जीवन में अनुशासन का महत्त्व – भाग २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ इस बारे में बताया।

सो, डिसीप्लीन जो है, जो अनुशासन है, हमारे जिंदगी में हर पल के लिए आवश्यक है। लेकिन ये अनुशासन, डिसीप्लिन अपने जीवन में रखने के लिए हमें बहोत सारी ताकद चाहिए। दूसरे को अनुशासन सिखाना है, अपने हाथ के नीचे जो काम कर रहे हैं, अपने अंडर जो काम कर रहे हैं, ऐसे अपने नौकोरों से अनुशासन से काम करवाना ये तो हमारे लिए बहुत आसान चीज़ है।

उसके लिए हम हमारे, हमारे लिए गुरु के चरणों की अवश्यकता नहीं होती। लेकिन खुद की जीवन में अनुशासन लाने के लिए गुरुचरणों की आवश्यकता होती है। आप हर कोई आज जाकर या जाते समय सोचिए जो आपके जीवन में मुड़कर सिंहावलोकन किजिए।

सिंहावलोकन यानी सिंह-अवलोकन, सिंह-लायन। ये लायन क्या करता है हमेशा? सिंह जो है, ये कुछ कदम चलने के बाद पीछे मुड़कर देखता है। ये बाजू भी, ये बाजू से भी फिर आगे चलता है। हमें भी जिंदगी में क्या करना चाहिए? ऐसी ही करना चाहिए। हर एक साल के शुरुआत के दिन हमें देखना चाहिए, पिछ्ले साल में क्या-क्या किया, क्या-क्या करना था, उसमें से क्या-क्या नहीं किया, जो नहीं करना था, वो क्या किया। इसे कहते हैं, सिंहावलोकन । आज रात घर जाते समय आप हर कोई अपने मन में सिंहावलोकन करें कि मैं क्या बनना चाहता, मैं क्या बनना चाहता था और क्या बन गया। मुझे कौन से गुण चाहिए थे और मैंने गवा दिये उन्हें। मैं कौन सा अनुशासन लाना चाहता था और वो अनुशासन न लाने के कारण मेरा क्या क्या नुकसान हुआ। सोचिए तो आप जान जायेंगे भाई, अनुशासन-हीनता के कारण, अनुशासन न होने के कारण जिंदगी में हमने बहोत कुछ खोया हैं।

अनुशासन हर चीज़ में आवश्यक होता है। देखिये, भगवान ने इंसान के शरीर में ये अनुशासन बनाया हुआ है। इतना ही नहीं, पूरे विश्व में अनुशासन है। जिसे हम लोग क्या कहते हैं, ऋत, ऋत। ऋत और सत्य। सत्य यानी ट्रूथ, The Universal truth, ये सत्य और ये सत्य के आधार से जो विश्व की रचना होती है, विश्व का पालन होता है, उसके नियमों को ऋत कहते है। यानी सूर्य है, पृथ्वी है, पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण है, चाँद का गुरुत्वाकर्षण है। इन तीनों की जो पोझीशन्स का, सिद्धी का रिश्ता है एक दूसरे से। ये इसे क्या कहते हैं, इन नियमों को? ऋत कहते हैं।

ये ऋत यानी क्या है? भगवान का, भगवान ने बनाया हुआ डिसीप्लिन है, अनुशासन है। किसके लिए? खुद के लिए, खुद के लिए ना? उसे रोखने वाला कौन है? कोई भी नहीं। फिर भी हमारा चोबीस घंटों का दिन चोबीस घंटों का ही रहता हैं। पृथ्वी अपनी ही कक्षा में बराबर सूर्य के प्रदक्षिणा करती रहती है। उस में अगर दस मिली मीटर भी ऍक्सीस बेन्ड हो जाए, तो क्या हालत हो गयी? आधी पृथ्वी जलने लगेगी, राईट। इसका मतलब क्या है? की ये अनुशासन कितना तीव्र है भगवान। यानी भगवान ने जो विश्व बनाया है, उसके नियम उसने खुद ने बनाये हैं और खुद भी वो उन नियमों का पालन करता है। उसको कोई रोकने वाला है? नहीं है तो भी।

‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ के बारे में हमारे सद्गुरु श्री अनिरुद्ध ने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं।

ll हरि: ॐ ll ll श्रीराम ll ll अंबज्ञ ll

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