शताक्षी प्रसादम्‌ के साथ ही एक कप हल्दीमिश्रित दूध का सेवन करना श्रद्धावानों के लिए यक़ीनन ही श्रेयस्कर

गुरुवार, दि. ६ मे २०१० रोजी श्रीहरिगुरुग्राम येथे “रामराज्य” ह्या विषयावर झालेल्या प्रवचनात सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्ध बापूंनी “शताक्षी प्रसादम्‌” हा अतिशय महत्त्वाचा मुद्दा मांडला होता व ‘हा प्रसाद प्रत्येकाने नित्य प्राशन करावा’ असे सुचविले होते. हळद (हरिद्रा), मध, एक चतुर्थांश लसणाची पाकळी व ठेचलेली सूंठ यापासून हा प्रसाद तयार करावयाचा होता (लसणाच्या पाकळी ऐवजी आल्याचा छोटा तुकडा वापरला तरी चालेल असे स्पष्टीकरण नंतर दिले होते).

शताक्षी प्रसादम्‌चे महत्त्व विषद करताना, शताक्षी प्रसादम्‌ सर्व प्रकारची दुर्बलता दूर करते असे त्यावेळी बापूंनी सांगितले होते. शताक्षी प्रसादम्‌च्या बरोबरच, बापूंच्या सांगण्यानुसार रोजचे घेतलेले एक कप हळद दूध (शताक्षी प्रसादम्‌ मध्येही हरिद्रा आहेच) प्रतिकारशक्ती वाढविण्यास उपयोगी पडेल.

“रामराज्य” ह्या विषयावरील प्रवचन झाल्यापासून अनेक श्रद्धावान शताक्षी प्रसादम्‌ नित्यनेमाने प्राशन करत आहेत. शताक्षी प्रसादम्‌च्या बरोबरच एक कप हळद दूध घेणे श्रद्धावानांना नक्कीच श्रेयस्कर होईल.

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हरि ॐ.

गुरुवार, दि. ६ मई २०१० को “रामराज्य” इस विषय पर श्रीहरिगुरुग्राम में हुए प्रवचन में सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्ध बापूजी ने “शताक्षी प्रसादम्‌” यह अत्याधिक महत्त्वपूर्ण मुद्दा प्रस्तुत किया था और ‘हर कोई इस प्रसाद का नियमित रूप से प्राशन करें’ ऐसा सूचित किया था। हल्दी (हरिद्रा), शहद, एक-चौथाई लहसून की पंखुडी और पीसी हुई सोंठ इनसे यह प्रसाद तैयार करना था (लहसुन की पंखुडी के बदले अदरक के छोटे टुकड़े का इस्तेमाल किया तो भी चलेगा, ऐसा स्पष्टीकरण बाद में दिया था)।

शताक्षी प्रसादम्‌ के महत्त्व को विशद करते समय, शताक्षी प्रसादम्‌ हर प्रकार की दुर्बलता को दूर करता है, ऐसा उस समय बापुजी ने कहा था। शताक्षी प्रसादम्‌ के साथ ही, बापु के बतायेनुसार, हररोज़ सेवन किया हुआ एक कप हल्दीमिश्रित दूध (शताक्षी प्रसादम्‌ में भी हरिद्रा है ही) प्रतिकारशक्ति को बढाने में उपयोगी साबित होगा।

“रामराज्य” इस विषय पर का उपरोक्त प्रवचन होने के बाद, कई श्रद्धावान शताक्षी प्रसादम्‌ का नित्यनियमित रूप से प्राशन कर रहे हैं। शताक्षी प्रसादम्‌ के साथ ही एक कप हल्दीमिश्रित दूध का सेवन करना श्रद्धावानों के लिए यक़ीनन ही श्रेयस्कर होगा।

हरि ॐ. श्रीराम. अंबज्ञ.
नाथसंविध्‌

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