जीवन में अनुशासन का महत्त्व – भाग ८

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन (discipline in life) का महत्त्व’ इस बारे में बताया।

ये संयम जो है, बहुत आवश्यक होता है। जहाँ जितना बोलना चाहिए, उतना ही बोलना चाहिए। जहाँ जो करना चाहिए, उतना ही करना चाहिए। जहाँ शौर्य चाहिए, वहाँ शौर्य चाहिए। जहाँ शान्ति चाहिए, वहाँ शान्ति ही चाहिए। हर चीज़ की आवश्यकता होती है। लेकिन हम अपने मन पर काबू नहीं पा सकते। जहाँ गुस्सा नहीं करना चाहिए, वहाँ ही गुस्सा कर बैठते हैं। जहाँ आलस नहीं करना चाहिए, वहाँ ही आलस कर बैठते हैं। जो नहीं खाना चाहिए, वहीं खा बैठते हैं। क्यों? क्योंकि मन को अनुशासन, मन अनुशासन प्रिय नहीं होता। जो नहीं करना होता है, वहीं करना चाहता है, उसे मन कहते हैं।

मन क्या चीज़ है? कि जिसे बुद्धि बताती है कि ये नहीं करना चाहिए। मन वही करने की प्रतिज्ञा करता है। हठ करता है, मुझे वही करना है, जो नहीं करना चाहिए। यानी ना डिसिप्लीन, ना अनुशासन, ना संयम। इसी लिए मन को उलटा करना चाहिए, उन्मन करना चाहिए – नम:। मन और नम, नम: करना चाहिए। मन को उलटा करने का सबसे आसान तरीका क्या है भाई? सद्‌गुरु की चरणधूलि में लोटांगण करो। खुद को फेंक दो उसके चरणों में। जो भी हूँ, हमेशा तुम्हारे चरणों में हूँ बस्‌! अच्छा हुआ तो भी तुम्हारे चरणों में, बुरा हुआ तो भी तुम्हारे चरणों में। क्योंकि मालूम है, अगर तुम मेरा भला नहीं कर सकते, तो कोई भी नहीं कर सकता। You are The Ultimate – ये हमारा पूरा विश्वास होना चाहिए कि अगर मेरी जो बिगड़ी हुई हालत है, ये मेरा सद्‌गुरु बदल नहीं सकता या बदलना नहीं चाहता जो भी है, तो दूसरा कोई भी ये नहीं कर सकता और करेगा भी, तो वो मेरे लिए ग़लत ही साबित होगा, राईट।

ये जो है, ये भावना हमें सद्‌गुरु के चरणों से प्राप्त होती है। इसी से संयम उत्पन्न होता है। इसे बाबा कहते हैं – ‘सबूरी’। संयम के सिवा सबूरी प्राप्त नहीं हो सकती, सबूरी के सिवा संयम प्राप्त नहीं हो सकता। सबूरी और संयम मिलाकर ही धैर्य बनता है, राईट। धैर्य से ही पराक्रम की उत्पत्ति होती है। पराक्रम से यश उत्पन्न होता है। यानी हमें क्या चाहिए? हमें धैर्य चाहिए, हमें संय़म चाहिए। संयम कौन देता है? सद्‌गुरुतत्त्व देता है। अब आप पूछोगे भाई, कैसे देता है? देखना है, डेफिनेटली देखना है।

‘वेद’ जो शब्द है, हर कोई भारतीय जाति के, वेद यानी सबसे महान ग्रंथ बस्‌, बाकी कुछ नहीं जानता। ‘वेद’ ये जो शब्द है, ये ‘विद्‌’ धातु से बनता है। संस्कृत में ‘विद्‌’ धातु का अर्थ होता है – जानना। पूरी, सिर्फ़ चीज़ जानना नहीं, पूरा का पूरा जानना। जिस चीज़ के बारे आप जानना चाहते हैं, उसकी समग्र, संपूर्ण information, the complete, total information is call as ‘विद्‌’ – जानना। ‘विद्‌’ धातु का अर्थ है – समग्र जानकारी। Complete, total जानकारी यानी ‘विद्‌’ धातु का अर्थ और ये जानकारी जिससे हासिल होती है, वो ‘वेद’ हैं। ये ultimate जानकारी, सारी चीज़ों की जिससे प्राप्त होती है, उसे वेद कहते हैं। क्यों? ‘एकेन ज्ञात्वा’ – उस ‘एक’ को जानने के बाद, सब कुछ जानना आसान हो जाता है। उस ‘एक’ को प्रकाशित करते हैं वेद। वो ‘एक’ कौन है? ‘सद्‌गुरु’ है। वेद किसको प्रकाशित करते हैं? वेद ‘सद्‌गुरुतत्त्व’ को यानी ‘परमात्मा’ को प्रकाशित करते हैं। किसके लिए? हमारे लिए। भगवान तो स्वयं प्रकाशी हैं। लेकिन हमारी चर्मचक्षुओं से हम उस प्रकाश को देख नहीं सकते। वो बतलाने का मार्ग कौन करते हैं? धर्मग्रंथ करते हैं। उन्हें ही हम लोग वेद कहते हैं, समझ गए?

‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ के बारे में हमारे सद्गुरु श्री अनिरुद्ध ने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं।

ll हरि: ॐ ll ll श्रीराम ll ll अंबज्ञ ll

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