Sadguru Shree Aniruddha’s Pitruvachan (Part 1) – 28th March 2019

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌.

हम यह जो मंत्रगजर करते हैं – ‘रामा रामा आत्मारामा….’, वह कहाँ जाकर पहुँचता हैं? क्या हवा में घूमता रहता है इधर कहाँ? या पूरे ब्रह्मांड में या हवा में जाकर पहुँचता है? कहाँ जाता होगा? There is a definite place, where it goes….where it reaches….where it is absorbed….where it is pulled. Only one place. कौनसी जगह हैं वह?

त्रिविक्रमनिलयम श्रीगुरुक्षेत्रम्‌॥

हम लोग भूल न जायें इस गुरुक्षेत्रम्‌ मंत्र को, right? गुरुक्षेत्रम्‌ मन्त्र का हर Sentence जो है ना, एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। ‘त्रिविक्रमनिलयम श्रीगुरुक्षेत्रम्‌’ और ‘सर्वसमर्थम्‌ सर्वार्थसमर्थम्‌ श्रीगुरुक्षेत्रम्‌’। यह जो मंत्रगजर है, वह कहीं से भी करो, तुम्हारा मुँह चाहे कौनसी भी दिशा में हों, कौनसी भी दिशा में तुम खड़े हो, चलते हो, बैठे हुए हो, मंत्रगजर एक ही दिशा में जाता है, गुरुक्षेत्रम्‌ की तरफ….बस्स।

गुरुक्षेत्रम्‌ एक ऐसी जगह है जहाँ यह सारा मंत्रगजर आकर क्या हो जाता है? क्या हो जाता है उसका?

[समर्पित हो जाता है] [समा जाता है] o.k. not bad, o.k.

और क्या होता होगा? वहाँ यह (मन्त्रगजर) आता है और पूरे चण्डिकाकुल के, दत्तगुरु, माँ जगदंबा से लेकर, चण्डिकाकुल के हर एक सदस्य के चरणों को छूकर यह मन्त्रगजर फिर तुम्हारे पास ही आता है….तुम्हारे पास ही!

सिर्फ तुम्हारे पास नहीं, तुम्हारे परिवार के पास भी;

सिर्फ परिवार के पास नहीं, तुम्हारे घर के कुत्ते-बिल्ली के पास भी;

सिर्फ तुम्हारे पास नहीं, तुम्हें काँटने वाले मच्छरों के पास भी;

सिर्फ तुम्हारे पास नहीं, जो तुम्हारे शत्रु है उनके पास भी।

तुमसे जुड़ी हुई हर एक चीज़ जो है, उसके पास यह मंत्रगजर जा पहुँचता है फिर से; और वहाँ जाकर क्या करता है? जो काम उसे करना है, वह करता है और फिर….यह Finish होने वाली बात है ही नहीं, right? फिर से मुड़कर कहाँ आता है? गुरुक्षेत्रम्‌ में आता है। Recharge होता है और फिर से कहाँ जाता है? तुम्हारे ही पास, ध्यान में रखना। यह एक धन ऐसा है, यह चलन, यह करन्सी ऐसी है, जो तुमसे निकलने के बाद तुमसे बिछड़ गयी ऐसा कभी नहीं होगा। You will never be bankrupt….never! So, यह मंत्रगजर जो है, हम जितना करते रहते हैं, प्रेम से करते रहते हैं, वह जाता है गुरुक्षेत्रम्‌ में ही। समझो किसी ने क्रोध के साथ किया, गुस्से के साथ किया तो? तो भी असर होगा, लेकिन थोड़ा कम होगा….definitely! Right?

(जैसा कि) हम सभी ने महसूस किया है – समझो हम स्नान करने गये। वैसे आजकल कोई बाल्टी (बकेट) का इस्तेमाल ज़्यादा करते नहीं। लेकिन मानो कि बाल्टी भरी हुई है ऐसा समझकर हमने बाल्टी उठायी; क्या होता है? झटका लगता है, जर्क लगता है, right? वैसे ही।

हमारे पंचशील के प्रॅक्टीकल्स में है एक प्रॅक्टिकल – ‘खुद के घर में ही आँख पर पट्टी बांधकर चलो’। कितनी बार गिरोगे? नहीं चल सकते। इसका मतलब यह है कि हमें हमेशा कैसा होना चाहिये? किसी भी जगह, ‘जैसा होना है, वैसा ही’ होना चाहिये। जिस दरवाज़े से आपको अंदर जाना है, अगर उसकी हाईट आपसे कम है, तो आपको झुकना ही पड़ेगा। आप कहेंगे, ‘मैं झुकूँगा नहीं’, (तो अपना) सिर फोड़ लोगे। दरवाज़े का कोई नुकसान नहीं, तुम्हारा ही नुकसान है।

