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मर्मज्ञ मार्गदर्शक (Falguni Pathak)

फाल्गुनी पाठक (Falguni Pathak)Falguni feature image

   मैं विगत २६ वर्षों से गा रही हूँ। मेरा गायन शास्त्र का प्रशि़क्षण वगैरे कुछ नहीं हुआ था। परन्तु रेडियों पर गाना सुनते-सुनते मैं गाने लग गयी। उम्र के नवें साल में मैंने पहला स्टेज शो किया। उसके बाद मैंने कभी पीछे-मुड़कर नहीं देखा। मैं गाती गयी और मुझे सफलतायें मिलती गयी, यश मिलता गया। कुछ भी कमी नहीं थी। फिर भी मन में एक कसस अवश्य थी कि मुझे योग्य मार्गदर्शन नहीं मिला, मुझे संगीत का शिक्षण नहीं मिला। परन्तु मैं बापू के पास आ गयी और मेरा संगीत शिक्षण शुरु हो गया।

     मेरी सहेली शीतल के काफी आग्रह करने पर मैं सन्‌ २००४ में बापू के दर्शन के लिये आयी। प्रारंभ में मैं गुरुवार को दर्शन करके लौट जाया करती थी। परन्तु धीरे-धीरे संस्थाओं के कार्यक्रमों में सहभागी होने लगी। आगे चलकर मैं बापू के भक्त परिवार का हिस्सा कब बन गयी, पता ही नहीं चला। मैं बापू को सद्‌गुरु मानने लगी। और जो बात मुझे सबसे ज्यादा अच्छी लगती है वह है कि मेरे सद्‌गुरु बिल्कुल हमारी ही तरह रहते हैं। हम सिनेमा देखने जाते हैं, उसीतरह वे भी सिनेमा देखने जाते हैं, परिवारीय सदस्यों के साथ घूमनें जाते हैं, यह सब कुच अनोखा लगता हैं। सद्‍गुरु होते हुये भी उनका हमारी तरह, सर्वसामान्य मानवों की तरह का व्यवहार मुझे बहुत अच्छा लगता है। उन्हें भी संगीत अच्छा लगता है, यह पता चलने पर मैं बहुत खुश हो गयी।

  अमराठी भाषी लोगों के लिये बापू ने ‘मराठी क्लासेस’ शुरु किया था। यहाँ पर बापू मराठी के साथ अन्य अनेक बातें सिखाते थे। बिल्कुल साधारण-साधारण बातों से खूब बड़ा बदलाव हो सकता है, यह चीज मैंने इस क्लास में सीखी। साधारण अपने पसंदीदा पुराने हिन्दी फिल्मों के गाने (गीत) किसको नहीं अच्छे लगते? नायक द्वारा नायिका के लिये या नायिका द्वारा नायक के लिये गाये गये गानों को यदि हम अपने भगवान के लिये गायें तो………

   संगीत का काम है भाव उत्पन्न करना। जब आप हिन्दी फिल्म का गाना भी भगवान के प्रेम से ओतप्रोत होकर गाते हैं, तो भी तुम्हारा भाव उस तक पहुँचता ही है। यह विचार बापू ने दिया। इन गानों को मैंने पहले भी सुना था और लगातार गाती भी रही हूँ।

   परन्तु आज इन गानों को सुनते कुछ अलग ही महसूस होता है। मन में भक्तिभाव उमड़ पड़ता है।  मदन मोहन बापू के सबसे प्रिय संगीतकार थे। वो भूली दांसताँ, यूँ हसरतों के दाग, आपकी नज़रों ने समझा, लग जा गले, इत्यादि गाने बापू दिन में कई बार सुन सकते हैं और ऐसे कितनी भी बार सुनने के बाद भी बापू हर बार उतना ही खुश होंगे, ऐसा मुझे लगता है। मोहम्मद रफी, बापू के पंसदीदा गायक। उनके बारे में बापू खूब प्रशंसा करते हैं।

