त्रिविक्रम

ऐसे ये जो त्रिविक्रम हैं, वे हमारे सभी प्रकार के स्वास्थ्य को, जिनका हमने वर्णन किया उस सभी प्रकार के स्वास्थ्य को बल देने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। आदिमाता की रचना, यह सारी जो एनर्जी है विश्व में, इस माँ आदिमाता ने क्या किया कि पहले अन्न को और उसके बाद वह अन्न खानेवाले को निर्माण किया। किसी भी प्राणि का निर्माण करते समय आदिमाता ने यह सूत्र सँभाला है। पहले मानव का निर्माण किया, पहले प्राणि का निर्माण किया और उसके बाद उसका अन्न निर्माण किया? नहीं, ऐसा नहीं किया। पहले प्राणवायु का निर्माण किया, पहले जल उत्पन्न किया और फिर उसका आस्वाद लेनेवाले जीवों को उत्पन्न किया। इस तरह बीमारी उत्पन्न होने से पहले ही उसने सारी दवाइयाँ, उसके द्वारा सब कुछ तैयारियाँ करनी थीं, वे कर रखीं। आज हम दवाइयाँ निर्माण नहीं कर रहे हैं, दवाइयों की खोज कर रहे हैं, डिस्कव्हरीज कर रहे हैं।

इस हीलिंग कोड का उपयोग हम करेंगे इसका अर्थ क्या हम दवाइयाँ नहीं लेंगे? या ऑपरेशन नहीं करायेंगे कभी ज़रूरत पड़ने पर? ऐसा बिलकुल भी नहीं है। इट इज नॉट द रिप्लेसमेंट क्योंकि वह बहुत स्थूल स्तर पर की बात है। स्थूल स्तर पर की। डॉक्टर के द्वारा दी गयी दवा खानी ही पड़ेगी, व़क्त आने पर। ऑपरेशन कराना ही पड़ेगा। मग़र उसमें सफलता मिलना या न मिलना, दवा का असर होना या न होना और उचित डॉक्टर का मिलना, उसके द्वारा उचित समय पर ट्रीटमेंट दी जाना, उस ट्रीटमेंट को हमारा सह सकना, साईड इफेक्ट न होना या दुष्परिणाम न होना इन सबके लिए यह हीलिंग कोड है और सबसे अहम बात यह है कि ऐसी मुसीबत ही पेश न आये इसलिए यह हीलिंग कोड है। मग़र यह पहले भी है और वैसा व़क्त आने पर भी है, यह हमें ज्ञात होना चाहिए। यह सारी एनर्जी है, इस एनर्जी में हमारा शरीर भी, आज क्वांटम फिजिक्स हमें क्या बताता है? तो ध्यान में रखिए कि यह जो ऊर्जा है ना, यह ऊर्जा सब जगह है….. अब यही बात देखिए कि तुम्हारा कपड़ा फटा हुआ है, तो उस कपड़े पर क्या प्लास्टिक की पट्टी चिपकाना मुनासिब होगा? नहीं चलेगा। या हीरे की पट्टी लगाकर चलेगा? नहीं चलेगा। कपड़े के लिए कपड़ा ही होना चाहिए। सोने का टुकड़ा यदि बर्तन में जोड़ना हो तो सोने का ही जोड़ना चाहिए। तब ही जाकर वह एकरूप होनेवाला है।

मिट्टी का मटका घर में ले आये और उसमें सोना डाल दिया बाद में, तो क्या होगा? वह जोड़ वहीं के वहीं टूट जायेगा। यानी क्या? जिस प्रकार की प्रॉब्लेम होती है, उसी प्रकार के उपाय की आवश्यकता होती है। ठीक है? वरना ‘आग एक जगह लगी और दमकल की गाड़ी दूसरी जगह भेज दी’ ऐसा होना मुनासिब नहीं है। ठीक है? और इसीलिए इस माँ ने यह सब अलग अलग बीमारियों की भी क्या? …… तो सारी बात फ्रिक्वेन्सी है। तुम और मैं भी स्पंदन हैं। तो उन स्पंदनों में यदि खराबी हो जाती है, शरीर में खराबी हो जाती है, मन में खराबी हो जाती है, स्थिति में खराबी हो जाती है यानी हमारे स्पन्दनों में खराबी हो जाती है।

