बापू

कॉलेज के दिनों में मुझे बापू के सहवास का लाभ मिला। हमारा १९७२ का एस.एस.सी. (ग्यारहवी) का वर्ग था। उस समय मैं गर्व्हमेंट कॉलनी में रहता था। मेरी शिक्षा न्यु इंग्लिश स्कूल, बान्द्रा में पूरी हुयी और माटूंगा स्थित रामनारायण रुईया कॉलेज में मैंने एफ.व्हाय.एस.सी. में प्रवेश लिया। उस समय एफ.व्हाय.एस.सी. के तीन डिव्हिजन थे। वर्ष के अंतिम दिनों में रुईया के सामने के चौराहे पर डी.पी. कॉर्नर पर बापू से पहचान हुयी। बापू ने शिरोड़कर स्कूल में शिक्षा पूरी करके यहाँ पर प्रवेश लिया था। परन्तु मेरा और उनका डिवीजन अलग-अलग था। मुझे अब अच्छी तरह याद तो नहीं है परन्तु शायद हमारी पहचान डॉ.शिरीष दातार (जो उस समय डोंबिवली से आये थे) ने ही करवायी होगी। शिरिष अच्छे स्कॉलर थे, कक्षा में प्रथम स्थान पाने वाले। उस समय हमारा ५-६ लोगों का एक अलग ग्रुप था। इस ग्रुप के बाहर हम ज्यादा मिलते-जुलते नहीं थे। परंतु बापू की सुंदर हँसी और परिपक्वता की छाप उस समय भी स्पष्ट महसूस होती थी।

       जून १९७४ में इंटर सायन्स का परिणाम घोषित हुआ और मेडिकल में नायर अस्पताल उर्फ टोपीवाला नॅशनल मेडिकल कॉलेज में  मुझे प्रवेश मिल गया। बापू डॉ.शिरीष दातार, डॉ.रीता निचनाकी (उस समय की गेहानी) और मैं एक ही कक्षा में आ गये। प्रॅक्टिकल के लिये वे तीनों ‘ए’ बैच में हुआ करते थे। लेक्चर्स के समय हम सब एक साथ हुआ करते थे। मेडिकल का पोरशन काफी बड़ा होता है। पढ़ाई भी काफी करनी पड़ती थी। ये तीनों मेधावी? छात्रों में गिने जाते थे। उस समय भी बापू का व्यक्तित्व आज की तरह ही रौबदार था। खाली समय में कॅन्टीन में, कॉमन रुम में अथवा कॉलेज के पोर्च मेम बापू के चारों ओर छात्र-छात्राओं का घेरा ना हो, ऐसा शायद ही कभी रहा होगा। उस समय कॉलेज में मराठी सांस्कृतिक मंडल हुआ करता था। मंडल के तत्त्वधान में अनेक कार्यक्रम हुआ करते थे। उनमें बापू का सक्रिय सहभाग हुआ करता था। कथाकथन इत्यादि कार्यक्रमों में बापू मन:पूर्वक सहभागी हुआ करते थे। एक कुशल घुडसवार जिस तरह घोड़े पर चढ़ते ही उसे पूरी तरह नियंत्रित कर लेता है, उसी तरह स्टेज पर आते ही बापू की एक आत्मविश्वासपूर्ण नजर सभी के मनों पर छा जाती थी। वर्तमान में हम सभी इसका अनुभव कर रहे हैं। बापू अप्रतिम नकल उतारा करते थे। कहानियाँ सुनाते थे। एक कार्यक्रम में बापू ने मुंबई से वणी की देवी तक पैदल चलकर जाने की और रास्ते में एक बुढ्ढी के सप्तश्रृंगी के रुप में मिलने की कथा बतायी थी।

‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम का मूल नाम है - भाग २ (‘ I Am ’ Is Trivikram's Original Name - Part 2) - Aniruddha Bapu‬ Hindi‬ Discourse 01 Jan 2015

‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम का मूल नाम है – भाग २ (‘ I Am ’ Is Trivikram’s Original Name – Part 2) मानव को स्वयं के बारे में कभी भी नकारात्मक रूप में नहीं सोचना चाहिए। भगवान से कुछ मांगते समय भी सकात्मक सोच ही होनी चाहिए। ‘भगवान आप मेरे पिता हो और मैं आपका पुत्र हूं। आप ऐश्वर्यसंपन्न हो, ऐश्वर्यदाता हो इसलिए मेरे पास भी ऐश्वर्य है, आप उसे

Durga

  दुर्गे दुर्घट भारी तुजविण संसारी । अनाथनाथे अंबे करुणा विस्तारी ॥ वारी वारी जन्ममरणांतें वारी । हारी पडलो आता संकट निवारी ॥ 1 ॥ जय देवी जय देवी महिषासुरमर्दिनी । सुरवरईश्वरवरदे तारक संजीवनी ॥ धृ ॥ त्रिभुवनभुवनी पाहता तुजऐसी नाही । चारी श्रमले परंतु न बोलवे कांही ॥ साही विवाद करिता पडिले प्रवाही । ते तूं भक्तांलागी पावसि लवलाही॥ जय देवी… प्रसन्नवदने प्रसन्न होसी निजदासा । क्लेशांपासुनि सोडवी तोडी

स्तुति-प्रार्थना (Stuti-Prarthana) - Aniruddha Bapu‬ Hindi‬ Discourse 01 Jan 2015

स्तुति-प्रार्थना (Stuti-Prarthana) मानव जो सोचता है वही तत्त्व उसके पास आता है और जैसा वह सोचता है वैसा वह बनता है। मैं त्रिविक्रम की संतान हूं और इसलिए मेरे पास मेरे पिता के सारे गुण अल्प प्रमाण में ही सही मगर अवश्य ही हैं, इस विश्वास के साथ भगवान से मांगना चाहिए। भगवान सर्वसमर्थ हैं, भगवान सर्वगुणसंपन्न हैं, इस तरह भगवान पर विश्वास जाहिर करके उनसे प्रार्थना करनी चाहिए। इसे

‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम का मूल नाम है (‘I Am’ Is Trivikram's Original Name) - Aniruddha Bapu‬ Hindi‬ Discourse 01 Jan 2015

‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम का मूल नाम है (‘I Am’ Is Trivikram’s Original Name) आदिमाता चण्डिका और उनके पुत्र त्रिविक्रम (Trivikram) से कुछ मांगते समय श्रद्धावान को सकारात्मक (पॉझिटिव्ह) रूप से मांगना चाहिए। वेदों के महावाक्य यही बताते हैं कि हर एक मानव में परमेश्वर का अंश है। यदि मानव में परमेश्वर का अंश है तो उसे नकारात्मक रूप से मांगने की आवश्यकता ही नहीं है। ‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम

श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेचा अर्थ - भाग १५  (The Meaning Of The First Rucha Of Shree Suktam - Part 15) - Aniruddha Bapu‬ ‪Marathi‬ Discourse 18 June 2015

श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेचा अर्थ- भाग १५ (The Meaning Of The First Rucha Of Shree Suktam – Part 15) लहान मूल ज्याप्रमाणे आपल्या आईवडिलांकडे, आजीआजोबांकडे हट्ट करते, अन्य कुणा तिर्‍हाइकाकडे हट्ट करत नाही; त्याप्रमाणे श्रद्धावानाने आपल्या पित्याकडे म्हणजेच त्रिविक्रमाकडे हट्ट करावा, त्रिविक्रमाच्या मातेकडे म्हणजेच आपल्या आजीकडे अर्थात श्रीमातेकडे हट्ट करावा. त्रिविक्रमच उचित ते सर्वकाही देणारा आहे. या जगात जे जे काही शुभ, कल्याणकारी, मंगल आहे ते निर्माण करणारा ‘जातवेद’ त्रिविक्रम आहे.