    बापू का संगीत प्रेम सिर्फ हिन्दी सिनेमा के गानों तक सीमित नहीं है। ब्लकि उन्हें संगीत का पूरा-पूरा ज्ञान है। इसका पता मुझे धीरे-धीरे चलने लगा। प्रत्येक गुरुवार को हरिगुरुग्राम में सत्संग होता है, गजर गायीं जाती हैं। मैं इस टीम की सदस्या हूँ। इन गजरों की तैयारी करनेवाली टीम की बापू के मिटींग होती रहती हैं। इस मीटिंग में बापू द्वारा किया गया मार्गदर्शन दिये गये सुझाव इतने महत्त्वपूर्ण होते हैं कि उनका कोई अन्य पर्याय होता ही नहीं है।

    जगरों को धुन देनी हो तो वो कैसी देनी है। सा कैसा लगता है। ठेका कैसे देना हैं, यह बापू बडी़ सहजता से सिखाते हैं। संगीत के क्षेत्र में ढ़ाई दशक गुजारने वाले मेरी तरह की गायिका को भी जो चीजें पता नहीं हैं, ऐसी अनेकों बातें बापू ने हमारे ध्यान में लायी। कुछ गजर और अभंगों को तो उन्होंने ऐसी धुन में बाँधकर दिखाया है जिसका हम स्वप्न में भी विचार नहीं कर सकते।

   आरती के दौरान हारमोनियम नहीं, यहाँ नगाड़ा चाहिये, मंजीरा चाहिये, तबला चाहिये, पखवाज का उपयोग करो, ऐसी सूचनायें बापू देते रहते हैं। उस समय ‘ऐसा क्यों?’ यह प्रश्न हम नहीं पूँछते। इस सूचना पर अमल करने के बाद हमें उस ‘क्यों’ का उत्तर अपने-आप ही मिल जाता है।

     जैसा कि मैंने पहले बताया कि मैंने शास्त्र-शुद्ध संगीत की शिक्षा नहीं ग्रहण की है। गाने सुनती गयी और गाती गयी। परन्तु बापू ने, अच्छा गाना-गाना हो तो अच्छा संगीत सुनना आवश्यक है, ऐसा कहकर हमसे अभ्यास करवाकर लिया। किशोरी अमोणकर, मोगूबाई कुर्डीकर, जोत्स्ना भोले, जयमाला शिलेदार इत्यादि महान गायकों के गाने सुनों। उससे तुम काफी कुछ सिख सकोगे। यह बापू ने सिखाया। पहले में संगीत नहीं सुनती थी। मराठी नाट्यसंगीत का भी मुझे शौक नहीं था। परन्तु बापू के कहने के बाद मैं सुनने लगी और मुझे उसकी लतक लग गयी।

    falguni_title(1)कई बार बापू ने विख्यात गायक, गायिकाओं की सी.डी. हमें सुनवायी है। उनको सुनते समय बापू को देखना भी एक उत्सव जैसा होता है। इन गानों का एक-एक शब्द उन्हें याद तो रहता ही है परन्तु साथ ही साथ इन गानों की प्रत्येक आलाप और हरकत भी बापू वैसी की वैसी ही गाते हैं। उसे देखकर, संगीत कितनी तन्मयता से सुनना चाहिये, इसका प्रात्यक्षिक के साथ शिक्षण मुझे मिलता है। फलस्वरूप इतने वर्षों से संगीत क्षेत्र में काम करके अब जाकर मेरा शिक्षण शुरु हुआ हैं, ऐसा मुझे लगने लगा है।

     बापू ने मुझे गजर रिकार्ड करने का काम सौंपा। व्यावसायिक गायिका होने के बावजूद भी मुझे रिकार्डिंग का तांत्रिक ज्ञान नहीं था। कोरस आदि कैसा होना चाहिये, यह बापू ने बताया। कोरस में ३० प्रतिशत महिलायें और ७० प्रतिशत पुरुष गायक होने चाहिये, तो ही समतोल रहता है। क्योंकि एक महिला की आवाज तीन पुरुषों के बराबर होती हैं, यह ज्ञान बापू ने ही दिया।