स्वयंभगवान त्रिविक्रम

आज गुरुवार दि. २६-०४-२०१८ रोजी प्रकाशित झालेल्या ‘दैनिक प्रत्यक्ष’मधील ‘तुलसीपत्र-१४८६’ ह्या अग्रलेखामध्ये, ‘स्वयंभगवान त्रिविक्रम’ प्रथमच प्रकट झाल्याचे वर्णन केले गेले आहे, तेच हे ‘महासाकेत’ ह्या सर्वोच्च स्थानावर स्थित ‘स्वयंभगवान त्रिविक्रमा’चे स्वरूप. आज गुरुवार दि. २६-०४-२०१८ को ‘दैनिक प्रत्यक्ष’ में प्रकाशित हुए ‘तुलसीपत्र-१४८६’ इस अग्रलेख में, ‘स्वयंभगवान त्रिविक्रम’ के पहली ही बार प्रकट होने का वर्णन किया गया है। यही वह ‘महासाकेत’ इस सर्वोच्च स्थान पर स्थित ‘स्वयंभगवान त्रिविक्रम’ का स्वरूप।

trivikram

आज रविवार दि. २५-०२-२०१८ को ‘दैनिक प्रत्यक्ष’ में प्रकाशित हुए ‘तुलसीपत्र-१४६०’ इस अग्रलेख में त्रि-मुख त्रिविक्रम के प्रकट होने का वर्णन किया गया है। उस त्रि-मुख त्रिविक्रम का तीन स्तरों पर का स्वरूप। [divider] भगवान त्रिविक्रमाचे स्वरूप आज रविवार दि. २५-०२-२०१८ रोजी ‘दैनिक प्रत्यक्ष’मध्ये प्रकाशित झालेल्या ‘तुलसीपत्र-१४६०’ ह्या अग्रलेखामध्ये त्रि-मुख त्रिविक्रम प्रकटल्याचे वर्णन आले आहे. त्या त्रि-मुख त्रिविक्रमाचे तीन स्तरांवरील स्वरूप.   अतिसूक्ष्म स्तरावर / अतिसूक्ष्म स्तर पर सूक्ष्म स्तरावर

मी त्रिविक्रमाचे लाडके अपत्य आहे (I am the dear child of Trivikram) - Aniruddha Bapu

I am the dear child of Trivikram परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापूंनी त्यांच्या २५ जून २०१५ च्या मराठी प्रवचनात ‘प्रत्येक श्रद्धावानाने हा विश्वास बाळगावा की तो त्रिविक्रमाचे लाडके अपत्य आहे’, याबाबत सांगितले. लोपामुद्राने श्रीसूक्तम्‌ची(Shree Suktam) रचना केली आहे. ही लोपामुद्रा मानवाची हितचिंतक आहे. श्रेष्ठ ब्रह्मवादिनी आहे. तिने त्रिविक्रम, हरिहर शब्द न वापरता जातवेद हा शब्द वापरला. त्या जातवेदालाच आवाहन करता येते कारण हा जातवेदच महालक्ष्मीला (Mahalaxmi) आपल्या घरामध्ये, मनामध्ये (mind),

Conch is the main symbol of Trivikrama) - Aniruddha Bapu‬

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापूंनी त्यांच्या २५ जून २०१५ च्या मराठी प्रवचनात ‘शंख हे जातवेदाचे (त्रिविक्रमाचे) प्रमुख चिह्न आहे’ याबाबत सांगितले. जातवेदाचे शंख हे प्रमुख चिन्ह आहे. त्रिविक्रम हा हरिहर असल्यामुळे हा शंख फुकल्यावर डमरूचा आवाज उत्पन्न होतो. म्हणजेच विकास करणार्‍या शंखामधून आवाज लयाचा (डमरूचा) येतो म्हणजेच हा शंख १०० टक्के यशाची खात्री देतो. त्रिविक्रमाच्या आणि त्याच्या मातेच्या म्हणजेच आदिमातेच्या श्रद्धावानाला १०० टक्के यश मिळणारच आहे, पण त्यासाठी तो त्रिविक्रम

‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम का मूल नाम है - भाग २ (‘ I Am ’ Is Trivikram's Original Name - Part 2) - Aniruddha Bapu‬ Hindi‬ Discourse 01 Jan 2015

‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम का मूल नाम है – भाग २ (‘ I Am ’ Is Trivikram’s Original Name – Part 2) मानव को स्वयं के बारे में कभी भी नकारात्मक रूप में नहीं सोचना चाहिए। भगवान से कुछ मांगते समय भी सकात्मक सोच ही होनी चाहिए। ‘भगवान आप मेरे पिता हो और मैं आपका पुत्र हूं। आप ऐश्वर्यसंपन्न हो, ऐश्वर्यदाता हो इसलिए मेरे पास भी ऐश्वर्य है, आप उसे

‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम का मूल नाम है (‘I Am’ Is Trivikram's Original Name) - Aniruddha Bapu‬ Hindi‬ Discourse 01 Jan 2015

‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम का मूल नाम है (‘I Am’ Is Trivikram’s Original Name) आदिमाता चण्डिका और उनके पुत्र त्रिविक्रम (Trivikram) से कुछ मांगते समय श्रद्धावान को सकारात्मक (पॉझिटिव्ह) रूप से मांगना चाहिए। वेदों के महावाक्य यही बताते हैं कि हर एक मानव में परमेश्वर का अंश है। यदि मानव में परमेश्वर का अंश है तो उसे नकारात्मक रूप से मांगने की आवश्यकता ही नहीं है। ‘मैं हूँ’ यह त्रिविक्रम

दररोज दहा मिनिटे शान्त बसा- भाग २ (Sit Quite For 10 Minutes Every Day- Part 2) - Aniruddha Bapu‬ ‪Marathi‬ Discourse 18 June 2015

दररोज दहा मिनिटे शान्त बसा- भाग २ (Sit Quite For 10 Minutes Every Day- Part 2) रोज दिवसातून कमीत कमी दहा मिनिटे शान्तपणे बसा (Sit Quite). शान्तपणे बसण्याआधी ‘हरि ॐ, श्रीराम अंबज्ञ’ म्हणा आणि उठण्याआधी ‘जय जगदंब जय दुर्गे’ म्हणा. लक्ष्मी म्हणजे सर्व प्रकारची संपन्नता. अशा या लक्ष्मीमातेला श्रद्धावानाकडे घेऊन येणारा तिचा पुत्र त्रिविक्रम आहे. लक्ष्मीमातेचा श्रद्धावानाच्या जीवनात सर्वत्र संचार करण्याचा मार्ग प्रशस्त करणारा त्रिविक्रम आहे. या शान्तपणे बसण्यामुळे हा

दररोज दहा मिनिटे शान्त बसा (Sit Quite For 10 Minutes Every Day) - Aniruddha Bapu‬ ‪Marathi‬ Discourse 18 June 2015

दररोज दहा मिनिटे शान्त बसा (Sit Quite For 10 Minutes Every Day) दररोज दिवसातून वेळ काढून किंवा रात्री कमीत कमी दहा मिनिटांसाठी तरी शान्त बसा. शरीर स्थिर आणि मन शान्त करा. मनात जरी विचार आले तरी विरोध करू नका. दहा मिनिटे बसण्याआधी ‘हरि ॐ, श्रीराम अंबज्ञ’ म्हणा आणि दहा मिनिटे झाल्यावर ‘जय जगदंब जय दुर्गे’ म्हणा. दररोज दहा मिनिटे शान्तपणे बसण्याबाबत सद्गुरु श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १८ जून २०१५ रोजीच्या प्रवचनात जे

