गायत्री माता

ॐ   रामवरदायिनी श्रीमहिषासुरमर्दिन्यै नम:। इस महिषासुरमर्दिनी ने ही, इस चण्डिका ने ही, इस दुर्गा ने ही सब कुछ उत्पन्न किया। प्रथम उत्पन्न होनेवाली या सर्वप्रथम अभिव्यक्त होनेवाली वह एक ही है। फिर वह उन तीन पुत्रों को जन्म देती है और फिर सबकुछ शुरू होता है । हमने बहुत बार देखा, हमें यह भी समझ में आया की यह एकमात्र ऐसी है, जिसका प्राथमिक नाम, पहला नाम ही उसका नाम ही नहीं है । जिस प्रचंड बडे शत्रु का उसने नाश किया, उस महिषासुर से ही उसने अपना नाम धारण कर लिया- ‘महिषासुरमर्दिनी’ । तरल अवस्था में जो गायत्री माता है, सूक्ष्म स्वरूप में वही महिषासुरमर्दिनी है और वही स्थूल सृष्टी में, इस पृथ्वी पर अनसूया के नाम से विचरित हुई और विचरण करती रहती है । ये तीनों एक ही हैं, तीनों का रूप भी विलक्षण एवं अलग-अलग है । हमें बहुत बार यह प्रश्न सताता है कि प्रसन्नोत्सोव में विराजमान महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती के स्वरूप हमने देखे हैं । ये तीनों रूप कितने अलग-अलग हैं ! उनके चरित्र भी अलग-अलग हैं ।

फिर भीं यह तीनों एक ही है यह कैसे मान लें? मान भी लें तब भी बात दिल में नहीं उतरती । जो माँ बच्चों को प्यार से खाना खिलाती है, उनकों स्नान कराती है, वह रूप है अनसूया का रूप । उसी बच्चे की हत्या करने कोई दौड़ा चला आये, तो उस वक्त हाथ में जो मिल जाये वही सही, जैसे कि बेलन, सिलबट्टा, जो कुछ भी हाथ में आ जाये, वह उठाकर वह माँ उस इन्सान का मुकाबला करेगी, वह है उसका महाकाली रूप । यह सब हमारी समझ में तो आता है, लेकिन गले नहीं उतरता । ये रूप अलग हैं, यह तो दिखायी देता है और हम जैसे सब, जो भी दिखता है उसे सच मान लेते हैं । हम लोग हमेशा कहते हैं की कानों से ज्यादा आँखों पर विश्वास होना चाहिए । कान और आँखों में अंतर होता है । इसीलिए आँखों से जो दिखाई पड़ता है उसे हम सच कहते हैं । लेकिन पिछले प्रवचनों में एक बार हमने देखा की सायन्स के युग में आँखों से देखी हर एक चीज सच ही होती है ऐसा नहीं है । हमने देखा कि जो व्यक्ति नहीं है या जो व्यक्ति मर गया है, गुज़र गया है, वह व्यक्ति भी हमारे सामने नाच कर सकता है, गा सकता है और आपकी समझ में भी नहीं आयेगा कि वह व्यक्ति जिंदा नहीं है या यह व्यक्ति यहाँ पर है ही नहीं । यानी आँखों से देखने पर भी हम कितना भरोसा कर सकते हैं, ऐसी हमारी परिस्थिति है ।

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  हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ. पहिल्यांदा आपल्याला आता श्रीसूक्त ऐकायचं आहे. श्रीसूक्त…वेदांमधील एक अशी अनोखी देणगी आहे की जी ह्या…आपण उपनिषदामध्ये आणि मातृवात्सल्यविंदानम् मध्ये बघितलंय की लोपामुद्रेमुळे आपल्याला मिळाली…महालक्ष्मी आणि तिची कन्या लक्ष्मी…ह्या मायलेकींचं एकत्र असणारं पूजन, अर्चन, स्तोत्र, स्तवन…सगळं काही…म्हणजे हे ‘श्रीसूक्तम्’. तर आज पहिल्यांदा…फक्त आजपासून सुरु करायचं आहे आपल्याला ‘श्रीसूक्तम्’. आपले महाधर्मवर्मन म्हणणार आहेत.   हरि ॐ. अर्थ आज आपल्याला कळला नसेल…काही हरकत नाही. पण ह्या आईचं…माझ्या आदिमातेचं

बा पु ने पिछले गुरुवार को यानी २३-०१-२०१४ को ‘सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ।।’ इस ‘दुर्गा मंत्र’ के अल्गोरिदम पर प्रवचन किया । इस प्रवचन का हिन्दी अनुवाद ब्लॉग पर विस्तृत रूप में अपलोड किया गया है । इस प्रवचन के दो महत्त्वपूर्ण मुद्दें थे- १) यह अल्गोरिदम निश्चित रूप से क्या है और २) इस अल्गोरिदम के विरोध में महिषासुर किस तरह कार्य करता है

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ॐ   रामवरदायिनी श्रीमहिषासुरमर्दिन्यै नम:। इस महिषासुरमर्दिनी ने ही, इस चण्डिका ने ही, इस दुर्गा ने ही सब कुछ उत्पन्न किया। प्रथम उत्पन्न होनेवाली या सर्वप्रथम अभिव्यक्त होनेवाली वह एक ही है। फिर वह उन तीन पुत्रों को जन्म देती है और फिर सबकुछ शुरू होता है । हमने बहुत बार देखा, हमें यह भी समझ में आया की यह एकमात्र ऐसी है, जिसका प्राथमिक नाम, पहला नाम ही उसका

श्रीमहिषासुरमर्दिनी स्थापना सोहळा - श्रीअनिरुद्ध गुरुक्षेत्रम्(Mahishurshamardini at Shree Aniruddha Gurukshetram)

 Mahishurshamardini at Shree Aniruddha Gurukshetram  श्रीअनिरुद्ध गुरुक्षेत्रम् येथे संपन्न झालेल्या श्रीमहिषासुरमर्दिनी स्थापना उत्सवाला येत्या ९ ऑगस्ट २०१३ रोजी बरोबर ४ वर्ष पूर्ण होत आहेत. त्यानिमित्ताने ऑगस्ट २००९ साली झालेल्या ह्या अभूतपूर्व सोहळ्याच्या आठवणी जागृत होताना मला खूप आनंद होत आहे. त्या आठवणी सर्व श्रद्धावानांबरोबर शेअर करण्यासाठी ही पोस्ट टाकत आहे. ९ ऑगस्ट ते १७ ऑगस्ट २००९ ह्या काळात हा उत्सव श्रीअनिरुद्धगुरुक्षेत्रम् येथे संपन्न झाला. साक्षात दत्तात्रेयांनी परशुरामाला सांगितलेल्या ‘त्रिपुरारहस्य’ ग्रंथातल्या