(उसी तरह) यह मंत्रगजर ये प्यार से करने की चीज़ है; वह क्रोध से करोगे, तो प्रॉब्लेम होता है। भय से करोगे, तो? ड़र के कारन करोगे, तो? हाँ, अगर आप किसी दूसरी चीज़ से ड़रे हुए हो, तो भय का नाश होगा। सिर्फ भय का ही नहीं, बल्कि भय का जो कारण है उसका भी नाश होगा। लेकिन ‘नहीं करूँगा तो क्या होगा’ यह ड़र होगा मन में, तो इसका यह असर नहीं होने वाला। ‘नहीं करूँगा तो मेरा बुरा होगा’ ऐसा जो सोचेगा, उसका भी काम नहीं होने वाला, १०८%। आप बोलेंगे, ‘बापू किसने नियम बनाया’? मैंने बनाया, क्या करोगे, क्या बोलते हो बोलो। o.k.? (अध्यात्म) प्यार से करो, डर से नहीं। अध्यात्म ये प्यार से करने की चीज़ है। ड़र को दूर भगाने के लिए करने की चीज़ है। अध्यात्म, Spirituality is not to scare people, it is to release the fear phenomenon from proples’ minds. भक्तों के, श्रद्धावानों के मन से भय को निकालने के लिये मंत्रगजर है, भक्तिभावचैतन्य है। किसी चीज़ से आप ड़रे हुए हो, तो ज़रूर मंत्रगजर करना, उस भय के साथ करना। ‘यह नहीं करूँगा तो बुरा होगा’ इस भय के साथ करोगे, तो असर नहीं होने वाला। इसका मतलब क्या है? आपका विश्वास झूठा हैं, आप का विश्वास हैं ही नहीं, आपकी श्रद्धा Zero है।

‘मेरा भगवान ऐसा है – मंत्रगजर करूँगा, तो खुश हो जाता है। (लेकिन) ‘न करूँगा तो मुझपर गुस्सा नहीं होता, मुझसे मुँह फेर नहीं लेता, मुझे छोड़ नहीं देता’ यह विश्वास होना चाहिये। इसका मतलब यह नहीं कि ‘मैं कुछ भी करूँगा, मै मंत्रगजर नहीं करूँगा, बापू ने बोल दिया खुल्लमखुल्ला’। ऐसी वाली बात नहीं है। लेकिन ‘यह मंत्रगजर नहीं करूँगा, तो वह गुस्सा करेगा, मेरे जीवन में संकट आयेगा, दुख आयेगा’ (ऐसा सोचना) यह बात गलत है। इस भय के साथ गजर नहीं करना कि ‘नहीं करूँगा तो क्या होगा?’

बहुत लोग सोचते हैं कि आज १६ मालाएँ करूँगा; और १६ मालाँ नहीं होती, तो फिर वे ड़र जाते हैं – ‘अभी क्या होगा? मैंने बोला था।’ अरे भाई, कुछ नहीं होगा यार, कुछ नहीं होगा। तुम नहीं, तो तुम्हारा बाप करेगा….o.k.? ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा? इतना ही। हम बहुत बार बोलते हैं ना, ‘तू नहीं, तो तुम्हारा बाप करेगा’ कितनी बार बोलते हैं! तो यहाँ भी बोल दो ना, ‘हम नहीं तो हमारा बाप कर देगा यार’। हाँ, अभी अगर ऐसा बोलोगे – ‘बाप को ही करने दो’, तो बाप लात मारेगा एक। बाप बहुत खडूस है, एकदम खडूस….जानता है, काम कैसे निकलवाना है, राईट?

सो यह मंत्रगजर एक ऐसी करन्सी है, जो कैसे मिलती है? हमसे निकलती है, दूसरे के पास जाती है, दूसरी किसी चीज़ के पास जाती है, (निर्धारित) काम करती है। समजो, अभी मैं यहाँ खड़ा हूँ कोई समझो मिस्टर ABC और मंत्रगजर कर रहा हूँ; और समझो यह मेरा शत्रू है ‘समीर दत्तोपाध्ये’, उसपर जाकर काम कर रही है। तब मेरे पास क्या होगा? आपकी करन्सी उस बँक में…. श्रीगुरुक्षेत्रम्‌ में आ गयी। समझो १०० ग्रॅम है। अब इस समीर दत्तोपाध्ये को तकलीफ देने के लिए १०० ग्रॅम की आवश्यकता है, तो उसके पास १०० ग्रॅम जायेगी और फिर भी आपके अकांऊट में १०० ग्रॅम रहेगी ही। इतना ही नहीं, और कुछ भी होना है। उसके पास भी जायेगी, गुरुक्षेत्रम्‌ में भी रहेगी और तुम्हारे पास भी रहेगी। त्रिविक्रम always takes three steps at a time. त्रिविक्रम हमेशा तीन कदम चलता है, एक कदम कभी नहीं चलता…. राईट? ये वो तीन कदम हैं, समझ गये?

