Sadguru Aniruddha Bapu

​भूमाता को प्रणाम करते समय की प्रार्थना

हरि ॐ दिनांक २७ जून २०१९ के गुरुवार के पितृवचन में सद्‌गुरु श्रीअनिरुद्ध बापु ने, भूमाता को प्रणाम करने का महत्त्व हम सबको बताया। ”यह भूमाता विष्णुजी की शक्ति है ऐसी हमारी धारणा है, यह हमारी संस्कृति है। सुबह जाग जाने पर ज़मीन पर कदम रखने से पहले भूमाता को प्रणाम करने से, दिन की शुरुआत मंगलमयी तथा पवित्रता से, अंबज्ञता से भरी होती है।” ऐसा बापु ने कहा। भूमाता

Bapu Always Protects His Children

– Baldeep (Ginny) Lamba While living our lives, many of us experience good as well as bad things. These are the results of our Karma from the previous birth. We, therefore, ought to endure it as no one can circumvent the associated sufferings. Only our Sadguru can save us from such misery, and it is him and him alone who helps us to alleviate them. I had a similar life-threatening

नामस्पर्श

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌. हम यह जो मंत्रगजर करते हैं – ‘रामा रामा आत्मारामा….’, वह कहाँ जाकर पहुँचता हैं? क्या हवा में घूमता रहता है इधर कहाँ? या पूरे ब्रह्मांड में या हवा में जाकर पहुँचता है? कहाँ जाता होगा? There is a definite place, where it goes….where it reaches….where it is absorbed….where it is pulled. Only one place. कौनसी जगह हैं वह? त्रिविक्रमनिलयम श्रीगुरुक्षेत्रम्‌॥ हम लोग

Sadguru Shree Aniruddha’s Pitruvachan (Part 2) – 21 March 2019 - What is Procrastination?

Hari Om | Sriram | Ambadnya Naathsamvidh | Naathsamvidh | Naathsamvidh So…for last many years, the young generation has been telling me, ‘Bapu, you’ve started speaking in Hindi, why don’t you (speak in) English?’ I said, ‘I am Indian, okay? I know only Indian languages. I learned in vernacular medium school. As per [that], I don’t know English, so I will not be (speaking in English)’; but then, people are

Sadguru Shree Aniruddha’s Pitruvachan (Part 1) – 21 March 2019

हरी ॐ. श्रीराम. अंबज्ञ. नाथसंविध्‌. नाथसंविध्‌. नाथसंविध्‌. So, होली खेलकर आये हुए हैं बहुत लोग। खेले कि नहीं खेले? खेले…नहीं खेले…क्यों? [आपके साथ खेलना था] अरे भाई, मैं तो बुढ्ढा हो चुका हूँ, कहाँ होली खेलनी हैं। रंग नहीं खेलते आप लोग? क्यों? जो नहीं खेला होगा, वो हात ऊपर करें। जिन्होंने रंग खेला, वो लोग हाथ ऊपर करें। Very good, ऍब्सोल्युटली, मस्त, क्लास। बाकी लोग क्यों नहीं खेले? हमारी

Sadguru Shree Aniruddha’s Pitruvachan (Part 1) – 07 March 2019

॥ हरि: ॐ ॥ श्रीराम ॥ अंबज्ञ ॥ ॥ नाथसंविध्‌ ॥ नाथसंविध्‌ ॥ नाथसंविध्‌ ॥ हररोज कई बार हमारे मन में एक सवाल उठता है – ‘क्यों?’ यह ‘क्यों’ हुआ? ऐसा ‘क्यों’ हुआ? ऐसा ‘क्यों’ नहीं हुआ? ‘Why?’ ‘Why?’ ‘Why?’ Whole life we are facing this problem – ‘Why’? पूरी ज़िन्दगी हम लोग इस सवाल के साथ जूझते रहते हैं – ‘Why’; and we never get answer. हमें कभी जवाब

जयंती मंगला काली

हरि ॐ २१-०२-२०१९ हरि ॐ. श्रीराम. अंबज्ञ. नाथसंविध् नाथसंविध् नाथसंविध्. ‘रामा रामा आत्मारामा त्रिविक्रमा सद्गुरुसमर्था, सद्गुरुसमर्था त्रिविक्रमा आत्मारामा रामा रामा’ जो कोई भी यह जप करता है, मंत्रगजर करता है, (वह) भक्तिभावचैतन्य में रहने लगता है। कुछ लोगों के मन में प्रश्न उठा है। सही प्रश्न है – ‘बापू, यह मंत्रगजर तो सर्वश्रेष्ठ है, आपने बताया, मान्य है हमें Definitely। लेकिन ‘माँ’ का नाम नहीं है इसमें?’ यह मैंने पहले

सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापु के अग्रलेख ऑनलाईन पढने का स्वर्णिम अवसर

हरि ॐ हम श्रद्धावानों को त्रि-नाथों से जोडने वाले ‘समर्थ-सेतु’ स्वयंभगवान श्री त्रिविक्रम के भक्तिभाव चैतन्य में रहना, यही हर एक श्रद्धावान के लिए राजमार्ग है, यह मार्गदर्शन हमें परमपूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापु दैनिक प्रत्यक्ष के अग्रलेखों से कर रहे हैं। हम सभी जानते हैं कि सद्गुरु श्रीअनिरुद्धजी विभिन्न मार्गों से अपने श्रद्धावान मित्रों के साथ संवाद करते हैं। हर गुरुवार को श्रीहरिगुरुग्राम में होने वाले पितृवचन (प्रवचन) के

त्रिविक्रम के १८ वचन

हरि ॐ, दिनांक २२ दिसम्बर २०१८ यानी दत्तजयंती से श्रीवर्धमान व्रताधिराज का आरंभ हो रहा है। सद्‍गुरु श्रीअनिरुद्धजी के बतायेनुसार कई श्रद्धावान ‘स्वयंभगवान त्रिविक्रम के १८ वचन’ बतौर ‘व्रतपुष्प’ लेनेवाले हैं। श्रद्धावानों की सुविधा के लिए स्वयंभगवान त्रिविक्रम के १८ वचन मराठी, हिन्दी और अँग्रेज़ी में उपलब्ध कराये जा रहे हैं। ——————————– ——————————————   —————————————— । हरि ॐ । श्रीराम । अंबज्ञ । । नाथसंविध्‌ ।

Bapu’s grace

अगदी लहानपणापासून प्रत्येकाला काही करायचे असते आणि काही बनायचे असते, म्हणजेच काहीतरी बदलायचे असते. हा हवा असणारा बदल ही त्या त्या मानवासाठी त्याच्या अपेक्षित प्रगतीची पाऊलवाट असते. अगदी दहा वर्षाच्या बालकापासून ते सत्तर वर्षाच्या वृद्धावस्थेत येऊन पोहोचलेल्या प्रौढापर्यंत प्रत्येकाला आहे त्या स्थितीत, आपण आणखी काही चांगले करायला हवे होते, मिळवायला हवे होते असे वाटतच राहते. मानवाची ही स्वत:च्या परिस्थितीत अधिक चांगले बदल घडवून आणण्याची इच्छाच त्याच्या विकासाला कारणीभूत ठरते. परंतु