आनन्द यह पथ पर प्रवास करते समय मिलता है (Happiness is found along the way) – अनिरुद्ध बापू

परमपूज्य सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १८ फ़रवरी २०१६ के पितृवचनम् में ‘आनन्द यह पथ पर प्रवास करते समय मिलता है’ इस बारे में बताया।
Aniruddha Bapu told in his Pitruvachanam dated 18 Feb 2016 that 'Happiness is found along the way (आनन्द यह पथ पर प्रवास करते समय मिलता है )'
आनन्द यह पथ पर प्रवास करते समय मिलता है
(Happiness is found along the way) – अनिरुद्ध बापू

अनिरुद्ध बापू ने पितृवचन के दौरान यह बताया कि यह जानना बहुत जरुरी है, हर एक बडे इन्सान के लिए भी, जो हर दिन इम्तेहान देता रहता है, किसी ना किसी चीज में और हर बच्चे के लिए भी, जो पढाई में इम्तिहान दे रहा है। Exam दे रहा है। कौनसी भी परीक्षा, इम्तिहान, exam क्यों ना हो, उससे मेरा भगवान बडा है। किसी भी संकट से मेरा भगवान बडा है। लेकिन आप सोचते हैं कि भगवान बडा है, उसकी ताकद बडी है। लेकिन हमारा पुण्य बडा नहीं है। अरे, पुण्य की बात किसने बताई आपको! वो छोड दो। भगवान आपका पुण्य देख कर अगर कृपा करना चाहते ना तो समझो वह कृपा और २०० जन्म के बाद भी नहीं मिलने वाली। ok सिर्फ़ विश्वास! you are never judged by your performance, you are judged by your faith, भगवान के पास। लेकिन आप बोलेंगे कि doctor की दी हुई दवा लूंगा ही नहीं और भगवान तुम मुझे ठीक कर दो तो भगवान देखेगा भी नही आपको।

आगे अनिरुद्ध बापू बोले, आप बोलेंगे भगवान तुम text book पढना, exam देना, और certificate मेरे नाम पर दे देना। यह नहीं होगा। chance ही नहीं। तुम तुम्हारा काम करो, काम में गलतियां हो सकती हैं। कभी laziness के कारण, कभी गलतफहमी के कारण, कुछ भी हो, अपना काम जितना हो सके उतना अच्छा करने की कोशिश करो। उस पर ज्यादा कृपा है भगवान की, मुझपर कम है। भाई लोग, ध्यान रखना, डरना नहीं। happiness is never at the end of the road. मैंने बार बार कहा है। happiness is never at the end of the road, happiness is along the road. जो  सोचता है कि यह रास्ता खत्म करने के बाद, यह रास्ता पार करने के बाद मुझे आनंद मिलनेवाला है, उसके बाद, मरने के बाद भी आनंद नहीं मिलता। जो सोचता है, सचमुच महसूस करता है, सोचता भी है और महसूस भी करता है और रास्ते पर चलते चलते आनंद पाता रहता है, उसे हर पल, प्रवास के हर स्तर पर, हर मोड पर आनंद मिलता रहता है। और अंत में उसका प्रवास पूर्ण होता है तो आनंद ही आनंद रहता है। ok. तो समझे, यह जो आनंद है ना, इस आनंद का concrete स्वरुप, घनस्वरूप यह मूलाधा्र गणेश है। यह ब्रह्मणस्पति है।

‘आनन्द यह पथ पर प्रवास करते समय मिलता है’ इस बारे हमारे सद्गुरु बापू ने अपने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडियो में देख सकते हैं।

॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

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