क्षितिज, Aniruddha Bapu, Dr. Aniruddha Joshi, Aniruddha Joshi, Aniruddha, Bapu, Sadguru Aniruddha, Aniruddha Bapu Pravachan, faith, teachings, prayer, Lord, devotion, भक्ती, त्रिविक्रम, God, preaching, Bandra, Mumbai, Maharashtra, India, New English school, IES, Indian Education Society, Vedic, Hinduism, Hindu, mythology, Indian mythology, Stuti, prarthana, praise, Praise the Lord, perfection, chasing, horizon,

सर्वदृष्ट्या अचूक होण्यामागे लागणे हे क्षितिजाला धरण्यासाठी धावण्याप्रमाणे आहे (Perfection is like chasing the horizon) सर्वदृष्ट्या अचूक असणे म्हणजेच पर्फेक्शन (Perfection) ही गोष्ट माणसाच्या शक्यतेबाहेरची आहे. सर्वदृष्ट्या अचूक असणे हे क्षितिज आहे, कल्पना आहे. श्रद्धावान काल होता त्यापेक्षा आज अधिक विकसित व्हावा यासाठी त्रिविक्रम श्रद्धावानाच्या जीवनात, त्रिविध देहात तीन पावले दररोज चालतच असतो. कालच्या पेक्षा आज मी अधिक कसा विकसित (progress) होईन याकडे लक्ष द्या कारण सर्वदृष्ट्या अचूक होण्यामागे लागणे

त्रिविक्रम, ज्ञान, Trivikram, Knowledge, Aniruddha Bapu, Dr. Aniruddha Joshi, Aniruddha Joshi, Aniruddha, Bapu, Sadguru Aniruddha, Aniruddha Bapu Pravachan, faith, teachings, prayer, Lord, devotion, भक्ती, त्रिविक्रम, God, preaching, Bandra, Mumbai, Maharashtra, India, New English school, IES, Indian Education Society, Vedic, Hinduism, Hindu, mythology, Indian mythology

त्रिविक्रम ज्ञान देतो (Trivikram Imparts Knowledge) ज्ञान हे नेहमी बुद्धी, मन आणि कृती या तीन पातळ्यांवर प्रवाहित होणे आवश्यक असते. एखादी गोष्ट बुद्धीला पटली, तरी मनाला पटणे आणि कृतीत उतरणे हेसुद्धा महत्त्वाचे आहे. या तीनही पातळ्यांवर एकत्रितपणे ज्ञान प्रवाहित करणारा त्रिविक्रम (Trivikram) आहे. ज्ञानाच्या तीन पातळ्यांवर त्रिविक्रम (Trivikram) ज्ञान कसे देतो याबद्दल सद्गुरु श्रीअनिरुद्धांनी त्यांच्या १८ जून २०१५ रोजीच्या प्रवचनात जे सांगितले, ते आपण या व्हिडियोत पाहू शकता. ॥ हरि

प्रतिदिन कम से कम दस मिनट तक शान्ति से बैठिए (Sit Quite At Least For 10 Minutes A Day) - Aniruddha Bapu‬ Hindi‬ Discourse 25 Dec 2014

प्रतिदिन कम से कम दस मिनट तक शान्ति से बैठिए (Sit Quite At Least For 10 Minutes A Day) भगवान का मूल रूप निर्गुण निराकार है। सुसन्तुलितता, शान्ति, अचलता यह वह रूप है। सन्तुलितता निर्माण करना मानव के लिए संभव नहीं होता, लेकिन शान्ति से, अचल स्थिति में तो यकीनन ही बैठ सकते हैं। कम से कम दस मिनट हर रोज शान्ति से बैठे रहने से आदिमाता चण्डिका और चण्डिकापुत्र

श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेचा अर्थ - भाग १३ (The Meaning Of The First Rucha Of Shree Suktam - Part 13) - Aniruddha Bapu‬ ‪Marathi‬ Discourse 16 April 2015

