानी से हम स्नान करते हैं वह पानी

परमपूज्य सद्‍गुरू श्री अनिरुद्ध बापूंनी त्यांच्या २८ मे २०१५ च्या मराठी प्रवचनात ‘आदिमाता शक्ति पुरवायला समर्थ आहे’ याबाबत सांगितले.

परमपूज्य सद्‍गुरू श्री अनिरुद्ध बापूंनी त्यांच्या २८ मे २०१५ च्या मराठी प्रवचनात ‘ आदिमाता शक्ति पुरवायला समर्थ आहे ’ याबाबत सांगितले. आदिमातेकडे तिच्या बाळांसाठी भेदभाव नाहीव. सर्व तिची बालकंच आहेत. तिच्यासाठी छोटे बालक, आणि वृद्ध ही बालकंच आहे. वयाची अडचण आदिमातेला आड येत नाही. आपण प्रथम आपला भाव तपासून पहायला हवा. त्यात तसूभरही फरक वाटला तर ती चूक सुधारायला हवी. त्यासाठी ती आदिमाता आणि तिचा पुत्र त्रिविक्रम आपल्या हातात शंभरपट

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘राधाजी शुद्ध भाव हैं (Radhaji is shuddha bhaav)’ इस बारे में बताया।

राधाजी शुद्ध भाव हैं (Radhaji is shuddha bhaav) – Aniruddha Bapu‬ परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में ‘राधाजी शुद्ध भाव हैं’ इस बारे में बताया। हम उपासना करते हैं, साधना करते रहते हैं, आराधना करते रहते हैं, पूजन करते हैं, अर्चन करते हैं। अपने अपने धर्म, पंथ, प्रदेश, रीतिरिवाज के अनुसार अलग अलग तरीके से कर सकते हैं। कोई प्रॉब्लेम नहीं। लेकिन

राधा सहस्त्रनाम

सहस्र रामनामतुल्य राधा नाम (Sahastra Ramnaam-Tulya Radha Naam) – Aniruddha Bapu‬ परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने ५ फरवरी २००४ के ‘राधासहस्रनाम’ हिंदी प्रवचन में ‘सहस्र-रामनाम-तुल्य राधा नाम’ इस बारे में बताया। जब वेदव्यासजी ने गुरु नारदजी से यह पूछा कि मैं तो बस ‘राम’ नाम रटते ही आ रहा था, क्योंकि आपने ही मुझे बताया था कि एक राम नाम ही सहस्र नामों के बराबर है। तब नारदजी

लक्ष्मी अनपगामिनी असते Aniruddha Bapu

क्रमशील विकासाचा मार्ग (The Path of sequential development) – Aniruddha Bapu‬ परमपूज्य सद्‍गुरू श्री अनिरुद्ध बापूंनी त्यांच्या ४ जून २०१५ च्या मराठी प्रवचनात ‘ लक्ष्मी क्रमशीलतेच्या मार्गाने येते ’ याबाबत सांगितले. श्रेष्ठ ब्रह्मवादिनी लोपामुद्रेने लक्ष्मी मातेला आवाहन करण्यास जातवेदाला (त्रिविक्रमाला) सांगितले आहे कारण फक्त तोच लक्ष्मी मातेला किंवा महालक्ष्मीला आणू शकतो. तो या लक्ष्मी मातेला आणणार आहे, पण आम्हाला माहीत पाहिजे की लक्ष्मी कोणत्या मार्गाने येते? तर ती क्रमशीलतेच्या मार्गाने

हे जातवेदा, त्या अनपगामिनी लक्ष्मी मातेला आवाहन कर (Oh Jaataveda, Invoke that Anapagamini Lakshmi Mata) - Aniruddha Bapu Marathi‬ Discourse 04 June 2015

लक्ष्मी चंद्राप्रमाणे प्रकाश देणारी आहे (Lakshmi shines like the moon) – Aniruddha Bapu परमपूज्य सद्‍गुरू श्री अनिरुद्ध बापूंनी त्यांच्या ४ जून २०१५ च्या मराठी प्रवचनात ‘ लक्ष्मी चंद्राप्रमाणे प्रकाश देणारी आहे ’ याबाबत सांगितले. चंद्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो‍ म आवह। ह्या भारतीय संस्कृतीचा एक उत्कृष्ट गुणधर्म आहे की कोणतीही गोष्ट करायची ती रसिकतेने, सहजतेने, साधेपणाने, सुंदरतेने, मधुरतेने आणि तरीही दिखाऊ नाही, टाकाऊ नाही, नुसती सजवण्यासाठी नाही, तर अर्थगर्भ असणारी कार्यप्रवण

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २९ जनवरी २०१५ के अपने हिंदी प्रवचन में ‘हर एक के मन का पथ युनिक होता है (Every Individual's path of mind is unique)’, इस बारे में बताया।

मेरा साई मेरी सहायता अवश्य करेगा (My Sai will definitely help me) – Aniruddha Bapu‬ परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २९ जनवरी २०१५ के अपने हिंदी प्रवचन में ‘मेरा साई मेरी सहायता अवश्य करेगा’, इस बारे में बताया। हमारे विचार से हमारे मन का पथ बनता है। साई हमेशा यह ध्यान रखते हैं कि श्रद्धावान के मन का पथ कहीं भटक ना जाए। हमारा मन का पथ हमारी वाणी

Aniruddha Bapu told about Path of Mind in Hindi Discourse at Shree Harigurugram, Bandra.

दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं इसकी चिन्ता मत करना (Don’t worry about what others think of you) – Aniruddha Bapu परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २९ जनवरी २०१५ के अपने हिंदी प्रवचन में मन के पथ के बारे में जानकारी दी। बापू ने इस संदर्भ में बताते समय, ‘दूसरों के कहने से मानव अपने मन को बनाता रहता है, मानव अपना मन कभी भी स्वयं की बुद्धि

Bapu's pravachan announcement

सर्व श्रध्दावानांस कळविण्यास मला आनंद होतो की गुरुवार दिनांक ३ सप्टेंबर रोजी परमपूज्य श्रीअनिरुद्धबापू श्रीहरिगुरुग्राम येथे नित्य उपासना व प्रवचनास उपस्थित राहणार आहेत. या दिवशी फक्त एकच प्रवचन व तेही हिंदीतून होईल. बापूंचे पहिले प्रवचन गोकुळाष्टमी १९९५ या दिवशी झाले व आज ह्या घटनेस वीस वर्षे झाली आहेत. परमपूज्य बापूंच्या सदगुरुंनी घालून दिलेल्या मर्यादेनुसार, यापुढे दर गुरुवारी श्रीहरिगुरुग्राम येथे म्हणजेच प्रवचनस्थळी परमपूज्य बापू फक्त एकदाच हिंदीतून बोलतील / प्रवचन करतील