बापू

भीतीविरुद्ध लढायला शिका. (Learn To Fight With Fear) - Aniruddha Bapu Marathi Discourse 25 Sep 2014

भीतीविरुद्ध लढायला शिका   भीती असणार्‍या माणसाचा उपहास करू नये कारण प्रत्येकाच्या मनात कशाची ना कशाची तरी भीती असतेच. त्या भीतीवर मात करायला मानवाने शिकायला हवे, याबद्दल परम पूज्य सद्गुरु श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या २५ सप्टॆंबर २०१४ रोजीच्या प्रवचनात सांगितले, जे आपण या व्हिडियोत पाहू शकता.   ॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

आजारासंबंधित खोटी भीती (False Fear About Illness) - Aniruddha Bapu Marathi Discourse 25 Sep 2014

आजारासंबंधित खोटी भीती False Fear About Illness – माणसाच्या मनात त्यानेच निर्माण केलेल्या ‘खोट्या मी’मुळे त्याच्या मनात अनेक चुकीच्या भित्या असतात. मानवाच्या मनातील आजारपणाची भीती हा या अनेक भित्यांमधील एक प्रकार आहे. अशा या आजारपणासंबंधितच्या खोट्या भीतीचा नाश कसा करावा, याबद्दल परम पूज्य सद्गुरु श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या २५ सप्टॆंबर २०१४ रोजीच्या मराठी प्रवचनात सांगितले, जे आपण या व्हिडियोत पाहू शकता.    ॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

स्वार्थ (Swaarth)

झूठे अहं से मुक्ति पाने का आसान उपाय | हनुमानजी का स्मरण करना और अपने आराध्य का ध्यान करना इस प्रक्रिया से मानव झूठे अहं से अपना पाला  छुडा सकता है। झूठे अहं से मुक्त होने के सरल उपाय के बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू  ने अपने १८ सितंबर २०१४ के  हिंदी प्रवचन में बताया, जो आप इस व्हिडियो में देख सकते हैं l ॥ हरि ॐ

स्वार्थ (Swaarth)

शोकविनाशक हनुमानजी | ShokVinashak Hanumanji हनुमानजी जिस तरह सीताशोकविनाशक हैं, उसी तरह रामशोकविनाशक एवं भरतशोकविनाशक भी हैं। मानव को यह सोचना चाहिए कि जो सीता और श्रीराम के शोक हो दूर कर सकते हैं, वे हनुमानजी क्या मेरे शोक को दूर नहीं कर सकते? अवश्य कर सकते हैं। हनुमानजी के शोकविनाशक सामर्थ्य के बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू  ने अपने १८ सितंबर २०१४ के हिंदी प्रवचन में बताया,

स्वार्थ (Swaarth)

भयभंजक हनुमानजी | मानव के जीवन में रामरूपी कर्म और कर्मफलरूपी सीता के के बीच में सेतु बनाते हैं महाप्राण हनुमानजी! रावणरूपी भय मानव के कर्म से कर्मफल को दूर करता है। रामभक्ति करके मानव को चाहिए कि वह हनुमानजी को अपने जीवन में सक्रिय होने दें। हनुमानजी के भयभंजक सामर्थ्य के बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू  ने अपने १८ सितंबर २०१४  के हिंदी प्रवचन में बताया,

स्वार्थ (Swaarth)

मधु-कैटभ-संहार   स्तुति और निन्दा के कारण मानव अपने अंदर ‘झूठे मैं’ को पनपने देता है। स्तुति-निन्दा को मन पर हावी होने देने के कारण मधु-कैटभ इन राक्षसों का जन्म होता है। आदिमाता महाकाली का अवतार मधु और कैटभ इन दो असुरों का वध करने हेतु हुआ था। मानव को इन राक्षसों से बचने के लिए क्या करना चाहिए, इसके बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू  ने अपने

स्वार्थ (Swaarth)

मानवी गर्भ पर भय असर करता है | भाग – ३ Fear भय के कारण मानव के मन पर बुरे परिणाम होते हैं। गर्भवती महिला के गर्भ पर भी भय का असर होता है। गर्भवती महिला को इस बात का विशेष ध्यान रखते हुए भयकारी बातों से दूर रहना चाहिए। मानवी गर्भ पर भय किस तरह असर करता है, इसके बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने

स्वार्थ (Swaarth)

मानवी गर्भ पर भय असर करता है | भाग – २ भय के कारण मानव के मन पर बुरे परिणाम होते हैं। गर्भवती महिला के गर्भ पर भी भय का असर होता है। गर्भवती महिला को इस बात का विशेष ध्यान रखते हुए भयकारी बातों से दूर रहना चाहिए। मानवी गर्भ पर भय किस तरह असर करता है, इसके बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १८