सो, आपकी १०० ग्रॅम मंत्रगजर की करन्सी जो है, चलन जो है, गुरुक्षेत्रम्‌ में जमा हो गया, तो १०० ग्रॅम आपके पास भी रहेगा, गुरुक्षेत्रम्‌ में रहेगा, जहाँ काम करना है वहाँ भी जाकर करेगा। आप के लिये, आप के परिवार के लिये, आप के शत्रु के लिये, सब के लिये। क्योंकि वो कभी भी एक स्टेप लेना नहीं जानता। इतना भरोसा तो हमें करना ही चाहिये, राईट? सो, आज से जानना है मंत्रगजर हम लोग १६ माला करेंगे, ८ माला करेंगे, या दो माला करेंगे। अरे, छोटे-छोटे बच्चे तीन-तीन माला करते है, आराम से करते है। तो हम क्यो नहीं कर सकते? और मैं देख रहा हूँ, कर रहे हो आप लोग। बड़े प्यार से कर रहे हो। सुनने को मुझे बहोत मज़ा आता है, I enjoy it. मैं कुछ नहीं करता, मैं खुद कुछ नहीं करता, मैं नास्तिक हूँ, राईट?

पूरा का पूरा नास्तिक। [नहीं]

अरे हाँ बोलो… [नहीं]

अरे हाँ बोलो…[नहीं]

एक चाटा लगा दूँगा…[चलेगा]

चलेगा? [हाँ चलेगा] Love you all.

मुझे नास्तिक-आस्तिक समझ में नहीं आता, नहीं जानता| मैं, मेरी माँ और वो ऊपर दत्तगुरु, बस्स that’s all, nothing more than that. So, मंत्रगजर तो इस प्यार के साथ करते रहेंगे, जानेंगे – तीन जगह रहेगा, मेरे पास, गुरुक्षेत्रम्‌ में और जहाँ जाकर काम करना हैं वहाँ।

कोई पूछ सकता है, “बापू, मेरे चार शत्रु चार तरफ हैं। त्रिविक्रम के तो तीन ही कदम हैं, तो क्या होगा?’ उसकी फिकर आप मत करो। यह जो स्वयंभगवान है, यह ‘स्वयं’ भगवान है, यानी इसकी निर्मिति नहीं हुई हैं, वह अपनेआप से हैं। जब दत्तगुरु ने संकल्प किया, ‘निर्गुणनिराकार’ ने संकल्प किया – एकोस्मिऽबहुस्याम्। तब माँ जगदंबा नारायणी और वो सहजशिव महादुर्गेश्वर ये couple उत्पन्न हुआ। उनके उत्पन्न होते ही, उनके बीच में जो प्यार था, उनके मन में जो दत्तगुरु के प्रति प्रेम था, दत्तगुरु का जो इन दोनों के प्रति प्रेम था, वह प्रेम ही त्रिविक्रम हैं। वहाँ भी तीन विक्रम ही हैं ना, तीन प्रेम हैं। शिव का नारायणी पर, नारायणी का नारायण पर यानी शिव पर, इन दोनों का दत्तगुरु पर, right? किसी भी corner से देखो, चीज़ें तो तीन ही हैं। तो आपके चार शत्रु हैं या चार हज़ार शत्रु हैं, वो calculation करते बैठने की आपको ज़रूरत नहीं हैं, o.k.?

