जीवन में अनुशासन का महत्त्व – भाग ५

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ इस बारे में बताया।

ये कुम्हार है बेसिकली। ये सद्‌गुरु कैसा होता है? he is potter, कुम्हार है। हर इन्सान का जो मिट्टी का गोला है, मिट्टी का, उसे इस कालचक्र के नेमी पर रखकर उसे उचित शेप भी देता है, आकार भी देता है उचित। वो भी कैसे? अपना हाथ उस पर, उसके बाहर उस गोले पर रखकर। चक्र को गति कौन देता है? मटका देता है? नहीं, कुम्हार देता है। अंदर से हाथ डालके वहाँ कुछ चीज़ें रखने के लिए अवकाश यानी आकाश यानी स्पेस कौन बनाता है? कुंभार बनाता है। वैसे हमारे जिंदगी में अंदर यानी हमारे मन में और बाहर यानी हमारे जीवन में उचित शेप, उचित स्पेस कौन देता है? सद्‌गुरु देता है। इसी लिए ये बेसिकली क्या है? कुम्हार है।

इसी लिए एक संत ने कहा है, ‘विठ्ठला तू वेडा कुंभार।’ ‘विठ्ठला तू वेडा कुंभार।’ यानी क्या? हे विठ्ठल तू तो पगला कुम्हार है, तू पागल है। हम इतने कीचड़ भरे प्रदेश से हैं, गंदे खिचड़ जैसे हैं, फिर भी तू क्या बनाता है? उससे अच्छी आकृति बनाने में हमेशा लगा हुआ रहता है। ये सद्‌गुरुतत्त्व है, राईट। ‘तू वेडा कुंभार।’ ये पागल ही होता है, अपने भक्तों के लिए, अपने शिष्यों के लिए। ये The Decipline क्यों? क्योंकि जिस दिशा में डिसिप्लीन देना आवश्यक है, अंदर हो या बाहर, ये गुरु के चरण करते हैं। ‘जिस जिस पथ पर भक्त साई का, वहाँ खड़ा है साई। पथ बिसरे को राह दिखाता दयावान गुरु साई।’ क्योंकि ये सद्‍गुरु दयावान होने के कारण, आपके पास पुण्य जरा भी ना हो, सिर्फ़ आपने उन्हें कबूल किया है, मान्यता है आपकी, ‘ये मेरा सद्‌गुरु है’, आप प्रेम कर रहे हैं, तो अपनी खुद की दया के कारण, ये जो पथ बिसरा है उसे राह दिखाने का कार्य करता है।

इसी लिए अच्छी बात क्या है हमारे लिए? हमेशा गुरु चरणों के साथ रहना, राईट। वो हमारे साथ चलता ही रहता है, we have to walk with him. That is very important. We should learn to walk with him. वो तो हमारे साथ हमेशा चलता ही है, हमारे आगे से चलके आता है, पीछे से चलता रहता है, हमारे साथ हाथ पकडकर चलता है। लेकिन हम कब सीखेंगे, उसके साथ चलना? गुरुचरणपायस पीना यानी क्या? गुरु के चरणों के साथ, गुरु के साथ-साथ चलना सीखना।

अभी आप कहेंगे बापू, गुरु के साथ-साथ चलना यानी क्या? हमारे में, हममें इतनी ताक़त नहीं है, इतने डिसिप्लीन है ही नहीं, हम तो डिसिप्लीन चाहते हैं। एक कदम उठाके देखो, just we have to walk one step with him, take one step with him and he will take you, he will carry forward. एक कदम उठाइए उसके साथ चलने का। हम लोग उसकी तरफ़ जाना चाहते हैं। वो तो हर कोई जाते ही रहता है। What is the special in that? what is special for us? हमारे लिए important क्या है? उसके साथ चलने की कोशिश करो। उसके साथ चलने से आप सद्‌गुरु नहीं बनोगे। आप उसके क्या बनेगे? सहवासी बनेगे। जो हमने पहले देखा, पिछले मरतबा – ‘गुरुनाम आणि गुरुसहवास’। आप सहप्रवासी बनेंगे, सहवासी बनेंगे, राईट!

यानी कैसे कर सकते हैं बापु ये हम लोग? सद्‌गुरु के साथ चलना यानी क्या? गुरु की एक आज्ञा का पालन करना, कम से कम, जिसका हम पालन कर सकते हैं, ऐसी एक आज्ञा का पालन करना, पूरे दिलो-दिमाग से, बस्‌! छोटी सी निकालिए, ढूँढ़कर, खोज़कर ढूँढिए, खोजिए, ढूँढ़िए, सब कुछ करें, छोटी से छोटी हो, जो हमें सहजता से, आसानी से शक्य है, पॉसिबल है, उस गुरु-आज्ञा का पालन करना शुरू कर दीजिए, बस! This is first step. उसके आगे की steps लेने के लिए आपको सहायता कौन करेगा? वो गुरु, सद्‌गुरु करेगा।

‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ के बारे में हमारे सद्गुरु श्री अनिरुद्ध ने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं।

ll हरि: ॐ ll ll श्रीराम ll ll अंबज्ञ ll

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