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मन का पथ – भाग १ (Path of Mind – Part 1) – Aniruddha Bapu‬

मन का पथ – भाग २

दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं इसकी चिन्ता मत करना (Don’t worry about what others think of you) – Aniruddha Bapu

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २९ जनवरी २०१५ के अपने हिंदी प्रवचन में मन के पथ के बारे में जानकारी दी। बापू ने इस संदर्भ में बताते समय, ‘दूसरों के कहने से मानव अपने मन को बनाता रहता है, मानव अपना मन कभी भी स्वयं की बुद्धि से नहीं बनाता’, इस मुद्दे को स्पष्ट किया।

Aniruddha Bapu told about Path of Mind in Hindi Discourse at Shree Harigurugram, Bandra.

मन का पथ (Path of Mind) – Aniruddha Bapu‬ Hindi‬ Discourse 29 Jan 2015

हमारा मन हमारा अपना कभी नहीं होता। मन ये ऐसी जगह है जो काल के साथ बनती रहती है। ये मन की जगह १००% होती तो हमारी है, लेकिन हम उसे बनाते हैं दूसरों की राय के हिसाब से। हमारे मन में गलत विचार कभी आते नहीं। मन हमारे काबू में नहीं रहता, बल्कि हम मन के काबू में होते हैं। जो नही करना चाहिए, ऐसा हमारी बुद्धी बताती है वह करना हमारे लिए गलत होता है, मगर फिर भी वही करने की इच्छा होती हैं। इस तरह मन के पथ के बारे में हमारे प्यारे सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने प्रवचन में बताया, जो आप इस व्हिडियो में देख सकते है।

तुम सब ओरिजिनल हो (You all are original) – Aniruddha Bapu

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २९ जनवरी २०१५ के अपने हिंदी प्रवचन में ‘ मन का पथ कैसा बनता है ’ इस बारे में समझाया।

हमारा मन दुसरे लोग बनाते हैं। दूसरे किसी ने कुछ कहा तो वह बात मन में बैठ जाती है। बडी बडी पुस्तकें महज पढने से किसी को यश नहीं मिल सकता है। हम लोग सिर्फ कॉपी करने को देखते हैं। कॉपी करने से कोई बडा नही होता। You all are original. एक इन्सान कभी भी पूरी तरह दूसरे जैसा नहीं होता। हर एक व्यक्ति युनिक है। I am alone in the world like me. हर इन्सान एकमेव अद्वितिय है। उसके जैसा कोई नही है, हो नही सकता। जिंदगी का कोई गणित नही होता। जिंदगी जिंदगी होती है। ये जिनेका तरीका है, ये जीने की शान है। उतार-चढाव तो आते रहते हैं, इस तरह मन के पथ के बारे में हमारे प्यारे सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने प्रवचन में बताया, जो आप इस व्हिडियो में देख सकते है।

मन का पथ (Path of Mind) – Aniruddha Bapu

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २९ जनवरी २०१५ के अपने हिंदी प्रवचन में ‘ मन का पथ कैसा बनता है ’ इस बारे में समझाया। ‘हर एक का जीवन अलग होता है और उस जीवन के अनुसार उसका पथ बनता है’ यह भी बापू ने बताया।

दूसरे के अनुभव से सीखना जरूरी है। वह अच्छी है। हर एक का जीवन अलग होता है। पहले हमे अपने मन का पथ क्या है यह मन में तय करना चाहिए। वो भटक जाए, भूल जाए, बार बार भटक जाए तब भी कोई प्रॉब्लेम नही लेकीन मेरा पथ कुछ होना जरूर आवश्यक है। मन पर सारे संस्कार होते है और मन हमारा विस्तृत होता जाता है। अपने आप बनते जाता है। मन का गुणधर्म है चाहना और न चाहना। बुद्धि का काम है चुनना। इन्सान को चाहिए कि वह इसका स्वयं निर्णय करें कि मेरे मन को किस पथ पर जाना है। हम बुद्धि के सहारे जी नही सकते, मन के सहारे से, हृदय के सहारे से, अंत:करण के सहारे, भावनाओं के सहारे जी सकते है, यह हमारे प्यारे सद्गुरु अनिरुद्ध बापू ने प्रवचन में बताया, वो आप इस व्हिडिओमें देख सकते है।