      इसके लिए एक बहुत ही सुंदर कथा बतायी गई हैं पुराणो में। ‘अजामील’ नाम का एक आदमी था। पूरी जिंदगी उसकी भगवान को कोसने में ही गई, भगवान को गालियाँ देने में ही गई। सिर्फ पैसा कमाना, खाना-पिना, मज़ाक करना, भगवान को गाली देना, भगवान के भक्तों की निंदा करना। लेकिन, एक दिन वह आँगन में बैठा हुआ था, उसकी पत्नी अंदर प्रसूत हो रही थी। सामने से एक तपस्वी ऋषि जा रहा था। उसे बहुत प्यास लगी थी। तो इस अजामील ने देखा कि यह बुढ्ढा जा रहा है। पहले तो उसके मन में आया, ‘यह तो ऋषि दिखता है, तो उसका थोड़ासा मज़ाक उड़ायेंगे।’ लेकिन उसने नज़दीक जाकर देखा, ‘बहुत थका हुआ है, बहुत प्यास लगी है उसको’; तो अंदर जाकर एक मटका पानी से भरकर उसको बुलाया और अपने आँगन में बिठाया, पानी पीने को दिया। तो उसने पूछा, ‘भाई, अकेले क्यों बैठे हो ऐसे?’ ‘मेरी पत्नी प्रसूत हो रही है। मेरी माँ और बहन उसके साथ हैं। मैं अकेला बैठा हूँ।’ तो इसने (तपस्वी ने) कहा, ‘तुझे पुत्र होगा।’

इसने पूछा – ‘उसका नाम क्या रखूँ महाशय?’

‘उसका नाम ‘नारायण’ रख, काम में आयेगा।’

क्या कहा? ‘उसका नाम ‘नारायण’ रख, काम में आयेगा।’ और ये नामकरण होना बाकी था, सिर्फ इसके मन में (वह नाम) था और उसकी घड़ी नज़दीक आ गयी। अब ये बोलना चाहता था wife को कि ‘इसका नाम नारायण रख।’ इसीलिए सिर्फ पत्नी को देखकर बोला, ‘नारायण, नारायण, नारायण’ तीन बार। कितनी बार बोला? तीन बार। ‘नारायण, नारायण, नारायण’ और मर गया।

अब यमदूत आ गये। वो लोक उसको लेकर जायेंगे। तो यह ड़र गया, यमदूत आ रहा है, नज़दीक आ रहा है। इतने में देखा, एक दिव्यपुरुष….तेजस्वी दूत आ रहा है। उसने यमदूतों को भगा दिया और बोला ‘चल मेरे साथ’। अजामील को लगा, ‘ये कैसे हुआ?’ मैंने तो कुछ भी नहीं किया है।’ तब उस पुरुष ने बताया कि, ‘मैं देवदूत हूँ, मैं उस महाविष्णू का दूत हूँ, परमात्मा का दूत हूँ। मैं तुझे लेने आया हूँ। यमराज से बचाने आया हूँ। तुम्हारे मन में actually क्या था? उस तपस्वी को देखकर, इसका मज़ाक करूँ, मज़ाक उड़ाऊँ। (लेकिन) उसे थका हुआ जानकर आपने बिठा दिया घर में, घर के आँगन में। पानी पिलाया। उसे आदर से सम्बोधित किया ‘महोदय, महाशय’ और उसने जो बोला था, उस आज्ञा का पालन करने की कोशिश कर रहे थे कि ‘आपके बच्चे का नाम ‘नारायण’ रखना’। इसके लिए जो आपने ‘नारायण-नारायण’ नाम तीन बार लिया, वो भगवान तक पहुँच गया। आप बड़े प्यार से बोल रहे थे- ‘नारायण, नारायण, नारायण’।’

देखिये यह नाम की महिमा होती है। और सारे नामों के उपर ‘राम’ नाम रहता है – ‘सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।’ रामरक्षा में कहते हैं बुधकौशिक ऋषी। शिव स्वयं बोलते हैं पार्वतीजी को, ‘राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।’ और वो जो ‘राम’ नाम हैं, वह हम अपने साथ….‘रामा रामा आत्मारामा’….राम नाम, आत्माराम को लेकर त्रिविक्रम के सहित, ‘सर्वसमर्थं सर्वार्थसमर्थं’ श्रीगुरुक्षेत्रम्‌ के chief जो हैं सद्‌गुरु समर्थ, उनके सहित हमारे मुँह से जब निकलेगा, हमारे दिल से निकलेगा, हमारे हृदय में अंकित होगा, प्यार से लिखा जाएगा, तो क्या है! right?

अब आज एक बहुत ही अनोखी बात आपको बोलनेवाला हूँ। जानना हैं? [yes sir] करोगे? [yes sir] कितना टक्का? [१०८%] Very good.

