मनुष्य का मन अन्न के तरल भाग से बनता है – भाग २

सद्‍गुरु श्री अनिरुद्धजी ने ०७ अक्टूबर २०१० के पितृवचनम् में ‘मनुष्य का मन अन्न के तरल भाग से बनता है’ इस बारे में बताया।

तो ये जो पायसम और ये जो श्रीखंडम हैं, ये बेस्ट विशेष पदार्थ क्यों माने गए? क्योंकि ये जो भावशारीरि गुण जो इनमें हैं, इनसे जो शरीर में, हर एक के शरीर में भावशारीरि गुण बनते हैं, वो समान हैं। यानी जैसे देखिए कि, एक एक्झाम्पल लिया कि ग्राऊंड नट्‌स शिंगदाना जिसे कहते हैं, ये तो पहले इंडिया में था ही नहीं। ये भी पोतुगीजों के साथ आया और इसीलिए हम लोग उपवास के दिन खाते हैं साबुदाणा और शेंगदाणा। क्यों खाते हैं? क्योंकि जो व्यर्ज्य प्रकरणम्‌ है कि उपवास के दिन जो चीज़ नहीं खानी है, उनकी लिस्ट है, उनमें आलू यानी बटाट-पोटॅटो, साबुदाना और शिंगदाना का नाम नहीं है। तब किसीको मालूम नहीं था इंडिया में। जब ये व्यर्ज्य प्रकरणम्‌, उपवास के लिए क्या-क्या व्यर्ज है ये लिखा गया।

दॅट वॉज इन ७४०, उसके सातसों साल बाद ये तीनों चीज़ें इंडिया में आयी। तो उनका नेम कैसे होगा? इसीलिए हम उपवास के दिन आराम से खाते हैं, मैं भी खाता हूँ। मैं उपवास नहीं करता, मैं क्टॉ! टेस्ट के लिए खाता हूँ। लेकिन ये सिंगदाना जो है, एक के शरीर में गया तो वो रुक्षता उत्पन्न करेगा ७०%। दूसरे के शरीर में सिर्फ जाकर २०% रुक्षता उत्पन्न करेगा। तिसरे के शरीर में जाकर उष्णता उत्पन्न करेगा यानी गर्मी उत्पन्न करेगा। तो किसीके शरीर में जाकर उष्णता को कम करेगा। हर एक पदार्थ ऐसी रिऍक्शन देगा ये नहीं हो सकता है। यानी क्वॉन्टिटी में और ये प्रभाव में कुछ फर्क होता है। लेकिन श्रीखंडम और पायसम ऐसे दो पदार्थ हैं – एक शुंभकर और एक अशुभनाशन। जो किसीके भी शरीर में जाए तो वो अपना उचित प्रभाव ही डालते हैं।

अब आप बोलोगे मैं दस किलो श्रीखंड खाऊँगा तो दॅन दॅट इज नॉट करेक्ट। उचित मात्रा में जैसे, जितना चाहते हो, जैसे चाहते हो, पेट भर जाए आराम से, तो ये हमारे शरीर में बहोत अच्छा कार्य करता है। एक शुभ कार्य करते है – पायसम‍ और दुसरा क्या है – श्रीखंडम अशुभनाशन का कार्य करता है। श्रीखंडम में उष्णं-स्निग्धं-गुरु। उष्ण, स्निग्ध और गुरु। उग्र नहीं होता, मिरची जैसा। उष्ण-स्निग्ध और गुरु और पायसम कैसा होता सौम्य-स्निग्ध-गुरु। सूर्य का तेज यानी उष्ण-स्निग्ध-गुरुता। चांद का प्रकाश यानी चांद का तेज यानी सौम्य-स्निग्ध-गुरुता, ओ.के.। ये दोनों की भी आवश्यकता होती है हमारे शरीर में। तो ये इसीलिए उन्हें विशेष अन्न माना गया है और इसीलिए उन्हें नैवेद्य में सबसे उच्चतम स्थान दिया गया है।

‘मनुष्य का मन अन्न के तरल भाग से बनता है’ के बारे में हमारे सद्गुरु श्री अनिरुद्ध ने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं।

ll हरि: ॐ ll ll श्रीराम ll ll अंबज्ञ ll

 

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