श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेचा अर्थ – भाग १३ (The Meaning Of The First Rucha Of Shree Suktam-Part 13) भारतवासीयांच्या जीवनात सुवर्ण (gold) आणि रौप्य (silver) यांचे स्थान प्राचीन काळापासून अबाधित आहे आणि ऋषिसंस्थेने भारतीय समाजजीवन सुन्दर रित्या घडवले आहे. (Ramayan) रामायणकाळातील ऋषि हे राजसत्तेसमोर लाचार झालेले नाहीत, हे आम्ही पाहतो. या ऋषिसंस्थेने भारतीय समाजास प्रपंच-परमार्थ दोन्ही सुन्दर रित्या करण्यासंबंधी मार्गदर्शन केले. जातवेद हा मूळ ऋषि आहे आणि पुरोहितही. श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेत

श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेचा अर्थ- भाग १२ (The Meaning Of The First Rucha Of Shree suktam - Part 12) - Aniruddha Bapu‬ ‪Marathi‬ Discourse 16 April 2015

श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेचा अर्थ- भाग १२ (The Meaning Of The First Rucha Of Shree suktam-Part 12) विविध प्रकारचे सुवर्ण (सोने)(gold) आणि रजत (चांदी)(silver) ‘माझ्या जातवेदा! माझ्या श्रीमातेला माझ्यासाठी माझ्या जीवनात, माझ्या क्षेत्रात घेऊन ये’, असे आवाहन जातवेदास म्हणजेच त्रिविक्रमास करण्याबाबत माता लोपामुद्रा श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेद्वारे आम्हाला सांगत आहे. माझ्यासाठी, माझ्या आयुष्यातील प्रश्न सोडवण्यासाठी, संकटाचे रूपान्तर संधीत करण्यासाठी, हित करण्यासाठी जे मूलभूत सामर्थ्य लागते, ते सामर्थ्य सुवर्ण-रजत या मूलभूत तत्त्वांमध्ये आहे.

श्रीश्वासम् आणि श्वास (The Shreeshwasam And The Breathing) - Aniruddha Bapu‬ ‪Marathi‬ Discourse 21 May 2015

श्रीश्वासम् आणि श्वास (The Shreeshwasam And The Breathing) स्थूल दृष्ट्या जरी काही नात्यांमुळे माणसांचे जीवन एकमेकांशी जुळलेले दिसत असले, तरी प्रत्येक जीवात्मा हा स्वतन्त्र आहे आणि प्रत्येकाला स्वत:चा प्रवास, विकास स्वत:च करायचा आहे. श्रीश्वासम् उत्सवामध्ये आपण आपल्या श्वासाचे चारही भाग मूषक (mouse) चित्रित करून मूलाधारचक्राचा अधिष्ठाता असणार्‍या मूलार्कगणेशाच्या चरणी अर्पण केले. या उत्सवात सामील होऊ न शकलेले किंवा यानंतरच्या काळात श्रीश्वास घेऊ इच्छिणारे यांच्यासाठी त्यांच्या त्रिविक्रम आणि आदिमातेवरील विश्वासाद्वारे हे

श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेचा अर्थ - भाग ७ (The Meaning Of The First Rucha Of Shree Suktam - Part 7) - Aniruddha Bapu‬ ‪Marathi‬ Discourse 16 April 2015

श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेचा अर्थ – भाग ७ (The Meaning Of The First Rucha Of Shree Suktam-Part 7) एक विश्वास असावा पुरता। कर्ता हर्ता गुरु ऐसा॥ ही ओवी आम्ही श्रीसाईसच्चरितात वाचतो. जातवेदावर पूर्ण विश्वास असणे हेच श्रद्धावान बनणे आहे. शून्यानां शून्यसाक्षिणी असणार्‍या आदिमातेस म्हणजेच ‘श्री’स घेऊन हे जातवेदा, माझ्या जीवनात ये, हे अत्यंत विश्वासाने जातवेदास सांगितले आहे. आदिमातेचा वर्ण सुवर्णवर्ण आहे असे श्रीसूक्ताच्या पहिल्या ऋचेत म्हटले आहे. सुवर्णाचे महत्त्व काय आहे