हमें सीखनी हैं एक बहुत ही अनोखी चीज़ – ‘नामस्पर्श’! क्या सीखना है? [नामस्पर्श]

एक अग्रलेख में मैंने reference दिया था ‘नामस्पर्श’ का। नाम को स्पर्श करना है, इस मंत्रगजर को स्पर्श करना है। नाम को महसूस करना है, नाम को feel करना है। Yes, we can feel the name. Feel the name of God. कैसे महसूस करोगे? अक्षर को महसूस करना है। ये ब्रेललिपी जैसी बात नहीं है, यह बहुत ही अलग बात है। यह पूरा विश्व किस चीज़ से भरा है? महाप्राण से, right? अजीव हो या सजीव हो, महाप्राण का होना आवश्यक है। अगर अस्तित्व है, तो महाप्राण है ही है और महाप्राण क्या है? हनुमानजी हैं। हनुमानजी को क्या कहते हैं? पवनसुत हनुमान की जय। वायुपुत्रौ महाबलौ। तो नामस्पर्श ऐसे किया जाता है – आँखें खुली रखिये या बंद रखिये।

(बापु ने स्वयं कृति से हाथ से हवा में लिखते हुए ‘नामस्पर्श’ करके दिखाया)

‘राम’……आप सब लोग पहले रामनाम लिखकर देखिये, जहाँ भी बैठे हो, जहाँ भी खड़े हो। आँखें बंद करके रामनाम लिखना और महसूस करना लिखते-लिखते कि यह रामनाम कैसे तुम्हें छू रहा है, o.k.? Start-1-2-3. हरि: ॐ….

राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम।

आँखें बंद करने की कोशिश किजिए, और मज़ा आयेगा। Start feeling the touch of the name. रामनाम का स्पर्श आपको छूने लगेगा।

(उपस्थित श्रद्धावान करके देखते हैं)

हरि: ॐ। 

कैसा लगा? कुछ लगा, अलग लगा? [हाँ] नक्की? [नक्की] करते रहना, जहाँ मिले…. लेकिन रास्ते में नहीं, लोग सोचेंगे – पागल है। अपने घर में बैठो। मुझे कोई पागल कहे, मुझे कोई फ़िक़्र नहीं, मैं करूँगा। अपने घर में करो, अपने ऑफिस में हो, कहाँ भी करो। करके देखना, सिर्फ रामनाम का स्पर्श हैं। पूरे हाथ से लिखो, ऐसा समझो कि पूरे हाथ में ink लगायी हुई है। पूरे हाथ से – यह ‘र’ हो गया, यह ‘रा’ हो गया, यह ‘म’ हो गया – ‘राम’। o.k.? [yes]

अभी और दूसरी method है, कैसी? अपने खुद के right hand से अपने left hand पर लिखना। अंगुष्ठिका से – जिससे गंध लगाते हैं उस उँगली से। o.k.? लिखकर देखिये। आँखें बंद कर ही लिखना।

(बापु ने स्वयं यह ‘नामस्पर्श’ करके दिखाया। उपस्थित श्रद्धावान करके देखते हैं।)

हरि: ॐ। कैसा लगा?

अब तीसरा नामस्पर्श देखेंगे।

यहाँ लिखने की बात नहीं हैं। पाँचों उँगलियाँ separate करके अपने हृदय के उपर रखो और ऐसा सोचो कि जो रामनाम आप लोग बोल रहे हैं, उसके vibrations are going to your heart. रामनाम के स्पंदन जो हैं, आपके मुँह से निकलकर अंदर तक, आपके हृदय तक जा रहे हैं। आँखें बंद करके मन ही मन ‘राम-राम’ बोलते रहना। ज़ोर से बोलोगे, तो भी चलेगा, whatever you want.

(उपस्थित श्रद्धावान करके देखते हैं)

राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम, राम  हरि: ॐ। हरि: ॐ।

ये हैं नामस्पर्श, o.k.? आप करके देखना। मंत्रगजर करते समय सिर्फ ‘राम ’के बदले ‘रामा’ लिख देना, बस्स्। मंत्रगजर करते समय ‘रामा-रामा’ लिखते रहना। बहुत बदलाव आयेंगे ज़िन्दगी में, मन में, खुद में, परिस्थिति में, सब जगह।

So, आज हम लोगों ने सीख लिया हैं, ‘नामस्पर्श’ क्या होता है? और ‘नामस्पर्श’ हम लोग महसूस करते रहेंगे। नामस्पर्श ‘करना’ नहीं हैं, नामस्पर्श ‘महसूस करना’ है। जैसे भक्तिभावचैतन्य ‘करना’ नहीं हैं, भक्तिभावचैतन्य में ‘रहना’ हैं और नामस्पर्श ‘महसूस करना’ है। We are going to feel it and enjoy it, relish….enjoy….be happy….be in bliss! If you are in bliss, that is my wish! Be happy, we should be happy forever!

Love you [love you Dad].

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