पंचमुखहनुमत्कवचम् विवेचन – १२ (विराट त्रिविक्रम) Panchamukha-Hanumat-kavacham Explanation – 12 (Virat Trivikram) – Aniruddha Bapu

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने १६ मार्च २०१७ के पितृवचनम् में पंचमुखहनुमत्कवचम् के विवेचन में ‘विराट त्रिविक्रम’ के बारे में बताया।

पंचमुखहनुमत्कवचम् विवेचन - १२ (विराट त्रिविक्रम)  (Virat Trivikram)
पंचमुखहनुमत्कवचम् विवेचन – १२ (विराट त्रिविक्रम)

भगवान विष्णु के, महाविष्णु के, शिवशंकरजी के, परमशिव के कितने भी अवतार यहां क्यों न आयें, वे सिर्फ वसुंधरा पर ही आते हैं। लेकिन उनसे भी, उनके साथ साथ हमें ये ध्यान में रखना चाहिये, जब ये भगवान का स्वरूप परमात्मा का अवतार हो जाता है, तो वो भगवान का, परमात्मा का स्वरूप हमेशा कार्यरूप होता है।

जब त्रिविक्रम आता है, तब त्रिविक्रम कार्यरूप नहीं होता, त्रिविक्रम कारणरूप होता है। यानी जो अवतार है, मैं किसको कम या ज्यादा ऐसा नहीं बोल रहा हूं, हर एक की विशेषता है, अपनी अपनी विशेषता। राम है, कृष्ण है तो वो अपने मूल रूप में विराट हैं ही, अनंत हैं ही, लेकिन यहां जो आते हैं वसुंधरा पर, उस विशिष्ट हेतु से, विशिष्ट कार्य के लिये आते हैं, उसके अनुसार वे सारी धारणाएं, सारे गुण लेके आ जाते हैं। अभी देखिए, राम जैसा कृष्ण नहीं है, कृष्ण जैसा परशुराम नहीं है। लेकिन त्रिविक्रम जो है और हनुमानजी जो है वो किसी रूप में भी आये, अवतार में भी आये, तो विराट ही रहते हैं। किसी एक कार्य को करने के लिये आये हैं ऐसा बिलकुल नहीं होता। वो सब कुछ करते रहते हैं क्योंकि उनका कार्य भी विराट है।

त्रिविक्रम स्वरूप में एक रूप रामजी का है, हनुमानजी का है और शिवजी का है। याद है ना? फोटो देखी हुई है। कितने लोगों के पास है वो फोटो? प्रत्यक्ष में मैने जो दिया था वो, right, very good!

पंचमुखहनुमत्कवचम् के विवेचन में ‘विराट त्रिविक्रम’ के बारे में सद्गुरु अनिरुद्ध बापू ने पितृवचनम् में जो बताया, वह आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं।

॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

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