युक्रेन

इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि, आज जिसे युक्रेन के रूप में जाना जाता है वह २०वीं शताब्दी से पहले कभी भी एकसंघ या एक ही सत्तावाला देश नहीं रहा है। आज के युक्रेन का बहुत बडा भाग मूलत: नौवीं शताब्दी में एकसाथ हुआ और वह भी ’रूसी’ नागरिकों द्वारा स्थापन किए गए ’किवन रूस’ नामक संघराज्य तले। पर १३वीं शताब्दी के बाद इन संघराज्यों की शकलें बदलीं। इसके बाद इस पर लिथुआनिया, पोलंड, ऑटोमन साम्राज्य, ऑस्ट्रो-हंगेरी तथा रशिया जैसे विभिन्न सत्ताओं ने राज किया। इसके बाद वास्तव में सन १९१७ में एकसंघ देश बना रशिया में आई साम्य क्रांति के बाद।

 सन १९१७ से सन १९९१ तक रशियन संयुक्त राज्य से विघटित होने तक आज का युक्रेन ’युएसएसाआर’ अर्थात ‘युक्रेनियन सोवियत सोशॅलिस्ट रिपब्लिक’ के नाम से जाना जाता था। रशियन संयुक्त राज्य के पूर्व राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाचेव के उदार धारणा के बाद ‘सोवियत रशिया’ के जो विभाग हुए उनमें से आज के युक्रेन का जन्म हुआ। वह दिन था २४ अगस्त १९९१| इसके बाद आज तक के २३ सालों के दौर में से सन १९९४ से २००४, इन १० सालों के बाद का दौर आंदोलन, राजनैतिक असंतुलन एवं हिंसाचार से भरा रहा।

 आईए देखें वास्तव में इस दौर में हुआ क्या !

युक्रेन का विस्फोट - भाग २

मगर ’सोविएत रशिया’ से स्वतंत्र हुए युक्रेन को रशिया के प्रभाव से निकालने की जरुरत ही क्यों थी? इसका उत्तर ढूंढने के लिए फिरसे थोडा पीछे जाना पडेगा। सन १९९७ में अमेरिका के एक प्रभावशाली राजनीतिक माने जानेवाले जिबिग्नोव ब्रिजेन्स्की की एक किताब प्रसिद्ध हुई। किताब का नाम था, ’द ग्रैंड चेसबोर्ड: अमेरिकन प्रायमसी ऐण्ड इट्स जिओस्ट्रैटेजिक इम्पेरेटिवज्’, इस किताब में उन्होंने ‘युरेशिया’(युरोप व रशिया) को शतरंज की बिसात कहकर,

युक्रेन का विस्फोट - भाग १

’युक्रेन की समस्या की वजह से तीसरा विश्वयुद्ध भडक सकता है।’ – लिओनाईड क्रैवचुक, युक्रेन के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता एवं देश के पहले राष्ट्रपति पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के कारणों पर गौर करें तो क्रैवचुक की बात खोखली नहीं लगती। विश्वयुद्ध हो या विश्व में लंबे अरसे तक चलनेवाले अनेक संघर्ष; इनमें से अधिकतम की शुरुआत कुछ विचित्र तथा उस संघर्ष से सीधे संबंध रखनेवाली घंटनाओं से नहीं