Reply To: साई-द गाइडिंग स्पिरिट – हेमाडपंत-२ (Sai the guiding spirit-on the way to Shirdi)

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Sai the guiding spirit-on the way to Shirdi

हेमाडपंतजी के विषय में हमें कुछ महत्वपूर्ण बातें ध्यान में रखनी चाहिएं।

(१) हेमाडपंतजी ‘रेसिडेंट मॅजिस्ट्रेट’ की हैसियत से कार्यरत थे; अर्थात वे ‘उच्चपदाधिकारी’ थे।

(२) हेमाडपंतजी साईनाथ के पास जाने का श्रेय काकासाहेब दीक्षित व नानासाहेब चांदोरकरजी को देते हैं। (संदर्भ अ.२/ओ. १०१)

(३) हेमाडपंतजी के मन की स्थिति साईनाथ के पास जाते समय कैसी थी? तो बहुत ही बेचैन।

यहाँ से हेमाडपंतजी की बात आरम्भ होती है। काकासाहब दीक्षित हेमाडपंतजी से मिलते हैं, साईबाबा का महिमा बताते हैं तथा उन्हें साईनाथजी के पास जाने का आग्रह करते हैं और हेमाडपंतजी शिरडी जाने का निश्चय करते हैं। शिरडी जाना तय हो जाता है, मगर अचानक एक घटना घटती है, और मन में संदेह निर्माण हो जाता है। हेमाडपंतजी के मित्र का बेटा अचानक गुजर जाता है। हेमाडपंतजी जानबूझकर उस लड़के के विषय में संक्षिप्त में लिखते हैं।

(१) उनके मित्र का इकलौता बेटा था।
(२) उसकी सेहत अच्छी थी।
(३) गुणवान था।
(४) वह शुद्ध हवा के स्थान (लोणावला) में बीमार हुआ।

(५) सभी तरह के उपाय किए गए थे।

अर्थात लड़के में या उसके इर्दगिर्द की परिस्थिति भी अच्छी होने के बावजूद लड़के की मृत्यु हो जाती है और इसीलिए हेमाडपंतजी कहते हैं – ‘प्रारब्धकर्मप्राबल्यता’. (संदर्भ अ. २/ओ. १०९)

अर्थात कई उपाय किए गए, मन्नतें मांगी गईं। उस मित्र के गुरु को भी लड़के के पास लाकर बिठाया गया। फिर भी लड़के की मृत्यु हो जाती है इसलिए बेचैन अवस्था में हेमाडपंतजी के समक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है कि, क्या गुरु की यही उपयुक्तता है? जो कुछ हमारी तकदीर में लिखा है, वही होना हो तो गुरु की क्या आवश्यक्ता है? मन में एक बहुत ही बड़ा संदेह निर्माण हो जाता है।

हेमाडपंतजी आगे कहते हैं कि, इसलिए मैंने शिरडी जाने का इरादा बदल दिया। ऐसी अवस्था में हेमदपंतजी गुरु के बारे में लिखते हैं –

(१) गुरु की संगत का यही लाभ है न ! (मित्र के बेटे की मृत्यु)

(२) गुरु हमारे तकदीर को क्या करते हैं – (प्रारब्धकर्मप्राबल्यता)
(३) तकदीर अनुसार ही सबकुछ होना है तो गुरु के बिना क्या दिक्कत होगी?
(४) गुरु के चक्कर में पड़कर बेवजह अपने सुखी जीव को दुःख में क्यों डालें?
(५) जो कुछ तक़दीर में लिखा होगा उसके अनुसार सुख या दुःख भोगेंगे – गुरु के पास जाने से क्या होगा?