दररोज दहा मिनिटे शान्त बसा- भाग २ (Sit Quite For 10 Minutes Every Day- Part 2) - Aniruddha Bapu‬ ‪Marathi‬ Discourse 18 June 2015

दररोज दहा मिनिटे शान्त बसा- भाग २ (Sit Quite For 10 Minutes Every Day- Part 2) रोज दिवसातून कमीत कमी दहा मिनिटे शान्तपणे बसा (Sit Quite). शान्तपणे बसण्याआधी ‘हरि ॐ, श्रीराम अंबज्ञ’ म्हणा आणि उठण्याआधी ‘जय जगदंब जय दुर्गे’ म्हणा. लक्ष्मी म्हणजे सर्व प्रकारची संपन्नता. अशा या लक्ष्मीमातेला श्रद्धावानाकडे घेऊन येणारा तिचा पुत्र त्रिविक्रम आहे. लक्ष्मीमातेचा श्रद्धावानाच्या जीवनात सर्वत्र संचार करण्याचा मार्ग प्रशस्त करणारा त्रिविक्रम आहे. या शान्तपणे बसण्यामुळे हा

दररोज दहा मिनिटे शान्त बसा (Sit Quite For 10 Minutes Every Day) - Aniruddha Bapu‬ ‪Marathi‬ Discourse 18 June 2015

दररोज दहा मिनिटे शान्त बसा (Sit Quite For 10 Minutes Every Day) दररोज दिवसातून वेळ काढून किंवा रात्री कमीत कमी दहा मिनिटांसाठी तरी शान्त बसा. शरीर स्थिर आणि मन शान्त करा. मनात जरी विचार आले तरी विरोध करू नका. दहा मिनिटे बसण्याआधी ‘हरि ॐ, श्रीराम अंबज्ञ’ म्हणा आणि दहा मिनिटे झाल्यावर ‘जय जगदंब जय दुर्गे’ म्हणा. दररोज दहा मिनिटे शान्तपणे बसण्याबाबत सद्गुरु श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १८ जून २०१५ रोजीच्या प्रवचनात जे

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‘ अंबा ’ या शब्दाचा अर्थ (The Meaning Of The Word ‘ Amba ’) दुर्गामातेच्या आरतीत ‘अनाथनाथे अंबे’ हे शब्द येतात. ‘ अंबा ’ या शब्दाचे ‘अंबे’ हे संबोधन आहे. ‘ अंबा ’ या शब्दाचा अर्थ आहे- ‘माझी प्रिय आई’. लहान मूल जसे ‘माझी आई’ या भावनेने आईला बिलगते, त्या माझेपणाच्या, प्रेमाच्या भावाने मोठ्या आईला साद घालायला हवी. अंबा या शब्दाच्या अर्थाबद्दल सद्गुरु श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १८ जून २०१५ रोजीच्या प्रवचनात

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श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेचा अर्थ – भाग १४ (The Meaning Of The First Rucha Of Shree Suktam – Part 14) सर्व प्रकारच्या प्रगतीची देवता लक्ष्मीमाता (Laxmi) आहे. ‘हे जातवेदा, लक्ष्मीमातेला माझ्याकडे घेऊन ये’, अशी प्रार्थना ब्रह्मवादिनी लोपामुद्रा श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेत करते. मानवाकडे असणारी सर्वांत मोठी क्षमता आहे- प्रार्थना (prayers) करण्याची क्षमता. प्रार्थना म्हणजे प्रेमाने, विश्वासाने भगवंताला साद घालणे, मनोगत सांगणे. श्रद्धावानाने प्रेमाने, विश्वासाने केलेली प्रार्थना भगवंताने ऐकली नाही असे कधी होऊच

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सर्वदृष्ट्या अचूक होण्यामागे लागणे हे क्षितिजाला धरण्यासाठी धावण्याप्रमाणे आहे (Perfection is like chasing the horizon) सर्वदृष्ट्या अचूक असणे म्हणजेच पर्फेक्शन (Perfection) ही गोष्ट माणसाच्या शक्यतेबाहेरची आहे. सर्वदृष्ट्या अचूक असणे हे क्षितिज आहे, कल्पना आहे. श्रद्धावान काल होता त्यापेक्षा आज अधिक विकसित व्हावा यासाठी त्रिविक्रम श्रद्धावानाच्या जीवनात, त्रिविध देहात तीन पावले दररोज चालतच असतो. कालच्या पेक्षा आज मी अधिक कसा विकसित (progress) होईन याकडे लक्ष द्या कारण सर्वदृष्ट्या अचूक होण्यामागे लागणे