     गजर रेकार्ड करके बापू को सुनाने पर उसकी अनेकों ट्रेकों में किसका सुर कम-ज्यादा लगा है, यह बापू को सुनते समय ही पता चल जाता है। ‘चेतन की आवाज कम क्यों? देवेन्द्र की आवाज क्यों बढ़ी हुयी है?’ ऐसे प्रश्न वे पूछां करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे कितनी बारीक से बारीक बात भी पकड़ लेते हैं। इस क्षेत्र के विशेषतज्ञ लोगों के लिये भी ये आव्हान साबित हो सकते हैं। 

     कभी-कभी मन में विचार आता है कि बापू तो सद्‌गुरु है। उनके लिये क्या असंभव हैं? परन्तु अगले ही क्षण ध्यान आता है कि, मानवी स्तर के अपने इस सद्‌गुरु ने अभ्यास और परिश्रम से ही यह ज्ञान और कौशल्य आत्मसात किया है। उनके इस ज्ञान को हम किसी भी सीमा में सीमित नहीं कर सकते हैं। उदाहरणार्थ उन्हें सिर्फ फिल्मी या अमुक एक प्रकार का ही संगीत पता है, ऐसी सीमा में नहीं बांध सकते। कुछ दिनों पहले ही वे एक पारिवारिक समारंभ में सहभागी हुये थे। उस समय उन्होंने डॉ.जयेश शाह से कहा कि दमयंती बारडाई की सी.डी. अभी के अभी लाओ। यह सी.डी. मिलने के बाद उन्होंने दमयंती बारडोई के गाने वहाँ उपस्थित सभी लोगों को सुनाये। इतना ही नहीं ब्लकि दमयंती बारडोई के संगीत के बारे में, उनके योगदान के बारे में जानकारी भी दी। वे आश्चर्यचकित रह गये। क्योंकि दमयंती बारडोई एक गुजराती गायिका थी। उनके बारे में बापू की इतनी विस्तृत जानकारी कैसे?

    ऐसा ही एक और धक्का मिला। पुराने जमाने का एक गरबा है – ‘रंग ताली, रंग ताली, रंगमा रंग ताली’। यहाँ गरबा मेंरी आजी गाया करती थी। वो भी बापू ने एक बार अचानक हमारे सामने गाया। केवल गुजराती ही नहीं ब्लकि अन्य राज्यों के लोक संगीतों के प्रकार, शास्त्रीय संगीत का प्रकार का भी ज्ञान बापू को है। इस ज्ञान को युक्त हस्त से बाँटने के लिये वे उत्सुक रहते हैं। यें लुटाने के लिये ही आया हूँ, ऐसा कहने वाले बापू कभी भी हाथ पीछे नहीं खींचते। परन्तु यह सब करते समय, हम कुछ अनोखा कर रहे हैं अथवा मैं अनोखा हूँ, इसका अहसास बापू किसी को भी नहीं होने देते।

     संगीत का इतना ज्यादा ज्ञान होने के बावजूद भी मुझे काफी ज्ञान, यह भाव बापू के पास मैंने कभी भी नहीं देखा। इसके विपरीत गायकों और वादकों से वे मित्रवत व्यवहार करते हैं। समयपर उनसे जानकारी भी लेते हैं। अपने ज्ञान का बड़प्पन न दिखानेवाले बापू, किसी का ध्यान भी न जाने वाले वादकों के काम की भी प्रशंसा किया करते हैं। इतना ही नहीं, कार्यक्रमों में उनके सामने गाने वाले व्यावसायिक गायकों-गायिकाओं को भी अचंभित होते मैंने देखा है। ‘क्या कहें, जो हम गाते हैं वह गाना बापू को पहले से ही याद रहता है। वे हमारे साथ-साथ गाते रहते हैं। हमसे ही कुच गलती हो जायेगी, ऐसा हमें ड़र रहता है।’ यह कबूली मुझे व्यावसायिक गायकों ने दी है – ऐसा ही है मेरा बापू।’

॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

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