स्वार्थ (Swaarth)

मानवी गर्भ पर भय असर करता है| भाग – 1 भय के कारण मानव के मन पर बुरे परिणाम होते हैं। गर्भवती महिला के गर्भ पर भी भय का असर होता है। गर्भवती महिला को इस बात का विशेष ध्यान रखते हुए भयकारी बातों से दूर रहना चाहिए। मानवी गर्भ पर भय किस तरह असर करता है, इसके बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १८ सितंबर

स्वार्थ (Swaarth)

स्वयं को कोसते रहने की प्रवृत्ति और झूठा मैं| मनुष्य के हाथों जो गलती हुई है, उसका एहसास रखकर, उसे भगवान के पास उसे कबूल कर, उसे सुधारने का प्रयास भक्तिशील बनकर मानव को अवश्य करना चाहिए। उस गलती के लिए स्वयं को बार बार कोसते नहीं रहना चाहिए। मनुष्य के इस तरह स्वयं को बार बार दोषी ठहराते रहने की प्रवृत्ति से ‘झूठे मैं’ को बल मिलता है, इस

स्वार्थ (Swaarth)

विचारशृंखला की शुरुआत- भाग २ प्रसव के समय गर्भ की स्थिति-गति का परिणाम उस शिशु के यानी मानव के मन पर होता है। उस अवस्था में जिन परिवर्तनों से वह गुजरता है, उसके परिणामस्वरूप उस प्रकार के विचार दृढ होते हैं। गर्भस्थ शिशु अवस्था से शुरू होनेवाली इस विचार-शृंखला के बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू  ने अपने १८ सितंबर २०१४ के प्रवचन में मार्गदर्शन किया, जो आप

स्वार्थ (Swaarth)

विचारशृंखला की शुरुआत| कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि उसके मन में पहला विचार कब आया था। गर्भस्थ शिशु अवस्था से ही मानव के मन में विचार आते रहते हैं यानी माँ की कोख से जन्म लेने से पहले भी गर्भस्थ शिशु अवस्था में भी मानव सोचता रहता है। विचारों की इस शृंखला के बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १८ सितंबर २०१४ के

‘ॐ श्री सुरभ्यै नम:।’ (Om Shree Surabhyai Namah) - Aniruddha Bapu Marathi Discourse 14 Nov 2013

‘ ॐ श्री सुरभ्यै नम:। ’ प्रत्येक श्रद्धावान गायीला माता मानतो, तिची पूजा करतो. गोमातेच्या पावलांचे चिह्न उंबरठ्यावर, घरासमोर, देवघरात दररोज काढले जाते. गोवत्सद्वादशीच्या दिवशी म्हणजेच वसुबारसच्या दिवशी गोपद्मं अवश्य काढावीत आणि त्या दिवशी ‘ॐ श्री सुरभ्यै नम:।’  हा मंत्र कमीतकमी ५ वेळा म्हणावा. ‘ॐ श्री सुरभ्यै नम:।’  हा कामधेनूचा श्रेष्ठ मंत्र आणि गोपद्मांचे महत्त्व याबद्दल परम पूज्य सद्गुरु श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १४ नोव्हेंबर रोजीच्या प्रवचनात सांगितले, जे आपण या व्हिडियोत

स्वार्थ (Swaarth)

घातक झूठा अहं  मानव के मन में विचारों की शृंखला चलती रहती है। मानव के अवास्तविक विचारों के कारण उसके मन में ‘झूठा अहं’ बढता रहता है। प्रशंसा और निन्दा से भी यह झूठा अहं बढता है। यह झूठा अहं ही मानव के जीवन में पीडा और भय उत्पन्न करता है। इस झूठे अहं की घातकता के बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १८ सितंबर २०१४

अल्बर्ट श्वाइत्झर आणि त्यांचे अथक परिश्रम (Albert Schweitzer and His hard work)  - Aniruddha Bapu Marathi Discourse 09 Oct 2014

अल्बर्ट श्वाइत्झर आणि त्यांचे अथक परिश्रम अल्बर्ट श्वाइत्झर ( Albert Schweitzer ) या थोर भगवद्‍भक्त असणार्‍या अशा शास्त्रज्ञाची अफाट कामगिरी सुविख्यात आहे. आफ्रिकेतील निबिड अरण्यात अनेक प्रकारची रोगराई आणि अनेक प्रकारची संकटे यांना तोंड देत तेथील गरजू आदिवासींसाठी त्यांनी अहोरात्र निरपेक्ष प्रेमाने काम केले. त्यांच्या परिश्रमाबाबतचा एक किस्सा सद्गुरु श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या ०९ ऑक्टोबर २०१४ रोजीच्या मराठी प्रवचनात सांगितला, जो आपण या व्हिडियोत पाहू शकता. ॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