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अंबज्ञ हा शब्द श्रीत्रिविक्रमाचा सर्वांत महत्त्वाचा अल्गोरिदम (Ambadnya Word Is The Most Important Algorithm Of Shree Trivikram) श्रीत्रिविक्रमाचे तीन विक्रम हे मानवाच्या अन्नमय, मनोमय आणि प्राणमय या तीनही देहांमध्ये उचित बदल घडवून आणतात. अंबज्ञताच मानवाच्या देहात त्रिविक्रमास सक्रिय करणारी आहे. अंबज्ञ हा शब्दच श्रीत्रिविक्रमाचा सर्वांत महत्त्वाचा अल्गोरिदम आहे, या संदर्भात सद्गुरु श्री अनिरुद्धांनी त्यांच्या २८ नोव्हेंबर २०१४ रोजीच्या मराठी प्रवचनात सांगितले, जे आपण या व्हिडियोत पाहू शकता. ॥ हरि ॐ

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विनाशकारी मनोवृत्तींवर विजय मिळवण्यासाठी भगवंताचे सहाय्य कसे मिळवावे (How To Attain The Help From God To Overcome Destructive Emotions) आहार, निद्रा, भय आणि मैथुन या चारही गोष्टी सर्व जिवांसाठी समसमान असतात, म्हणूनच या चार गोष्टींची काळजी माणसाला घ्यावी लागते. काम, क्रोध वगैरे वृत्तींवर नियन्त्रण मिळवणे माणसासाठी कठीण असते. पण जो अंबज्ञ असतो, त्याला मनावर उचित नियन्त्रण मिळवण्यासाठी भगवंताकडून सहाय्य मिळतेच. विनाशकारी मनोवृत्तींवर विजय मिळवण्यासाठी भगवंताचे सहाय्य कसे मिळवावे, या संदर्भात

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अनुभव यह वास्तव एवं सत्य भी होता है (Experience Is The Fact And The Truth Also) अनुभव यह महज महसूस करने की बात नहीं होती, बल्कि वह प्रत्यक्ष सत्य साक्षात्कार होता है। सद्‍गुरुतत्त्व के प्रति रहने वाले भाव के कारण जो परिवर्तन जीवन में आते हैं, उसे अनुभव कहते हैं। अनुभव बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने २० नवंबर २०१४ के हिंदी प्रवचन में बताया, जो

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आदिमाता जिसे क्षमा न कर सके इतना बडा कोई पाप ही नहीं है (There Is No Sin Too Big For Aadimata To Forgive) मातृवात्सल्य उपनिषद्‍ में हम पढते हैं कि कोई भी यदि सच्चे दिल से पश्चात्तापपूर्वक आदिमाता की शरण में जाकर सुधरने के लिए प्रयास करता है तो वह चाहे कितना भी पापी क्यों न हो, यहाँ तक कि राक्षस या शैतान भी क्यों न हो, मगर तब भी

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साईनाथ कहते हैं- भजेगा मुझको जो भी जिस भाव से। पायेगा कृपा मेरी वह उसी प्रमाण से (Sainath Says, I Render To Each One According To His Faith) सद्‍गुरुतत्त्व की उपासना करने वाले श्रद्धावानों के मन में ‘यह मेरा सद्‍गुरु मेरा भला ही करने वाला है’ यह भाव रहता है। इस एकसमान भाव के कारण सामूहिक उपासना में सम्मिलित होनेवाले श्रद्धावानों को व्यक्तिगत उपासना की अपेक्षा उस सामूहिक उपासना से

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अपराधभाव से स्वयं को मत कोसिये (Don’t Curse Yourself By The Feeling Of Guilt) अपने हाथों हुई गलती के लिए मन में पश्चात्ताप की भावना का होना यह स्वाभाविक और आवश्यक तो है, लेकिन अपनी गलती के लिए स्वयं को लगातार कोसते रहना यह मुनासिब नहीं है। ऐसा करने से वह मनुष्य अपने साथ साथ घर का भाव भी दुखी कर देता है। अपराधभाव की खाई में स्वयं को न

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भाव इस शब्द में समग्रता है (There Is A Wholeness In The Word ‘Bhaav’) मानव के भीतर रहने वाले ‘मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार’ ये चारों मिलकर किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना के प्रति उठने वाले प्रतिसाद, भावना आदि को मिलाकर जो सहज स्पन्द उत्पन्न होता है, उसे भाव कहते हैं। भाव इस शब्द में समग्रता है, इस बारे में परम पूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने अपने १६ अक्टूबर

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मंगलचण्डिकाप्रपत्तीचे महत्त्व (Importance Of Shree Mangal-Chandika-Prapatti) सद्‍गुरु श्री अनिरुद्ध बापुंनी ०८-०१-२०१५ रोजीच्या आपल्या प्रवचनात श्रीमंगलचण्डिकाप्रपत्तीसंदर्भात मार्गदर्शन केले. या वेळी बोलताना बापू म्हणाले की प्रपत्ती करताना ते कर्मकाण्ड म्हणून करू नका, तर प्रेमाने करा. शिस्तपालन आवश्यक आहे, पण भाव हा सर्वांत महत्त्वाचा आहे, हे विसरता कामा नये. स्त्रियांच्या द्वारे मकरसंक्रान्तीच्या पर्वावर केल्या जाणार्‍या या श्रीमंगलचण्डिकाप्रपत्तीचे महत्त्वसुद्धा बापुंनी या वेळी सांगितले, जे आपण या व्हिडियोत पाहू शकता. ॥ हरि ॐ ॥ ॥

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क्रिया के पीछे का भाव अधिक महत्त्वपूर्ण होता है (The Bhaav Behind The Action Is More Important) स्कूल न जाने वाले बच्चे की मरम्मत करने वाली माँ की बच्चे को पीटने की वह क्रिया ऊपरी तौर पर अनुचित क्रिया लग सकती है, लेकिन उसके पीछे रहने वाला उसका हेतु और कारण बच्चे का भला करना यही है और इन सबके पीछे का भाव ‘अपने बच्चे का भला करना’ यह होने

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महज क्रिया पर से भाव को नहीं जाना जा सकता (Bhaav Can Not Be Judged Only By Action) अन्य किसी को रोता देखकर आने वाले आँसू यह एक प्रकार की अभिव्यक्ति है। लेकिन कोई रो रहा है, तो सिर्फ़ उसकी रोने की उस क्रिया को देखकर उसके भाव के बारे में कहा नहीं जा सकता। महज क्रिया पर से भाव को नहीं जाना जा सकता, बल्कि उस क्रिया के पीछे