जीवन में अनुशासन का महत्त्व – भाग ९

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ इस बारे में बताया।

उत्साह कहाँ से उत्पन्न होता है? उत्साह उष्णता से उत्पन्न होता है। उष्णता उत्साह से उत्पन्न होती है और मैंने कहा कि, ‘सद्‌गुरु गायत्री’ में क्या है? ‘उष्णं स्निग्धं गुरुर्तेजो’, ओ.के.। तो गुरुतेज क्या है? ‘उष्ण-स्निग्ध-गुरु’ है और ‘गुरुचरणधूल’ क्या है? ‘सौम्य-स्निग्ध-गुरु’ है। गुरु के चरणों से जो तेज निकलता है, वो तेज कैसा है? ‘उष्ण-स्निग्ध’ गुरुत्व देनेवाला है, अशुभनाशन करनेवाला है, राईट, हमें उत्साह देनेवाला है, राईट। हर एक के शरीर में मैथुन केन्द्र होता है। चार केन्द्र होते हैं मन में –

‘आहार, निद्रा, भय, मैथुन। सर्व जगतासी समसमान।’

अनुशासन का महत्त्व - भाग ९पंछी लो, प्राणि लो, कीड़ा लो, कीटक लो या ह्यूमन बीईंग लो, आहार, निद्रा, भय, मैथुन – मैथुन यानी सेक्स नहीं, मैथुन यानी कॉम्पीटन्स, पोटन्सी, कार्यक्षमता, उत्साह, कार्य-उत्साह और कार्यक्षमता, कॉम्पीटन्स – डायनॅमिक एनर्जी, ऍक्टीव एनर्जी, ऍक्टीव पीसफुल ऑफ लाइफ दॅट इज मैथुन। राईट, मैथुन का अर्थ अच्छे ढंग से दिया गया है। अब ग़लत अर्थ का इस्तेमाल होता है। ये मैथुन केन्द्र जो है, ये केन्द्र कैसा है? ‘उष्ण-स्निग्ध-गुरु’ केन्द्र है। हमारे मन में हो या शरीर में हो या प्राण में हो, ये मैथुन केन्द्र कैसा है? ‘उष्ण-स्निग्ध-गुरु’ गुणों से बनता है और तेज कहाँ से आता है? सद्‌गुरु से आता है –

‘उष्णं स्निग्धं गुरुर्तेजो धीमहि।’

समझे? यानी उत्साह भी कहाँ से आएगा? वहाँ से आएगा। दूसरा उत्साह कहाँ से आता है? जब हम ज्यादा काम करते हैं, तो रेस्ट से आता है, विश्रांति से आता है, विश्राम से आता है, आराम से आता है। वो ‘सौम्य-स्निग्ध-गुरु’ है। वो भी गुरु का ही कदम है। यानी ज्यादा काम करने के बाद जो विश्रांति लेते हैं, वो क्या हो गया? ‘सौम्य-स्निग्ध-गुरुता’। वो भी किसके पास है? सद्‌गुरु के पास है, गुरु गुण के पास है और जो एक्सरसाईझ से यानी मसल ट्रेनिंग से आती है, वो कहाँ से आती है? वो उत्साह कहाँ से आता है? एक्सरसाईझ ट्रेनिंग से आता है। वो भी किधर से आता है? ‘उष्ण-स्निग्ध-गुरुत्व’ से आता है, मैथुन केन्द्र से आता है और मैथुन केन्द्र का स्वामी कौन है? ‘सद्‌गुरु’ है।

ये जान लो, ‘गुरु’ गुण ही मैथुन केन्द्र का स्वामी है। यानी हर एक इन्सान में जो कॉम्पीटन्सी और पोटॅन्सी है, क्षमता है, सक्षमता है, उसका स्वामी, प्रदाता कौन है? सद्‌गुरु, एक ही है।

‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ के बारे में हमारे सद्गुरु श्री अनिरुद्ध ने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं।

ll हरि: ॐ ll ll श्रीराम ll ll अंबज्ञ ll

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