मानव अपने मन का पथ वाणी से बनाता है (Man creates his path of mind by his Vaani) – Aniruddha Bapu

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २९ जनवरी २०१५ के अपने हिंदी प्रवचन में ‘ मन का पथ (रास्ता) हम अपनी वाणी (speech) के साथ स्वयं बनाते हैं ’, इस बारे में समझाया।

मानव के पास मन के साथ बुद्धी भी है और वाचा भी है। वाचा यानी सिर्फ बोलना नही। वाचा के चार प्रकार होते हैं- बोलना, लिखना, पढना और सुनना। ये सब वाचा में ही अन्तर्भूत हैं। हम जो बोलते हैं वह दूसरे लोग सुने या ना सुने हम स्वयं तो सुनते ही हैं, वह चाहे मन में बोले या बडे आवाज में बोले। चाहे या ना चाहे सुनना ही पडता है। वह बात अपने आप ब्रेन में रजिस्टर हो जाती है। जो विचार हम बार बार करते हैं वे विचार अपने मन में deeply register होता है। अगर हम बार बार गलत बातें बोलते रहते हैं तो वही मन का पथ बनेगा। मन का पथ (रास्ता) हम अपनी वाणी के साथ स्वयं बनाते हैं, इस बारे में हमारे प्यारे सद्गुरु अनिरुद्ध बापू ने प्रवचन में बताया, वो आप इस व्हिडिओमें देख सकते हैं।

इस दुनिया में पूरी तरह तुम्हारा कुछ नहीं है (Nothing is entirely yours in this world) – Aniruddha Bapu

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २९ जनवरी २०१५ के अपने हिंदी प्रवचन में ‘जिन बातों को हम अपना अपना कहते रहते हैं वे सारी की सारी बातें पूरी तरह हमारी नहीं होतीं’, इस बारे में बताया।

‘मेरा जो बन गया काया वाचा मन से। उसका मैं ऋणी सर्वकाल।’ यह साईनाथजी (Sainath) का एक महत्वपूर्ण वचन है। इन्सान का अपना अकेले का ऐसा उसका क्या है? खानदान, नाम, डिग्री, घर, पैसे, मॉ-बाप, बंधू, पत्नी या पति, बहन, भाई, बच्चे, बहू, जमाई, कन्या, पोते-पोते, दोस्त, शत्रु, सहकर्मी? जो भी कोई हैं वे सारे उसके हैं, लेकिन कितने हैं? ‘जिन बातों को हम अपना अपना कहते रहते हैं वे सारी की सारी बातें पूरी तरह हमारी नहीं होतीं’, इस बारे में हमारे प्यारे सद्गुरु अनिरुद्ध बापू ने प्रवचन में बताया, वो आप इस व्हिडियो में देख सकते हैं।

॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

मन का पथ – भाग २

3 comments

  1. ॥ जय जगदंब जय दुर्गे ॥
    ॥ मी अबज्ञ आहे . ॥

  2. खुप खुप अंबज्ञ दादा

  3. हरि ॐ दादा,
    एवढे दिवस आम्ही सर्व प्रवचनाच्या क्लिपस्‌ पहातो आहोत पण त्यात एकदम छोट्या-छोट्या भागातून प्रवचन ऐकायला मिळायचे. अर्थात खूप आनंद वाटायचाच हे सर्व व्हिडिओ पहाताना. परंतु आज तुम्ही टाकलेल्या या पोस्टमध्ये आम्हा सर्व श्रद्धावानांना सलग व्हिडिओ पहायला मिळाले आणि अक्षरश: आपण प्रवचनाला बसलो आहोत असेच वाटत होते. शिवाय एका प्रवचनातील खूप मोठा भाग एकाच वेळेस पहावयास मिळाल्याने आम्ही खूप खूप एन्जॉय करत आहोत, आमचा आनंद द्विगुणीत झाला आहे.
    खूप खूप अंबज्ञ.

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