ऐसी स्थिति में भी हेमदपंतजी कहते हैं –
जयाचे जैसे अर्जित| नको म्हणता चालून येत|
होणारापुढे काहीही न चालत| नेले मज खेचीत शिरडीसी॥

(जिसने जैसा अर्जन किया होगा वो लाख कोशिशों से भी उससे छुटकारा नहीं पा सकता। होनी को कोई टाल नहीं सकता, मुझे खींचकर शिरडी ले जाया गया।।)
(संदर्भ अ. २/ओ. ११४)
‘कहेंगे एक बार, कहेंगे दो बार’ इस नियम अनुसार साईनाथ की इच्छा से हेमदपंतजी को काकासाहब दीक्षित द्वारा संदेश मिलता है। मार्ग दिखाया जाता है; मगर अपनी कृति से – संदेह की वजह से हेमदपंतजी शिरडी जाना टाल देते हैं। मगर कृपालु ‘दयाघन’ साईनाथ एक बार फिरसे अलग घटना घटाते हैं; साईनाथ की लीला अनुसार नानासाहेब चांदोरकरजी द्वारा हेमाडपंतजी को मार्ग दिखाया जाता है। वसई जाने में देर थी, बीच में एक घंटे का समय था। क्यों न यह एक घंटा किसी कार्य में लगाएँ।

साईनाथजी की कृपा से ऐसी बात ध्यान में आते ही दादर स्टेशन पर एक गाडी आती है, जो केवल बांद्रा तक ही थी और फिर नानासाहब उस गाड़ी में बैठकर बांद्रा पहुँचते हैं और वे हेमाडपंतजी को संदेशा देते हैं। अर्थात

(१) नानासाहब के मन में यह बात स्पष्ट है कि कौनसा कार्य करना हैं।

(२) नानासाहब के पास हेमदपंतजी को संदेशा भेजने की व्यवस्था है।
(३) साईनाथजी की लीला से, जहाँ पर संदेशा भेजा जाता है, वहाँ पर हेमाडपंतजी मौजूद हैं।

(४) उस वक्त हेमाडपंतजी तुरंत नानसाहबजी से मिलने आने की स्थिति में थे – अगर देर हो जाती तो नानासाहब मिल नहीं सकते थे।

अर्थात सद्गुरु किस तरह से घटना घटाते हैं, इस बात का यह स्पष्ट उदाहरण है।

यहाँ पर हेमाडपंतजी अभी तक साईनाथ के भक्त नहीं है; साईनाथ से मिले भी नहीं हैं, केवल काकासाहब दीक्षितजी से साईनाथ की महत्ता का पता चला है और नानासाहब चांदोरकरजी ने किस लिए बुलाया है यह भी पता नहीं है; इसीलिए सद्गुरु भक्त के पूर्वजन्म पहचानकर ऐसी रचना करते हैं, घटना घटाते हैं, ऐसी स्थिति निर्माण करते हैं कि उसे सद्गुरु के पास जाने का ‘मौका प्राप्त होता है’; मगर हर भक्त को खुद ही अपना अपना निर्णय लेना होता है। पहला मौका हेमाडपंतजी द्वारा ठुकराया गया था।

इसलिए साईनाथजी ने दूसरा मौका देते समय ‘प्रांताधिकारी’ नानासाहबजी द्वारा हेमाडपंतजी को शिर्डी की कथाएं सुनाईं। हेमाडपंतजी ने भी नानासाहबजी की आतुरता देखकर खुले दिल से, ईमानदारी से बहुत ही शर्मिंदगी से नानासाहब को अपने की चंचलता बयान की। साईनाथ जी की कृपा से नानसाहबजी ने दिल की गहराई से, प्रेम से हेमाडपंतजी के सारे संदेह दूर करके हेमाडपंतजी से ‘तुरंत जा रहा हूँ’ यह वचन लिया। इतना ही नहीं, बल्कि वह वचन लेकर ही नानासाहबजी वहाँ से निकल आए।(संदर्भ अ.२/ओ.१२२) यही साईनाथ की लीला हैं।

मैं अम्बज्ञ हूँ।