जीवन में अनुशासन का महत्त्व – भाग ३

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ इस बारे में बताया।

सो अनुशासन जब माँ-बाप को होता है, तभी बच्चों में आता है। बोधवचनी बाबा बनने से कुछ नहीं होता है। बच्चों को बड़ा बड़ा उपदेश हम लोग करते हैं, भाई, अच्छा बर्ताव करो, ऐसा करो, वैसा करो, खुद कुछ नहीं करते। अगर मैं मेरे माँ-बाप की इज्जत नहीं कर रहा हूँ तो मेरे बच्चे मेरी इज्जत नहीं करनेवाले कल। Definitely, we should understant that. ये जानना चाहिए कि जो अनुशासन बच्चों में लाना चाहते हैं, पहले किस में आना चाहिए? हम में आना चाहिए, पॅरेंट्स में आना चाहिए, राईट। यानी हम जान जायेंगे की हम बच्चे हैं या माँ-बाप है, हमें अनुशासन की बहुत आवश्यकता हैं।

हम जवान हैं या बूढे हैं, फिर भी हमें अनुशासन की आवश्यकता है। हम सोचेंगे कि जैसा पच्चीस साल की उम्र में जो खा रहे थे, उतना ही हम पचास साल में और सत्तर साल में खायेंगे, ये अनुशासन है? नहीं। पच्चीस साल की उम्र में मैं चलकर दस किलोमिटर चलता था, सत्तर की उम्र में चल सकूँगा तो अच्छी बात है, लेकिन उसका अट्टाहास नहीं होना चाहिए, हठ नहीं होना चाहिए कि मैं चलूँगा ही। अनुशासन चाहिए, भाई, पहले से, के मैं हर रोज चलता रहूँगा एक घंटे के लिए, तब उस उम्र में भी मैं चल सकूँगा। अनुशासन चाहिए, राईट।

यानी अनुशासन, कौन सी भी उम्र है, उसके लिए आवश्यक है। तुम्हारा कौन सा भी पेशा है, बिझनेस है, व्यवसाय है, उसके लिए आवश्यक है। कौनसी भी अवस्था है, आवश्यक है। अनुशासनहीन जीवन जो है, ये हमेशा असफल जीवन है, फेल्युअर का जीवन है, देअर आर ओन्ली फेल्युअर्स। अनुशासन की बहुत आवश्यकता होती है। ये खुद को अनुशासन लगाना ये किसी भी इन्सान के लिए, I agree with you, बहुत डिफिकल्ट बात है और यहाँ ही हमारे काम कौन आता है? गुरुचरण।

‘जीवन में अनुशासन का महत्त्व’ के बारे में हमारे सद्गुरु श्री अनिरुद्ध ने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं।

ll हरि: ॐ ll ll श्रीराम ll ll अंबज्ञ ll

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