Hindi Pravachan

भय से मुक्ति पाने के लिए भगवान पर भरोसा रखिए (Keep Faith in God to get rid of Fear) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 15 May 2014.

मानव जिस बात से डरता है, उसके बारे में वह ज्यादा सोचता है । जिस बात से उसे डर नहीं लगता उसके बारे में वह नहीं सोचता । सच्चे श्रद्धावान की जिम्मेदारी भगवान उठाते हैं और निरपेक्ष प्रेम के साथ उसके लिए सब कुछ करते रह्ते हैं । मानव का भगवान पर पूरा भरोसा होना चाहिए । भय से मुक्ति पाने के लिए भगवान पर भरोसा रखना आवश्यक है, यह

कृष्णसंयुता राधा (Krishna-sanyuta Radha) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 19 February 2004

  Krishna-sanyuta Radha – कृष्णसंयुता यह राधाजी का महज नाम नहीं है, बल्कि यह तो राधाजी की स्थिति है, यह राधाजी की आकृति है, यह राधाजी का भाव है । दर असल कृष्णसंयुता ही राधाजी का मूल स्वरूप है  । भरोसा यह कृष्णसंयुत ही होता है और इसीलिए भरोसा यह तत्त्व राधाजी से जुडा है । राधाजी के कृष्णसंयुता इस नाम के बारे में सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध ने अपने १९ फ़रवरी

भरोसा (Surety & Certainty) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 19 February 2004

  Surety & Certainty – मानव को केवल भगवान पर ही भरोसा करना चाहिए और भगवान पर ही केवल भरोसा करने की शक्ति ही राधाजी है । विश्वास और भरोसा इनके बीच फ़र्क है । विश्वास के स्तर पर से आगे बढकर मानव को भगवान पर पूरा भरोसा रखना चाहिए, यह मुद्दा सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध बापु ने अपने १९ फ़रवरी २००४ के हिंदी प्रवचन में विशद किया, जो आप इस व्हिडियो

भक्तमाता राधाजी भक्त का जीवन मंगलमय बनाती हैं (Bhaktamata Radhaji makes devotees life auspicious) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 05 May 2005

Bhaktamata Radhaji makes devotees life auspicious – जीवन मंगलमय बनाना हो तो भगवान के साथ कभी भी अहंकार से पेश नहीं आना चाहिए । राधाजी स्वयं हंकाररूपा हैं, अहंकार कभी राधाजी में होता ही नहीं है । भक्तमाता राधाजी जिसके जीवन में सक्रिय रहती हैं, उसके जीवन में अहंकार का अपने आप ही लोप हो जाता है । राधाजी की कृपा से श्रद्धावान का जीवन मंगल कैसे होता है, यह

अहंकार से पीछा छुडाने का सरल उपाय (An easy way to get rid of the ego) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 05 May 2005

अहंकार (ego) यह इस विश्व की सब से अमंगल बात है । ’मैंने क्या क्या किया’ यह भगवान से कभी मत कहना; ’भगवान ने मेरे लिए क्या क्या किया’ इसे दोहराते रहना । भगवान की भक्ति करते रहने से भगवान मेरे जीवन का केन्द्रस्थान बन जाते हैं, कर्ता बन जाते हैं और अहंकार अपने आप ही छूट जाता है । अहंकार से पीछा छुडाने का सरल उपाय परम पूज्य सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध

ॐ रां राधायै राधिकायै रमादेव्यै नम: ।(Om Ram Radhayai Radhikayai Ramdevyai Namah) - Aniruddha Bapu Hindi Pravachan

महाभाव-स्वरूपा राधाजी के सहस्र नामों में से प्रत्येक नाम की महिमा स्पष्ट करते हुए सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध बापु अपने प्रत्येक प्रवचन में ’भक्तिमार्ग पर भक्तमाता राधाजी अपने बच्चों के लिए यानी श्रद्धावानों के लिए किस तरह सक्रिय रहती हैं’, यह भी विशद करते थे । ’ॐ रां राधायै राधिकायै रमादेव्यै नम:’ इस मन्त्र का जप ’राधासहस्रनाम’ पर आधारित प्रत्येक हिन्दी प्रवचन के बाद सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध बापु स्वयं करते थे और श्रद्धावान

समर्पण ही आराधना की आत्मा है (Surrendering to The God is the Core of Worship) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 04 March 2004

मैं भगवान का हूँ, मेरे पास जो कुछ भी है वह भगवान का दिया हुआ ही है, मैं जो भक्ति कर रहा हूँ वह भगवान की कृपा से भगवान को प्राप्त करने के लिए ही कर रहा हूँ, इस समर्पित भाव के साथ श्रद्धावान को भक्तिपथ पर चलना चाहिए । केवल काम्यभक्ति न करते हुए समर्पण भाव से भगवान की आराधना करना श्रेयस्कर है, समर्पण ही आराधना की आत्मा है(Surrendering

एकविधा भक्ति (Ekavidha Bhakti) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 04 March 2004

जीवन में भगवान को प्राथमिकता देनी चाहिए । मैं भगवान के घर में रहता हूँ, यह भाव रहना चाहिए l जो मेरा है वह भगवान ने ही मुझे दिया हुआ है, इसलिए मेरा जो कुछ भी है वह भगवान का है, मैं भगवान का हूँ, इस भाव के साथ श्रद्धावान के द्वारा की गयी भगवद्‍भक्ति को एकविधा भक्ति (Ekavidha Bhakti) कहते हैं, यह बात सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापु ने अपने दि.

एकविध ध्यान (Ekavidha Dhyaan) - Aniruddha Bapu Hindi Discourse 04 March 2004

मानव भुक्ति से लेकर मुक्ति तक कुछ भी यदि भगवान से प्राप्त करना चाहता है, तो उसे भगवान का एकविध ध्यान (Ekavidha Dhyaan) करना चाहिए । ” भगवान, तुम्हारे सिवा मेरा कोई नहीं है, मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ तुम्हारे ही आधार से कर रहा हूँ, तुम्हें पाने के लिए कर रहा हूँ ” इस भाव के साथ श्रद्धावान के द्वारा भगवान का किया गया ध्यान ही एकविध ध्यान

Aniruddha bapu, personality and individuality

परम पूज्य सद्‌गुरु श्री अनिरुद्ध बापुजी ने गुरूवार १६ जनवरी २०१४ के हिंदी प्रवचन में अपनापन यह जताने की बात नहीं है, बल्कि महसूस करने की बात है । सद्गुरुतत्त्व के प्रति अपनापन जताने के बजाय अपनापन महसूस करना आवश्यक है और इसके लिए सद्गुरु का तुम्हारे प्रति रहने वाला जो अपनापन है, उसे महसूस करो, यह बात स्पष्ट की, जो आप इस व्हिडियो में देख सकते हैं l ( Feel